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आतंकवाद, जिसने बार–बार मानवता को शर्मशार किया : अजयकुमार झा

 

हिमालिनी  अंक  नवंबर  2019 | आज के समय में देश विदेश की सबसे बड़ी समस्या के बारे में अगर पूछा जाये, तो बच्चा–बच्चा भी यही बोलेगा आतंकवाद । आतंकवाद ने हमारी मानसिकता और समाज को इस तरह जकड़ रखा है कि लाख कोशिशों के बाद भी ये जड़ से नष्ट नहीं हो रहा है । जितना हम इसे दबाते हंै, उतना ही विकराल रूप लेकर ये सामने आ जाता है । आतंकवाद गैर कानूनी कार्य है, जिसका मकसद आम लोगों के अंदर हिंसा का डर पैदा करना है । आतंकवाद एक शब्द मात्र नहीं है, यह मानव जाति के लिए दुनिया का सबसे बड़ा खतरा है, जिसे मानव ने खुद निर्मित किया है । कोई भी एक इन्सान या समूह मिलकर यदि किसी जगह हिंसा फैलाये, दंगे फसाद , चोरी, बलात्कार, अपहरण, लड़ाई–झगड़ा, बम ब्लास्ट करता है, तो ये सब आतंकवादी क्रियाकलाप मानी जाएगी और इसका वैचारिक या व्यवहारिक समर्थन अथवा सहयोग आतंकवाद माना जाएगा ।

 

आतंकवाद को हर कोई अपने ढंग से समझता है और परिभाषित भी करता है । जैसे, भारत में स्वतंत्रता की लड़ाई के समय अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियों को आंतंकवादी समझते थे, जबकि वे तो सामूहिक हक के लिए लड़ रहे थे । कई बार हकÞ की लड़ाई लड़ने वाला उग्र हो जाता है, उसे सामने वाला आतंकवादी समझ लेता है । हर हिंसा करने वाला आतंकवादी नहीं होता, लेकिन अहिंसावादी एक भी आतंकवादी न हो, ये भी जरुरी नहीं है ।

आज धर्म मानवता के विनाश के लिए प्रमुख कारक तत्व के रूप में उभर कर सामने आया है । चाहे वह ईराक, सीरिया, इजरेल–प्यालेस्ताइन हो या पाक–अफगानिस्तान हो । भारत–पाक बटबारे का दंगा हो या कश्मीर की समस्या । सब के सब आतंक के चपेटा में हुआ है और हो रहा है ।

धर्म को सही ढंग से समझना होगा । मानवजाति धर्म, जातिवाद के भंवर में इस कदर फंस गई है, कि धर्म के उपर इंसानियत के बारे में सोचती ही नहीं है । धर्म हमारी सुविधा के लिए है,  धर्म अच्छी शिक्षा, ज्ञान की बातें इंसानियत  सिखाता है । दुनिया में प्यार से बड़ी कोई चीज नहीं है, कहते है ‘भगवान् प्यार है, प्यार ही भगवान् है’। (प्रेम से प्रकट होहि भगवाना) तो फिर किसी धर्म को न मानने वाले कापिÞmर कैसे हो जाते है ? कही न कहीं भारी भूल हो रही है या योजना बद्ध षडयंत्र !
