मैं ही समझदार, बाकी सब नादान—यही जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है : बिमल सरार्फ
बिमल सरार्फ, रक्सौल, 20 सितम्बर 2026 । मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि उसे लगता है कि वही सबसे अधिक समझदार है और बाकी लोग नादान हैं। इसी सोच से अहंकार जन्म लेता है और व्यक्ति धीरे-धीरे अपने आसपास के लोगों, परिस्थितियों और जीवन की वास्तविकताओं को समझने से दूर होता जाता है। सच्ची समझदारी स्वयं को श्रेष्ठ मानने में नहीं, बल्कि हर परिस्थिति से सीखने और दूसरों के विचारों का सम्मान करने में है।
जिस प्रकार जंगल में वनस्पतियां और जड़ी-बूटियां केवल जानकार व्यक्ति को दिखाई देती हैं, उसी प्रकार जीवन में अपनी भूल और ईश्वर की कृपा भी उसी व्यक्ति को दिखाई देती है, जो उन्हें स्वीकार करने का विवेक रखता है। जीवन में गलती होना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती को पहचान लेना और उससे सीख लेना ही मनुष्य को बेहतर बनाता है।
चलते हुए पैरों में भी कितना सुंदर संतुलन है—एक आगे होता है तो दूसरा पीछे। न आगे वाले को अभिमान होता है और न पीछे वाले को अपमान, क्योंकि दोनों जानते हैं कि यह स्थिति पलभर में बदल सकती है। जीवन भी इसी तरह है। आज जो आगे है, वह कल पीछे हो सकता है और जो आज पीछे है, वह कल आगे बढ़ सकता है। इसलिए सफलता में अहंकार और असफलता में हीनभावना, दोनों से बचना चाहिए।
जिस व्यक्ति ने अपने परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर जीवन में अपनी पहचान बनाई है, वह किसी के आने या जाने से टूटता नहीं। वह जानता है कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन आत्मविश्वास और संकल्प मनुष्य को फिर से खड़ा कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति का विश्वास होता है—“तूफानों, फिर से तैयारी कर लो, मैंने फिर नया आशियाना बना लिया है।”
जीवन की कठिन परिस्थितियों में हमें दो तरह के लोग मिलते हैं। कुछ लोग मीठी बातों से हमारी सहानुभूति करते हैं और कुछ लोग कड़वी बातें कहकर हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। केवल सहानुभूति सुनते रहने से व्यक्ति अपनी कमजोरी में उलझा रह सकता है, जबकि सही समय पर मिली प्रेरणा उसे कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देती है। इसलिए यह तय करना हमारे हाथ में है कि हम अपनी परिस्थितियों से हार मानेंगे या उनसे सीख लेकर स्वयं को मजबूत बनाएंगे।
ज्ञान और अनुभव हर व्यक्ति के अपने होते हैं, लेकिन मनुष्यता का अर्थ दूसरों के सुख-दुःख में सहभागी बनना है। अपने स्वार्थ की चिंता करना तो हर जीव जानता है, लेकिन सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए अपने सुख का कुछ हिस्सा त्यागने का साहस रखता है।
जीवन में होने वाली हर घटना को लेकर अत्यधिक चिंता करना भी उचित नहीं है। जो बीत चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता और जो आने वाला है, उसका पूरा अनुमान कोई नहीं लगा सकता। इसलिए बीते कल के पछतावे और आने वाले कल की चिंता में आज को खो देना समझदारी नहीं है।
आस्था रखने वाला व्यक्ति मानता है कि जीवन की नैया का वास्तविक नाविक ईश्वर है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने कर्म ईमानदारी से करता रहे, कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखे और परिणाम को लेकर अनावश्यक चिंता न करे। जीवन में सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, लेकिन हर परिस्थिति मनुष्य को कुछ न कुछ सिखाकर जाती है।
जीवन का सार यही है कि “मैं ही समझदार हूं और बाकी सब नादान हैं”—इस भ्रम से बाहर निकलें। अपनी गलतियों को स्वीकार करें, दूसरों के अनुभवों से सीखें, कठिन परिस्थितियों से घबराने के बजाय उनका सामना करें और ईश्वर पर विश्वास रखते हुए अपने कर्म करते रहें। यही सोच मनुष्य को अहंकार से विनम्रता, कमजोरी से आत्मविश्वास और भ्रम से वास्तविक समझ की ओर ले जाती है।

