*मिले सुर मेरा तुम्हारा-तो सुर बने हमारा* : लक्ष्मण नेवटिया
*मिले सुर मेरा तुम्हारा-तो सुर बने हमारा*
दूर-दूर तक फैले हरेभरे ,
धान के खेतों के बीच खड़ा हूँ मैं,
मुझे कुछ आभास ही नहीं ,
ऐसा सुनने का अभ्यास ही नहीं
और तुम कहते हो –
मेरा एक पैर नेपाल में और दूसरा भारत में है।
कलकल करती कमला नदी में
नाव चला रहा हूँ मैं,
मुझे कुछ आभास ही नहीं
ऐसा सुनने का अभ्यास ही नहीं
और तुम कहते हो
मेरी नाव का एक सिरा नेपाल में
और दूसरा भारत में है।
मानसूनी बादलों को देख
अपनी ढोलकी पर बारहमासा गाते हुए
थाप दे रहा हूँ मैं,
तुम कहते हो अरे रे रे रूको
ढोलकी का एक कोना नेपाल में
और दूसरा भारत में हैं।
पर कोई मुझे ये तो बताओ
क्या कोई मेरी ढोलकी की ताल को
बह रही मदमस्त बयार को बाँट सकता है,
सदियों के दो मित्र भारत और नेपाल के
जंगलों पहाड़ों नदियों को
बाँटा जा सकता है मैदानों में
पर इनके आपसी विश्वास और सौहार्द को,
बहुत मुश्किल है बाँटना,
उतना ही मुश्किल है भारत और नेपाल की
*मैत्री सुगंध* को बाँधना,
हिमगिरि के उत्तुंग शिखरों के साये में
जहाँ बहती अनेक नदियों की धारा
आओ हम फिर मिलकर गाएँ
*मिले सुर मेरा तुम्हारा
तो सुर बने हमारा*

विराटनगर -९


मैं पिछले नौ बर्षों से “नेपाल-भारत मैत्री संघ” नामक संस्था की सुनसरी जिल्ला स्तरीय कार्यसमिति के कोषाध्यक्ष पद में कार्यरत हूँ।मैंने नेपाल और भारत इन दो देशों के बीच के मैत्री संबंध को काफ़ी नज़दीक से महसूस किया है और इस संबंध को सुदृढ़ और मजबूत बनाने के लिए संस्था के हर प्रयास में नेतृत्व किया है।इन दोनों देशों के बीच के मैत्री संबंध को शब्दों में बयाँ करना नामुमकिन है।ये संबंध केवल राजनीतिक और सामाजिक स्तर से ही नहीं अपितु जनस्तर से निभाए जाते हैं।आपने अपनी इस कविता के माध्यम से इन दोनों देशों के बीच के आपसी मैत्रीपूर्ण संबंध के जो आयाम प्रस्तुत किये हैं,उसकी जितनी प्रशंसा की जाये,कम होगी।बहुत सुंदर और भावपूर्ण लेखन के लिए मेरी हार्दिक बधाई और साधुवाद ।आपको कोटिशः नमन।