किसी समय पशु–पक्षियों और कीट–पतंगों तक को जीव परिवार का सदस्य मानकर उनके साथ सहृदयता का व्यवहार करने की बात पर जोर दिया जाता और जहाँ तक सम्भव हो सके दूसरे प्राणियों को कष्ट न देने की बात पर ध्यान रखा जाता था । पर अब मनुष्य ही गाजर–मूली बनता जा रहा है, जिसे काटने में दूसरों को कोई हिचक नहीं होती वरन् अपने अहं एवं पौरुष की छाप छोड़ने का गर्व अनुभव होता है । कितनी ही हिंसाओं में प्रतिशोध के सूत्र तो बहुत ही स्वल्प होते हैं, अपनी आतंकवादी साहसिकता को चरितार्थ करने की अहमन्यता ही प्रधान काम कर रही होती है । व्यक्तिगत लड़ाई–झगड़े ज्यादा कहा–सुनी तक सीमित नहीं रहते वरन् देर–सवेर में किसी की जान लेकर ही शान्त हो पाते हैं । यह आवेशग्रस्तता सचमुच ही चिन्ता का विषय है, उसके कारण सामाजिक सद्भावना और सुस्थिरता की जड़ें ही हिलती जा रही है ।
भारत बहुत समय से आतंकवाद का शिकार होता रहा है । आतंकवाद भारत की प्रमुख सबसे बड़ी समस्या है, जिसने भारतीय शासन–व्यवस्था को जर्जर कर दिया है ।  कश्मीर, नागालैंड, पंजाब, असम, बिहार आदि विशेषरूप से आतंक से प्रभावित रहे हैं ।
आतंकवाद ने भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि परिस्थितियों को प्रभावित किया है । अगस्त २००८ में ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन का कहना था कि देश में ८०ण् से अधिक आतंकवादी गुट सक्रिय हैं । तो भविष्य में बढ़ने की तीब्रता पर भी ध्यान देने होंगे ।
१४ फरवरी २०१९ जम्मू से कश्मीर जा रहे पुलवामा के पास ऋच्एँ काफिले पर फियादीन हमला किया गया जिसमें ऋच्एँ के द्धद्ध जवान शहीद हुए जिसकी जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित आंतकवादी संगठन जैश–ए–मुहम्मद ने ली ।
मुम्बई, १३ जून २०११ः तीन स्थानों पर बम विस्फोट. ४९ से अधिक मृत तथा सैकड़ों घायल ।
फरवरी, २०१० महाराष्ट्र के पुणे शहर की मशहूर जर्मन बेकरी को आतंकवादियों ने निशाना बनाया । इसमें ज्ञट लोग मारे गए, जिनमें से काफी विदेशी भी थे । एक बार फिर इंडियन मुजाहिदीन को जिम्मेदार ठहराया गया ।
मुंबई, द्दट नवम्बर २००८  भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में आतंकवादियों ने घुसकर तीन दिनों तक दहशत फैलाई. पांचसितारा होटलों और रेलवे स्टेशन पर हुए बम धमाकों में ज्ञटट लोग मारे गए । भारत के ब्लैक कैट कमांडो की कार्रवाई में पाकिस्तानी नागरिक आमिर अजमल कसाब को छोड़ कर सारे आतंकवादी मारे गए । हमले की साजिश पाकिस्तान में रचे जाने की पुष्टि हुई ।
असम, घण् अक्टूबर २००८  असम में १८ आतंकवादी हमलों में कम से कम ७७ लोग मारे गए और सौ से ज्यादा लोग घायल हो गए ।
इंफाल, द्दज्ञ अक्टूबर २००८ः मणिपुर पुलिस कमांडो परिसर के नजदीक शक्तिशाली विस्फोट में १७ लोग मारे गए ।
मालेगाँव (महाराष्ट्र), २९ सितंबर २००८  भीड़भाड़ वाले बाजार में मोटरसाइकिल में रखे विस्फोटकों के विस्फोट होने से पाँच लोगों की मौत ।
मोदासाः (गुजरात), २९ सितंबर २००८  एक मस्जिद के नजदीक कम तीव्रता वाले बम विस्फोट में एक की मौत, कई घायल ।
नई दिल्ली, १३ सितंबर २००८  शहर के विभिन्न हिस्सों में छह बम विस्फोटों में द्दट लोगों की मौत ।
अहमदाबाद, द्दट जुलाई २००८  दो घंटे से कम समय के भीतर २० बम विस्फोटों में  टड लोगों की मौत ।
