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मिथिला बिहारी परिक्रमा के नूतन रूप : अजयकुमार झा

 

जहँ जहँ सियाराम पगु धारी।
धन्य हुए मैथिल नर नारी।।)
पिछले वर्ष 2018 में 100 धनुषा के सबैला के जन जागृति कल्ब द्वारा संयोजित हिन्दू भक्तो द्वारा सुरु कार्तिक अक्षय नवमी के दिन यह परिक्रमा इस वर्ष पाँच सय भक्तो की संख्या पार गया। सौकड़ो मोटर साईकिल टेम्पो और बोलेरो स्कार्पियो में मिथिला पहिरन तथा संस्कृति से सज-धज महिला पुरुष के सौन्दर्य दर्शनीय लगा रहा था। उमंग और उत्साह से ओत प्रोत सबके सब मिथिला बिहारी परिक्रमा कर अपने को धन्य पा रहे थें। ( वैसे यह परिक्रमा पिछले सय वर्षो से अधिक से फागुन महिना में होता हैं। जिसमे अधिकाँश लोग पैदल घूमते हैं। हजारों की संख्या में महात्मा तथा नागा लोग रहते हैं। यह पंद्र दिनका होता है। और इसी समय लोग पाँच दिनमे भी घुमते हैं, और 24 घंटा में भी घूमते हैं। तीनो का इकठ्ठा जोड़ लाखों की संख्या को पार कर जाता है) परन्तु इसमे ज्यादातर गृहस्थ भक्त नजर आ रहे थें। सबके सब गाड़ी पे सवार थे। 24 घंटा के भीतर ईस परिक्रमा को पूर्ण करने का प्रावधान बनाए हुए हैं। इस परिक्रमा के सामूहिक सुबिधा के लिए सबैला के लोग विशेष धन्यवाद के पात्र हैं। हिन्दुओं के महान पर्व सीताराम विवाह महोत्सव के पूर्व संध्या में आयोजित यह परिक्रमा नेपाल भारत के हिन्दू प्रेमियों के लिए विशेष संदेस लेके आया है। अब प्रत्येक वर्ष कार्तिक नवमी के दिन यह परिक्रमा हिन्दूओं में एकता और सौहार्दता बढाने के लिए किया जाने का प्रतिबद्धता परिक्रमा प्रेमियों द्वारा किया गया। परंपरागत के तरह ईस परिक्रमा के लिए भी वही 15 प्रमुख स्थान है। जहाँ परिक्रमा बासी कुछ पल बिश्राम कर दर्शन तथा सत्संग करते हैं।हिन्दू प्रेमियों को एक दुसरे परिचय करा एक शुत्र में जोड़ने बाली यह परिक्रमा प्रेम और सदभाव का मजबूत प्रेरणा देता दिख रहा है। अब आवश्यकत है सभी 15 बासा के ग्रामीणों के भीतर इन भक्तो के प्रति अबिलम्ब स्वागत और सम्मान का भाव जगाने का। वैसे जलेश्वर, रताबारा और मरई जो परिक्रमा के विश्राम स्थल के रुपमे है, लोग स्वतस्फ़ुर्त रुपमे इस विषय में चर्चा करते दिखे। उनके स्वागत के लिए खानपान लगायत अन्य सुविधाओं के लिए तत्पर दिखाई दिए। परन्तु इसका विशेष प्रचार कर हम इसे जल्द हीं पर्यटकीय स्वरुप प्रदान कर सकते हैं। यह परिक्रमा एक ओर सांस्कृतिक एकता को बल देता है तो वही धार्मिक और सामाजिक सौहार्दिकता को सबल बनाते हुए विभेद और दुरी को मिटाता है। 15 बासा अर्थात 15 ग्राम में एक रात विश्राम का प्रावधान है। उस गाव के लोग उन सभी परिक्रमा वासियों के लिए रहने खाने पिने और औषधि उपचार का व्यवस्था करते हैं। परन्तु इस बिच में सयौ गाव पड़ता है; जो इस धार्मिक भावना से भावित हैं। हम इस अभियान के जरिए उनलोगों के साथ भी एक हार्दिक सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हो सकते हैं। जो इस क्षेत्र के लिए वरदान सावित होगा। इसके लिए इस भूभाग के पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, सभी धार्मिक स्थान, मठ, मंदिर, संघ, संस्था, शिक्षक, कर्मचारी, व्यापारी, साहित्यकार, कवी, लेखक संत, महंत को आगे आकर पहल करना होगा। नयी तरकीब इजाद करना होगा। इसे भव्यता के साथ साथ उपयोगिता मूलक बनाना होगा। समाज के युवा पीढ़ी के लिए सृजनात्मक संदेस प्रसार-प्रचार करना होगा। जय मिथिला! जय माँ जानकी!!

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