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भारतीय संविधान के 70 साल पूरे

 

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भारत के 70 वें संविधान दिवस के अवसर पर भारत के केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के विचार

70 साल पहले आज के ही दिन 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने देश का संविधान अंगीकार किया था। इन 70 सालों में भारत दुनिया के सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र के रूप में उभरा है, जहां हर नागरिक को समान रूप से मौलिक अधिकार दिए गए हैं। लेकिन एक नागरिक के रूप में हमारे कर्तव्य क्या होने चाहिए और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध से संपन्न भावी पीढ़ी तैयार करने में शिक्षा क्या भूमिका निभा सकती है…
विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र के विशालतम शिक्षा तंत्रों में से एक होने के गौरव के साथ-साथ हमें एक बड़ी जिम्मेदारी का भी अहसास है। हमें पता है कि अच्छी शिक्षा के माध्यम से ही हम नवभारत के निर्माण की आधारशिला तैयार कर सकते हैं। हम लगभग 33 करोड़ विद्यार्थियों के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं और उनके स्वर्णिम भविष्य का निर्माण तभी हो सकता है, जब हम उनका परिचय उन शाश्वत मूल्यों से कराएंगे जो मानवता के आधार स्तंभ हैं।

मुझे लगता है कि अगर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब दूसरा अपनी भावनाओं को उसके समक्ष रखे तो वह धैर्य, सहिष्णुता और सहनशीलता का परिचय दें। हैरानी की बात यह है कि अधिकांश लोकतांत्रिक देश मूल अधिकारों की बात करते हैं, परंतु मूल कर्तव्यों के विषय में मूक हैं। हमारे संविधान में कर्तव्यों का समावेश सोवियत संघ से प्रेरित रहा है। जिस दिन हम अपने विद्यार्थियों को कर्तव्यों का महत्व समझा पाए, हमारी काफी समस्याएं अपने आप ही हल हो जाएंगी।

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जब हम भारत केंद्रित, संस्कारयुक्त शिक्षा की बात करते है तो हमारे सांविधानिक कर्तव्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसमें शामिल हो जाते हैं। देश में 33 साल बाद नई शिक्षा नीति आ रही है। नवाचारयुक्त, मूल्यपरक, संस्कारयुक्त, शोधपरक, अनुसंधान को बढ़ावा देती यह नई शिक्षा नीति देश के सामाजिक-आर्थिक जीवन में नए युग का आगाज करेगी। नई शिक्षा नीति देश को वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए समर्पित है।

बच्चों को यह समझाना अत्यंत आवश्यक है कि विविधता से परिपूर्ण भारत एक देश नहीं बल्कि पूरा उपमहाद्वीप है, जिसके विभिन्न भागों में अलग-अलग रीति रिवाज और अलग-अलग परंपराएं हैं। भारतीय संस्कृति ने मानव सभ्यता की आध्यात्मिक निधि में हमेशा ही बहुत बड़ा योगदान दिया है और इसके सरंक्षण की आवश्यकता है।

यहां हर 10 किलोमीटर पर हमारी बोली बदल जाती है, कुछ 200 किलोमीटर दूर जाने पर हमारे खानपान व परिधान बदल जाते हैं, भाषाएं बदल जाती हैं और 1000 किलोमीटर दूर जाने पर पूरी जीवन शैली के पृथक रंग उजागर होते हैं। इन सब के बावजूद हम सदियों से एकता के सूत्र में जुड़े रहे हैं।

हमारी संस्कृति हमें एकता, समरसता, सहयोग, भाईचारा, सत्य, अहिंसा, त्याग, विनम्रता, समानता आदि जैसे मूल्य जीवन में अपनाकर वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। आज मनुष्य तन-मन की व्याधियों से जूझ रहा है।