जयपुर, १३ मई २००८  सिलसिलेवार बम विस्फोट में टड लोगों की मौत ।
रामपुर, जनवरी २००८  रामपुर में सीआरपीएफ शिविर पर आतंकवादी हमले में आठ की मौत।
हैदराबाद, अगस्त २००७  हैदराबाद में आतंकवादी हमले में घण् की मौत, टण् घायल ।
हैदराबाद, मई २००७  हैदराबाद की मक्का मस्जिद में विस्फोट में ११ की मौत ।
फरवरी २००७  भारत से पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन में दो बम विस्फोटों में कम से कम टट यात्री जल मरे, जिनमें अधिकतर पाकिस्तानी थे ।
मालेगाँव, सितंबर २००६  मालेगाँव के एक मस्जिद में दोहरे बम विस्फोट में घण् लोगों की मौत और सौ लोग घायल ।
मुंबई, जुलाई २००६  मुंबई की ट्रेनों में सात बम विस्फोटों में २०ण् से ज्यादा लोगों की मौत और ७०० अन्य घायल ।
वाराणसी, मार्च २००६  वाराणसी के एक मंदिर और रेलवे स्टेशन पर दोहरे बम विस्फोट में २० लोगों की मौत ।
अक्टूबर २००५  दीवाली से एक दिन पहले नई दिल्ली के व्यस्त बाजारों में तीन बम विस्फोटों में टद्द लोगों की मौत और सैकड़ों लोग घायल ।
ज्ञ सितंबर २००४ को रूस के बेसलैन स्कूल में हुए इस हमले को चेचेन आतंकियों ने अंजाम दिया था। इस हमले को आतंकियों द्वारा स्कूली बच्चों को निशाना बनाए जाने वाले हमलों में सबसे बड़े और क्रूर हमले के तौर पर जाना जाता है । उन्होंने घ दिन तक स्कूल में बच्चों समेत ज्ञ१०ण् बंधक बनाए रखा, अंत में स्कूल में मिलिट्री आपरेशन को अंजाम दिया गया, जिसमें आतंकियों समेत घडछ लोगों की मौत हो गई और ठडघ लोग घायल हो गए थे । पाकिस्तान के पेशावर शहर में एक सैनिक स्कूल में तालिबान के हमले में १३द्द बच्चों समेत १४ण् से ज्यादा लोग मारे गए थे । फ्रांस की राजधानी पेरिस में १४ नवंबर २०१५ को नेशनल स्टेडियम के बाहर एक रेस्टोरेंट और कन्सर्ट हॉल में हुई गोलीबारी और धमाकों में ज्ञ२० से ज्यादा लोग मारे गए । हथियारों से लैस आतंकियों ने १०ण् से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था । २३ अक्टूबर २००२ को मास्को में डुबरोवका थियेटर में हथियार बंद आतंकवादियों ने करीब ड५० लोगो को बंधक बना लिया था । इस आतंकी हमले में करीब १३० लोग मारे गए थे और ठ०० से ज्यादा लोग घायल हुए थे । हमले में द्धण् आतंकी भी ढेर हो गए थे ।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ २०१४ में ही जम्मू कश्मीर में २२२ आतंकी हमले हुए हैं । इसके अगले साल २०१५ में २०ड आतंकी हमले हुए । पिछले छ सालों में ये पहली बार था, जब आतंकी हमलों में मामूली कमी आई थी, लेकिन २०ज्ञट से लेकर २०१८ तक आतंकी हमले तेजी से बढ़े. २०१६ में ये आतंकी हमले ५४.८ फीसदी बढ़ गई । २०१७ में भी आतंकी हमलों में मामूली बढ़त हुई और ये हमले ट फीसदी बढ़कर ४३२ पर जा पहुंचे. सबसे अधिक आतंकी हमलों की घटनाएं २०१८ में हुईं, जब इनमें ७९.५३ फीसदी की बढ़त हुई और कुल हमलों की संख्या ६१४ पर जा पहुंची ।
