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जिस दिन औरत को इंसान समझ लिया जाएगा उस दिन स्वतः उसकी परेशानी दूर हो जाएगी : श्वेता दीप्ति

 

नारी को देवी नहीं सिर्फ इंसान समझें
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ।।

डा.श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |अर्थात किसी भी व्यक्ति का मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता है । चाहे आप उसे कितनी भी सलाह दे दो । ठीक उसी तरह जैसे पानी तभी गर्म होता है, जब उसे उबाला जाता है, लेकिन कुछ देर के बाद वह फिर ठंडा हो जाता है ।  जिसका जो स्वाभाविक गुण है, उसे उससे वंचित करने की क्षमता किसी में भी नहीं होती है । हम वही करते हैं जो हम हैं, क्योंकि हम पर बहुत कुछ असर हमारी परवरिश का होता है, हमारी शिक्षा का होता है और उससे भी अधिक आसपास के वातावरण का होता है । जब भी प्रकृति की सुन्दरतम रचना नारी की बात होती है, तो हम उसे देवी बना देते हैं, पर उसी देवी का चीरहरण हर रोज होता है । आखिर क्यों होता है ऐसा ? अगर हम मननशील होकर देखें तो इन सब के पीछे हमारा स्वभाव, हमारी मानसिकता, परवरिश और माहोल का असर होता है । दावे चाहे जितने भी करें पर हम न तो स्वभाव बदल पा रहे हैं और न ही मानसिकता जिसका परिणाम रोज हमारे सामने आता है । नारी हिंसा के कई रूप हमारे सामने होते हैं । समाज के हर स्तर पर चाहे वो सामाजिक हो, मानसिक हो, शारीरिक हो या आर्थिक हो उसे विभेद सहना पड़ता है । आज हर ओर नारी सशक्तिकरण की बात होती है पर सच तो यह है कि, जिस दिन औरत को इंसान समझ लिया जाएगा उस दिन स्वतः उसकी परेशानी दूर हो जाएगी । महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रुण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय । लैंगिक भेदभाव राष्ट्र में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अंतर ले आता है, जो देश को पीछे की ओर ढकेलता है । आज की आवश्यकता नारी को महिमामण्डित करने की नहीं है बल्कि उसे इंसान समझने की है । हर साल विश्व नारी दिवस मनाया जाता है, जो नारी को खुद के अस्तित्व से पहचान कराने का दिन होता है । पर इस दिन के महत्व को यथार्थ में बदलने के लिए समाज के हर तबके को, इस समस्या को आत्मसात् करना होगा और आगे बढ़कर निदान खोजना होगा ।

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मित्र राष्ट्र भारत के पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने विश्व में खलबली मचा दी है । केसर की क्यारियों में बारूद की गंध फैली हुई है । भारत और पाकिस्तान का तनाव विश्व पटल पर चिन्ता का विषय बना हुआ है । उम्मीद करें कि यह तनाव युद्ध का रूप ना ले, क्योंकि युद्ध कभी खुशी नहीं देता, मौत कभी सुकून नहीं देती अगर कुछ देता है तो वह है तबाही का मंजर जो निःसन्देह भयावह होता है ।

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जिस दिन औरत को इंसान समझ लिया जाएगा उस दिन स्वतः उसकी परेशानी दूर हो जाएगी

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