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ये कैसा प्रेम ??? : निशा अग्रवाल

 

ये कैसा प्रेम???
यौवन सरिता में उतरे मनचाहे
रूप मर्दन अधिकार समझ
पीकर मेरी अधर रस मदिरा
मनमाना दैहिक शोषण
ये कैसा प्रेम???

ना जानी मेरी हां या ना
उतर गए क्रीडांगन समझ
भावनाओं का मोल नही
समझा मुझको देह भर
ये कैसा प्रेम????

तेरे चाहतों के पंलग पे
चादर सी बिछी रही मैं
काम अश्व पे सवार तु
एहसास विजेता सा तेरा
ये कैसा प्रेम???

सात फेरों के संग तूने
मुझपे सब अधिकार लिया
मैने चाहा नेह तुम्हारा
तुमने केवल देह पिया
ये कैसा प्रेम???

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देह दीपक जला जला
तू रातें रोशन करता रहा
तिल तिल मैंं मिटती रही
बाती सी घटती रही
ये कैसा प्रेम????
हा ¡कैसा प्रेम????

निशा अग्रवाल
धरान

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