ग्लोबल टैरेरिज्म इंडैक्स (जी.टी. आई.) के अनुसार, सर्वाधिक आतंकवादी घटनाओं की सूची में पहले से छठे स्थान पर क्रमशः ईराक, अफगानिस्तान, नाइजीरिया, सीरिया, पाकिस्तान और सोमालिया का नाम है । वैश्विक क्षेत्र के संदर्भ में भी मुस्लिम बहुल मध्यपूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में सबसे अधिक आतंकी घटनाएं होती हैं । मिस्र, लीबिया, मोरक्को, सूडान, अल्जीरिया, ईरान और यमन सहित कई देशों में २००२–२०१७ के  बीच घघ,ज्ञद्दट आतंकी हमले हुए जिसमें ढज्ञ हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई । इसी तरह दक्षिण एशिया में उसी अवधि में घज्ञ,ढटण् आतंकी हमलों में ५९ हजार से अधिक लोग मारे गए हैं ।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, द्दज्ञ अप्रेल को श्री लंका के चर्च में हुए हमलो में १० भारतीयों और २९ अन्य विदेशियों सहित ३५० से अधिक निरपराधों की जान चली गई और लगभग छ०० घायल हो गए । मृतकों में ४५ बच्चे भी शामिल हैं । तो इससे यही प्रमाणित होता है कि कुछ लोग अपनी इच्छा पूर्ति करने के लिए पागलों की तरह व्यवहार करते हैं, जिसे राजनीतिक लोग तत्कालीन लाभ के हेतु समर्थन कर मानवता को कलंकित करते हैं ।
विचार विज्ञान के मूर्धन्य अन्वेषणकर्ता इस तथ्य का गहरा अध्ययन कर रहे हैं कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है ? ब्रिटेन के दो समाजशास्त्री क्लेअर रसेल और डब्ल्यू एम. रसेल संग्रहित आँकड़ों के आधार पर यह प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हैं कि संसार भर में हिंसा की आग बुरी तरह भड़क रही है । जनसंख्या वृद्धि से भी उसकी अनुपात गति तीव्र है । वैयक्तिक और सामूहिक जीवन में हिंसा का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है । छुटपुट कारणों से उत्पन्न हुए मनमुटाव भी भयंकर हिंसा के रूप में उभरते हैं और उनकी चपेट में प्रतिद्वंद्वियों के निरीह बाल–बच्चे भी आ जाते हैं । धन के लालच में चोरी, ठगी की अपेक्षा ‘सफाया’ करके निश्चिन्ततापूर्वक लाभान्वित होना अधिक सरल ओर सुविधाजनक माना जाने लगा है । प्रायः इस स्तर की मनोवृत्ति न्यूनाधिक मात्रा में सर्वत्र बढ़ रही है ।
एक शोध के अनुसार आतंकवाद के दो कारण हैं ः पहला सामाजिक और राजनैतिक अन्याय, और दूसरा यह विश्वास कि हिंसा या उसकी धमकी प्रभावशाली होगी और बदलाव लाएगी । आजकल अपनी बात को मनवाने व सही साबित करने के लिए आतंकवाद को ही पहला हथियार बनाया जाता है । आतंकवादी के अंदर समाज, देश के प्रति विद्रोह, असंतोष होता है । भ्रष्टाचार, जातिवाद, आर्थिक विषमता, भाषा का मतभेद ये सब आतंकवाद के मूल तत्व हैं, इन्ही के बाद आतंकवाद पनपता है । हिन्दू–मुसलमान जाति के बीच के दंगे सबसे प्रसिद्ध हैं, ऐसी और जाति के बीच मतभेद होने से आतंकवाद आता है । गुजरात में हुआ गोधरा कांड, खालिस्तान की मांग आदि सब क्षेत्रवाद के चलते हुए दंगे है । पैसे कमाने की जल्दी में भी लोग आतंकवाद का दामन थाम लेते है और गलत काम करके रातों रात अमीर बन जाते है ।
आज आतंकवाद सिर्फ भारत की ही समस्या नहीं है, हमारे पड़ोसी देश, और विदेश सभी जगह की सरकारें इससे निपटने के लिए भरपूर कोशिश में लगी हुई है । विश्व का आजतक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का माना जाता है. ११ सितम्बर २००१ में, विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के सबसे ऊँची ईमारत पर ओसामा बिन लादेन ने आतंकवादी हमला करवाया था, जिसके चलते अरबों का नुकसान हुआ और हजारों लोग मलबे के नीचे दब के मर गए थे । याद रहे ! अमेरिका  एक आतंकवादी संरक्षक देश पाकिस्तान को अरबों डालर सहयोग करता रहा है । तो क्या यहाँ प्रश्न नहीं खड़ा होता है, कि आतंकवाद को कैसे परिभाषित करें ?