विचार से ही हम विश्वगुरु बने थे और फिर विचारों से विजय हासिल करेंगे। डिजिटल युग में हम किस प्रकार शिक्षा के माध्यम से अपने मूल्यों को संरक्षित-संवर्धित करें, यह बड़ी चुन्नौती है। नई शिक्षा नीति से हमने अपने विद्यार्थियों को जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया है।

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मुझे लगता है कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बचपन में विद्यालय के माध्यम से स्वतः ही हो जाती है। मुझे याद है कि सुदूरवर्ती हिमालय अंचल में स्थित मेरे प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा से पहले, हमें अच्छा नागरिक बनाना सिखाया जाता था। प्रार्थना के दौरान हमें सिखाया गया कि किस प्रकार राष्ट्रीय झंडे का सम्मान करें, राष्ट्रगान की गरिमा का ध्यान रखें, किस प्रकार आसपास के स्थान को स्वच्छ बनाएं, कैसे सबके साथ प्रेमपूर्वक रहें।

यह सच है कि उस समय संविधान में वर्णित कर्त्तव्य नहीं थे, पर यह जरूर समझाया गया कि अच्छा इंसान या नागरिक बनने के लिए अच्छा मानव बनना परम आवश्यक है। मुझे लगता है कि आज समाज की जितनी भी विकृतियां हैं, उसके लिए मूल्यपरक शिक्षा का अभाव जिम्मेदार है।

अत्यंत चुनौतीपूर्ण वैश्विक वातावरण में यह हमारा सौभाग्य है कि भारत को अपनी जनसंख्या का अनोखा लाभ मिला है। हम सर्वाधिक युवाओं वाले देश हैं और जहां यह हमें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के युग में बढ़त दिला रहा है, वहीं हमारे समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है कि हम अपनी युवा शक्ति को कैसे सकारात्मक और सृजनात्मक रास्ते पर प्रेरित करें। आज हमें अपने विद्यार्थियों को न केवल सांविधानिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना है, बल्कि एक ऐसा वातावरण बनाना है, जहां सभी अपने कर्तव्यों का पालन पूरी तत्परता और गंभीरता से करें। वर्ष 2055 तक भारत में काम करने वाले लोगों की संख्या सबसे ज्यादा रहेगी।

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ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि हम अपनी युवा पीढ़ी को गुणवत्तापरक, नवाचार युक्त, कौशलयुक्त शिक्षा के साथ मूल्यपरक शिक्षा देकर कर्तव्यों के महत्व को समझाने में सफल हों ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार किए जा सकें। हमारे युवा हर क्षेत्र में मूल्यपरक शिक्षा के माध्यम से उत्कृष्टता हासिल कर सकते हैं। यही उत्कृष्टता देश के सामाजिक और आर्थिक जीवन में प्रगति के नए युग का सूत्रपात करेगी।

मैं समझता हूं कि किसी भी देश की युवा पीढ़ी को सकारात्मक, सृजनात्मक राह पर ले आना बड़ी चुनौती है। नई शिक्षा नीति में मूल्यपरक शिक्षा के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों में कर्तव्यों का महत्व बताने के लिए एक विशिष्ट इको-सिस्टम विकसित करने का प्रयास हो रहा है। नई चुनौतियों का मुकाबला हम अपने विद्यार्थियों के भीतर मानवीय मूल्यों का विकास करके ही कर सकते हैं।

भारतीय समाज के ताने-बाने को मजबूत करने के लिए हम सभी के बीच शांतिपूर्वक सहयोग की भावना होना परम आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि सामुदायिक जीवन में हमें अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यों का न केवल आभास हो, बल्कि उन्हें शांतिपूर्वक निभाने की इच्छाशक्ति भी हम रखें। आपसी समझ और आपसी सहयोग से ही देश की प्रगति सुनिश्चित हो सकती है। कई देशों ने अपने शैक्षिक कार्यक्रमों में नागरिकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि बच्चों को अधिकार और दायित्व समझाकर हम न केवल उनकी मदद कर रहे हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला को मजबूत कर रहे हैं।

अमर उजाला से साभार

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