Thu. Aug 13th, 2026
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आध्यात्मिक जीवन:
रवीन्द्र झा शंकर’

 

यह आध्यात्मिकता जीवनका सत्संग है। आध्यात्मिक जीवनका तार्त्पर्य या प्रयोजन यही है कि अपनी आत्मा के अन्दर अनेकानेक रास्ता मिल जाए। अपनी आत्मा में ऐसे जीवन चला जाए कि जिसको वह बिसरा हुआ हो। बाहर का मन अन्दर एकत्रित हो जाए अर्थात् संसारसे बिछुडकर केवल अपने आप में एकाग्र हो जाए। जैसे नीद में मन एकाग्र हो जाता है तो मनुष्य को बहुत सुख और शान्ति प्राप्त होती है। कारण कि उस समय मन के अन्दर संसार को ठुकराकर ही नीद में आता है। नीद में सोए हुए को इतना आनन्द होता है कि यदि कोई उसको नीद से जगा दे तो वह नीद से उठने पर दुःख मानता हैं क्योंकि नीद से उठने पर उसका सुख बिगरता है। नीद के समय किसी प्रकार की कोई शंका, भय एवं बन्धन नहीं होता है और श्वास भी बडे आराम से चलता है। इसी प्रकार जाग्रतावस्था में भी अपने मन को सारे संसारसे अलग करके अपनी आत्मा में अर्थात् अपने आप में एकत्रित करना है। जब जैसे न्रि्रा से सुख का अनूभव होता है। इसी प्रकार जागते समय में भी वह सुख हमारे साथ बना रहेगा।
अपनी आत्मा का यही सुख जो अन्त में सदा बना रहने वाला है। परंतु जागते-जागते ऐसा सुख अनुभव करने के लिए सारे संसारसे मन को मुक्त करना पडेÞगा अर्थात मन को संसार को सकल बन्धनों के जालसे छुडÞाना होगा। यही बन्धनों से छुटना मुक्ति है और ऐसी मुक्ति होने पर यही नित्य सनातन सुख, सदा बना रहने वाले के रुप में हमे प्राप्त होगा। श्रद्धा रख सकने किसी दूसरेसे सुन करके या पुस्तकों में पढÞ करके अपने जीवन को देखे की इसका अन्त कहा है – और हमारा हित किस में है – आध्यात्मिक जीवन की परख करके इसकी पहचान करे और नियम का पालन करे। एसे करने के लिए अपनी आँख, कान एवं रसना -जिहृवा) को भी रोके और खाने-पीने की आदत रुपी शक्ति पर भी काबू करें। दूसरो के सुख को देखकर अपने मन में चिढे नहीं अर्थात जले नहीं अपितु दूसरों को सुखी देखकर उनके प्रति दयाभाव रखे, दूसरों के गुणों को तो पहचानें तथा उनकी प्रशंसा भी करे और अवगुण किसी को भी न देखे अर्थात् दूसरों को अवगुणों और पापों की ओर ध्यान नहीं दे। थोडा अपने आप दुःख सहन कर लें। परंतु बाहर संसार में किसी का भी अपना आत्मा संयम है। जन्म से मनुष्य को जो जीवन मिलता है, वह भौतिक जीवन है। जिस में बाहर से संसार में ही जिनेका रास्ता है। संसार में जब से प्राणी उत्पन्न होता है तो उसका जीवन बाहर संसार का ह हिै अर्थात बाहर संसार में ही बहता रहता है क्योंकि उसकी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ आँख, कान, जिहृवा और त्वचा बाहर की तरफ खाली हर्ुइ होती है। इन इन्द्रियों से वह बाहर ही सब को पहिचानता, देखता और सुनता है।
इसलिए बाहर के प्राणी एवं पदार्थो के तो सब जानते हैं, परंतु उनको अन्दर के बारे में कुछ भी पता नहीं है अर्थात मनुष्य के अन्दर जो आत्मा का सुखः अज्ञान के पर्दे में रहता है अर्थात छुपा रहता है। कारण कि इन्द्रियाँ बाहर की ओर खुली हर्ुइ है। इसी के कारण से रोग, शोक एवं व्याधियाँ आती हैं। आदत से होते हुए बुरे कमार्ंर्ेेे बचा जा सके तथा उस समय सही कर्म भी बन पाए श्रद्धा से अपनाया गया थोडÞा धर्मका रास्ता यही है कि अपने जीवन को परखना शुरु करे कि मेरे जीवन की गाडÞी किस लाइन पर चल रही है –
भविष्य में कुछ अच्छे आचरण के बारे में भी सीख ले कि कैसे चलना चाहिए। थोडÞा अपने-आप को समझाना शुरु करें। अपने कर्तव्य को पहचानना शुरु करें और फिर उसके अनुसार भली प्रकार से संसार में चलने की शिक्षा भी ग्रहण कर लें। यदि आपने चलना शुरु कर दिया तो समझो आध्यात्मिक जीवन के बीच तो आपके अन्दर पडÞ गया है। अपनी आत्मा में जीने का रास्ता तो खुल गया है। और यह रास्ता चलते-चलते वहाँ तक आपको ले जाएगा, जहाँ पहुँचने पर परम पदकी प्राप्ति होती है। -हरहर महादेव शंम्भो)

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