ध्यान रहे, आतंकवाद बमों में नहीं हैं, किसी के हाथों में नहीं है, वह हमारे अवचेतन में है । हम लड़ना चाहते हैं । हमें मरने मारने में एक प्रकार का पौरुषता, एक प्रकार का सम्मान, एक प्रकार का वीरत्व अनुभव होता है । हमारे अहंकार का पोषण होता है । और यही अहंकार आतंकवाद है, जिसे हम समझने में भूल कर देते हैं । यही अहंकार नए नए रूपों में हमारे समक्ष आ खड़ा होता है । इसके गिरफ्त में पड़ने का भान ही तब होता है, जब हम सद्दाम हुसैन, ओसामा और बगदादी की तरह बर्वाद हो चुके होते हैं । चौहान का अहंकार ही था जिसके पोषण हेतु मोहम्मद गोरी को १७ बार मापÞmी दिया और अठारहवी बार खुद का सर्वनास कर लिए । यही दुर्घटना जिन्ना और नेहरू के सत्ता लोभ तथा व्यक्तिगत अहंकार और गांधी जी को महात्मा कहलाने के अहंकार के पोषण हेतु लाखों निर्दोष को बलि चढ़ा दिया गया । यदि इसके मूल जड़ को उखाड़ फेकने का उपाय नहीं किया गया तो हालात बदतर से बदतर होता चला जाएगा । अभी तो ऐसा लगता है कि सब प्रकार से अंधे लोगों के हाथों में आणविक शक्ति  सौप दिया हो ! लोग  अंधाधुंध बम फेंक रहे हैं । हवाई जहाजों में, बसों और कारों में, अजनबियों के बीच… अचानक कोई आकर बंदूक दाग देता है । और पता चलता है कि हमने उसका कुछ बिगाड़ा नहीं था ।
छोटे जानवरों पर यह प्रयोग करके देखा गया है कि जब वे छिरछिरे, खुले और शान्त वातावरण में रहते थे तब उनकी प्रकृति बहुत शान्त थी, किन्तु जब उन्हें स्वजातियों के साथ भीड़–भाड़ में रखा गया तो वे उत्तेजित और थके माँदे रहने लगे और एक दूसरे पर आक्रमण करने के आदि हो गए ।
वास्तव में जो व्यक्ति सुविधा में या ऐशो आराम में जी रहा है, वह कभी आतंकवादी नहीं बनना चाहेगा। परन्तु धर्मों ने ऐश्वर्य की निंदा की और गरीबी की प्रशंसा की । लोगों ने भावुकता बस गरीबी को आत्म सम्मान का विषय मानकर हृदय से लगा लिया । उपहार में मिला बाहरी और भीतरी गुलामी । फिर धीरे धीरे चेतना जागृत हुई और विद्रोह की आँधी उठने लगी । अब यह गरीबी उनको आतंकवादी होने को मजबूर करने लगी । वे मरने मारने पर अमादा हैं क्योकि उनके पास खोने को कुछ नहीं है । और वे समूचे समाज के खिलाफ उबल रहे हैं, क्योंकि सभी उच्च वर्ग के पास वे चीजें हैं, जो इनके पास नहीं हैं । और वो इसकी परिपूर्ति हेतु किसी हद तक जाने को तैयार रहते हैं । क्योंकि वोट की राजनीति इन्हें संरक्षण और संबर्धन में सहयोग करते हैं । इस प्रकार एक मानवता विरोधी भयानक दुष्चक्र का निर्माण होता है । भारत के बंगाल में रोहिङ्गिया, उत्तर प्रदेस में दलित के नामपर हो रहे राजनीति आदि । वैसे आतंकवाद को बढावा देने, सहजीकरण करने और भीषण नर संहारक बनाने में वैज्ञानिक आविष्कारों का भी उतना ही बड़ा हाथ है । बन्दूक, मशीन गन, तोपें, एटम बम, हाईड्रोजन बम, परमाणु हथियार, मिसाइल आदि का अधिक मात्रा में निर्माण होना और सर्वसुलभ होना भी आत्मघाती कदम है । योजनाबद्ध रूप में तेजी से आबादी बढ़ना, राजनैतिक, सामाजिक, अर्थव्यवस्था तथा देश की व्यवस्था के प्रति आम नागरिक में असंतुष्टि का भाव पैदा होना ।
