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दो दशक तक चीन की कैद में रहने वाले तिब्बती बौद्ध भिक्षु का 61 साल की उम्र में निधन,

 

Tibetan political prisoner Ngawang Gyaltsen released | Free Tibet

1987 के ल्हासा विद्रोह में भाग लेने के लिए 17 साल की सजा काटने वाले एक तिब्बती बौद्ध भिक्षु का 61 साल की उम्र में निधन हो गया है। रेडियो फ्री एशिया की रिपोर्ट मुताबिक ल्हासा के डेपुंग मठ के 21 भिक्षुओं में से एक न्गवांग ग्यालत्सेन का निधन 21 फरवरी की शाम करीब 5:30 बजे हुई। ग्यालत्सेन 1987 में दलाई लामा और तिब्बती स्वतंत्रता के समर्थन में सड़कों पर उतरे थे। राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करने, अलगाववाद भड़काने और जासूसी आदि के आरोप में चीन सरकार ने उन्हें दोषी ठहराया था। ग्यालत्सेन 2006 में हुई रिहाई तक जेल में थे।

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1987 के विद्रोह में भाग लेने वाले एक अन्य भिक्षु नगवांग वोएबर ने रेडियो फ्री एशिया से बात करते हुए कहा है कि एक और राजनीतिक कैदी के निधन के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ। हमें अपनी प्रार्थना करनी चाहिए और उनके निधन के साथ निर्वासित तिब्बती युवाओं को तिब्बत के अंदर हमारे भाइयों और बहनों के साहस, दृढ़ संकल्प और आकांक्षा का एहसास होना चाहिए।

रिहाई के बाद भी करते रहे चीन का विरोध

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ग्यालत्सेन ने अपना पूरा जीवन तिब्बत में दमनकारी चीनी नीतियों के खिलाफ समर्पित कर दिया। उन्होंने 1987 के विद्रोह के बाद और 2006 में रिहाई के बाद भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का लगातार विरोध किया। रिहाई के बाद वह नागचु काउंटी में शग रोंगपो गादेन दरग्यालिंग मठ में पहुंचे थे। उन्होंने थांगका पेंटिंग का अध्ययन किया था और रिचुअल डांस में कुशल थे।

मठ छोड़ने पर मजबूर किया गया

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यहां कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों द्वारा उन्हें मठ छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया, उनके आंदोलनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उन्हें किसी से संपर्क करने की इजाजत तक नहीं दी गई थी। फरवरी 2015 में भी पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। उनपर कई अज्ञात आरोपों के तहत मुकदमा चलाया गया और उन्हें ल्हासा में द्रापची जेल भेज दिया गया। यहां उन्हें करीब तीन सालों तक रखा गया था।

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