Sun. Aug 16th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

पिघलते ग्लेशियर और अत्यधिक मानव गतिविधियों के कारण नेपाल एवरेस्ट बेस कैंप को हटाएगा

 

काठमांडू.

नेपाल एवरेस्ट बेस कैंप को हटाने की तैयारी कर रहा है, क्योंकि पिघलते ग्लेशियर और अत्यधिक मानव गतिविधियों ने इसे असुरक्षित बना दिया है. बीबीसी में प्रकाशित खबर के मुताबिक तेजी से पिघल रहे खुंबू ग्लेशियर पर यह कैंप लगाया जाता है, जिसका इस्तेमाल बसंत में चढ़ाई के मौसम में करीब 1500 लोग इस्तेमाल करते हैं. अब कैंप के लिए नई साइट तलाशी जा रही है जो नीचे होगी और जहां पूरे साल बर्फ नहीं होती है.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, शोधार्थियों का कहना है कि पिघला हुआ पानी ग्लेशियर को अस्थिर कर देता है और पर्वतारोहियों का कहना है कि उन्हें सोते वक्त ग्लेशियर में दरारें दिखाई देती हैं. इस मामले पर नेपाल पर्यटन विभाग के महानिदेशक तारानाथ अधिकारी का कहना है कि हम किसी दूसरी जगह जाने की तैयारी कर रहे हैं और जल्दी ही इस विषय पर परामर्श शुरू करेंगे.

5,364 मीटर की ऊंचाई पर है वर्तमान कैंप
यह कैंप वर्तमान में 5,364 मीटर की ऊंचाई पर लगे हैं. जो नई जगह देखी जा रही है वह 200 से 400 मीटर नीचे होगी. इसके लिए नेपाल सरकार ने एक समिति का गठन किया है जिसकी सिफारिश के आधार पर एवरेस्ट क्षेत्र में पर्वतारोहण की सुविधा और निगरानी पर ध्यान दिया जाएगा.

यह भी पढें   भारतीय प्रधानसेनापति जनरल धीरज सेठ आज काठमांडू आएंगे

खुंबु ग्लेशियर पिघल रहे
वैज्ञानिकों ने पाया है कि हिमालय क्षेत्र के दूसरे ग्लेशियर की ही तरह खुंबु ग्लेशियर भी तेजी से पिघल कर पतला हो रहा है जो ग्लोबल वार्मिंग की ओर इशारा करता है. 2018 में कुछ अहम विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने एक अध्ययन किया जिसमें पाया गया कि बेस कैंप के निकट का क्षेत्र 1 मीटर प्रति वर्ष की दर से पतला हो रहा है.

बर्फ की चट्टानों के पिघलने से अस्थिर हो रहा है ग्लेशियर
शोधार्थियों का कहना है कि ज्यादातर ग्लेशियर चट्टानी मलबे से ढके रहते हैं, लेकिन कुछ क्षेत्र बर्फ से भरे हैं जिन्हें बर्फ की चट्टान कहा जाता है. इन चट्टानों के पिघलने से ग्लेशियर अस्थिर हो रहा है. जब बर्फ की चट्टानें पिघलती हैं, तो बड़े बड़े पत्थर और चट्टानों का मलबा जो बर्फ की चट्टानों के ऊपर होता है वह हिल कर गिरने लगता है और बर्फ के पिघलने से पानी के स्रोत भी बन जाते हैं. इस तरह ग्लेशियर की सतह पर पानी के बहने और चट्टानों के गिरने से तबाही हो सकती है.

यह भी पढें   पार्टी में काम नहीं करना है तो घर बैठने से होगा – ओली

हर साल 95 लाख क्यूबिक मीटर पानी खो रहे हैं ग्लेशियर
शोधार्थियों का कहना है कि ग्लेशियर हर साल 95 लाख क्यूबिक मीटर पानी हर साल खो रहे हैं. पर्वतारोहियों और नेपाली अधिकारियों का कहना है कि बेस कैंप के ठीक बीच में एक धारा का लगातार विस्तार हो रहा है. पर्वतारोहियों का कहना है ग्लेशियर की सतह पर लगातार और बार बार दरारें नजर आ रही हैं.

बेस कैंप लगाने वाले बताते हैं कि चट्टानों के हिलने की वजह से लगातार तेज आवाज सुनाई देती है. उनका कहना है कि बेस कैंप में टैंट लगाने से पहले बर्फ से ढकी चट्टानी सतह को समतल करना ज़रूरी होती है. पहले हर दो से तीन हफ्तों में यह समतल जगह पर उभार बन जाते थे, लेकिन अब ऐसा लगभग हर हफ्ते होने लगा है.

यह भी पढें   आज तीन संसदीय समितियों की बैठक

ह्यूमन एक्टिविटी भी इसकी वजह
बेस कैंप को हटाने की सलाह देने वाली समिति के एक अहम सदस्य का कहना है कि बेस कैंप में बहुत सारे लोगों की उपस्थिति की वजह से यह समस्याएं खड़ी हो रही हैं. मसलन हमने पाया कि रोजाना करीब 4000 लीटर पेशाब बेस कैंप में किया जाता है. इसके साथ ही खाना बनाने और खुद को गर्म रखने के लिए बड़ी मात्रा में केरोसिन और गैस जलाई जाती है. जिसका निश्चित तौर पर ग्लेशियर की बर्फ पर असर पड़ रहा है. नेपाली अधिकारियों का कहना है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद वर्तमान बेस कैंप से तीन से चार साल तक काम चल सकता है. लेकिन 2024 से इसे हटाया जा सकता है.

 

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com