सृजनात्मक शिक्षा की कमी के कारण पैदा हुए निकम्मापन में गलत संगति में पड़ना स्वाभाविक हो जाता है । परिणामस्वरुप गलत बहकावे में आकर आतंकवाद का दामन पकड़ लेते हैं । आतंकवाद के सामने कई बार सरकार भी कमजोर दिखाई देती है, जिससे लोगों का सरकार पर से भरोसा उठने लगा है । किसी समय माओवादी संगठन और विद्रोह को आतंकावादी का संज्ञा दिया था, लेकिन उसके आगे सरकार झुक गई और आज उसके साथ एकता कर सत्ता का आनंद उठा रही है । जबकि यही लोग माओवाद और आतंकवाद को मुद्दा बनाकर किसी भी सरकार को गिराया और बनाया करते थे । आतंकवाद के चलते लाखों की सम्पति नष्ट हो जाती है, हजारों लाखों मासूमों की जान चली जाती है । जीव–जंतु भी मारे जाते है । मानवजाति का एक दूसरे से भरोसा उठ जाता है । साथ ही एक आतंकवादी गतिविधि देखने के बाद दूसरा आतंकवादी भी पैदा होने लगता है ।
पहले महायुद्ध के दौरान एक आश्चर्यजनक घटना दिखाई दिया । तब कुछ समझ में नहीं पड़ा कि क्यों ऐसा हुआ? आखिर जर्मनी में युद्ध हो रहा हो, या यूरोप की जमीन पर युद्ध हो रहा हो, तो चीन में चोरी कम हो जाती है, हिंदुस्तान में हत्याएं कम होती हैं । लोग कम पागल होते हैं, युद्ध के समय में । फिर दूसरे महायुद्ध में तो बहुत जोर से यह हुआ । तब यह खयाल  आना शुरू हुआ कि जब सामूहिक पागलपन चल रहा हो तो व्यक्तिगत पागलपन की कोई जरूरत नहीं है । वे उसी में रस ले लेते हैं, उसी में निपटारा कर लेते हैं ।  जब सामूहिक हत्या चल रही हो तो हत्या का मजा आ जाता है ।  अर्थात हम मनुष्य हिंसा हत्या में रस लेते हैं । अतः सोचनेवाली बात यह है कि हिंसा वृत्ति क्यों इतनी उग्र होती जा रही है ? इस पर कई दृष्टि से विचार किया गया है । क्या सामाजिक परिस्थितियाँ इतनी विक्षोभकारी हैं कि उनका आघात न सहकर मनुष्य आक्रमणकारी बन बैठे ? क्या आर्थिक कठिनाइयाँ इसके लिए प्रेरित करती हैं ? क्या सामयिक घटनाक्रम इसके लिए उत्तरदायी होते हैं ? क्या वंशानुक्रम से यह सब प्रभावित हो रहा है ? क्या शारीरिक विकृतियाँ ऐसा करती हैं ? क्या आहार–विहार और जलवायु में हो रहे परिवर्तन इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न करते हैं ? आदि प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार किया गया है और इन कारणों को भी अधिक रूप से दोषी ठहराया गया है । किंतु विश्लेषण ने प्रधानता दो कारणों को दी है (ज्ञ) बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण उत्पन्न गन्दगी और भीड़ भाड़ (द्द) मन पर शासन करने और उसे सुसंस्कृत बनाने के प्रशिक्षण का अभाव । इन सारी बातों पर विशेष रूप से समझदारी पैदा करने की आवश्यकता है । इसका गहण विश्लेषण होना जरुरी है ।
पारिवारिक एवं सामाजिक वातावरण यदि संतोषजनक समाधान कारक बना रहे तो उसमें पलने वाले व्यक्ति शान्त प्रकृति के रहेंगे किन्तु यदि पारिवारिक कलह के कारण स्वयं को प्रताडÞित होना पड़े अथवा अनाचार के कारण रोष उभरता रहे तो वह बालकपन के दबे हुए विक्षोभ प्रौढ़ावस्था आने पर प्रबल बनते हैं और वे किसी का प्रतिशोध किसी से लेते हैं । देखा जाता है कि पति से पिटने पर पत्नी अपने बच्चों को मारती है । बाप की डाँट पड़ने पर बड़े लड़के अपने छोटे भाई–बहनों पर बरसते हैं । स्कूल में अध्यापकों से पिटने वाले बच्चे बड़े होकर जब स्वयं अध्यापक बनते हैं तो अपने छात्रों को मारते हैं । मन की यह कैसी अन्धता है कि दबी हुई परतों के उभरने पर, प्रतिशोध लेने पर यह भूल जाता है कि गलती किसकी थी और बदला किससे ले रहे हैं । कही यही से तो नहीं आतंकवाद का भाव प्रस्फुटित हो विस्तार हो रहा है !

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