संसारी माता की भव्यता,
जलेश्वर । प्रत्येक पांच वर्ष पर होनेवाली संसारी माता की पूजा को तीन महीना की कड़ी मेहनत के बाद जेष्ठ 26 गत्ते को ऐतिहासिक कीर्ति, भव्यता और सफलता के साथ सुसंपन्न हुआ। इसका प्रमुख श्रेय जलेश्वर नगरपालिका के नगर प्रमुख श्री सुरेश साह सोनार जी को जाता है। वैसे समिति के सभी सदस्यगण सम्मान के काबिल हैं। व्योम मार्ग से पुष्प वृष्टि कर भक्तों जो स्वागत और सम्मान किया गया उसके लिए मटिहानी के मेयर श्री हरि मंडल जी और सुरेश साह सोनार जी विशेष धन्यवाद के पात्र हैं। विगत एक हफ्ता से जलेश्वर नई नवेली दुलहन की संसारी माता के पूजन और भक्तो को स्वागत करने के लिए सजधज के इंतजार कर रही थी। भक्तों के लिए नगरपालिका चौक पर रासलीला तथा कथा श्रवण के लिए उत्कृष्ट व्यवथा किया था तो वहीं बच्चों के लिए नाना भांति के मनोरंजनात्मक खेलकूद की व्यवस्था की गई थी। ट्रैफिक पुलिस अपनी जिम्मेबारिको बखूबी के साथ निर्वाह करते आ रहे थे। प्रशासन और नेपाल सेना के सहयोग भी प्रशंसनीय रहा। कही किसी प्रकार की कमी नहीं देखी गई। एक हफ्ता में 10 लाख से अधिक के भीड़ को जिस सहजता के साथ सुव्यवस्थित किया गया वह काबिले तारीफ ही नहीं बल्कि भूतो न भविष्यति लग रहा है।
संसारी माता, जिन्हें माँ दुर्गा, जगदम्बा, जगतजननी, आदिशक्ति आदि नामों से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में पूजे जाने वाली एक प्रमुख देवी हैं। वे देवी दुर्गा के रूप में भी प्रस्तुत होती हैं और विभिन्न अवतारों के रूप में भी पूजी जाती हैं, जैसे मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, मां काली, मां चामुंडेश्वरी आदि।
संसारी माता को भगवान विष्णु और भगवान शिव की पत्नी या शक्ति के रूप में माना जाता है। वे परिवार की संरक्षक और सृष्टि की रक्षक हैं। पवित्रता के स्नान, पूजा, व्रत और ध्यान द्वारा प्राप्त होने वाले सात्विक ज्ञान और आनंद की प्रतीक माने जाते हैं। संसारी माता को शक्ति, सामरिकता, स्थायित्व, सौंदर्य और सर्वशक्तिमान दिव्यता की अधिष्ठात्री माना जाता है। अनंत रूप होने के कारण उन्हें दस हाथ और तीसरी आँखों के साथ दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल होता है, जिससे वे अधर्म को नष्ट करती हैं, और दूसरे हाथ में छड़ी होती है, जिससे वे आपदा को नष्ट करती हैं। उनकी वाहनी शेर होती है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। वे शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि और सुख की देवी मानी जाती हैं और उनकी कृपा से अपने भक्तों को सम्पूर्णता मिलती है।
यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि उत्तर और दक्षिण भारतीय प्रदेशों में, जैसे कि बंगाल, असम, ओडिशा, तमिलनाडु आदि, संसारी माता की पूजा और उनके अवतारों की पूजा काफी प्रचलित है। यहां पर उनकी पूजा के अनुसार विभिन्न रीति-रिवाज, व्रत, आरती और भजनों को पालन किया जाता है। संसारी माता की पूजा भारत के विभिन्न हिंदू मंदिरों और शक्ति पीठों में होती है। यह पूजा उन क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रमुख है जहां देवी दुर्गा की पूजा आदिकाल से ही प्रचलित है। निम्नलिखित कुछ प्रमुख स्थानों पर संसारी माता की पूजा की जाती है: वैष्णोदेवी मंदिर, जम्मू और कश्मीर: यह मंदिर संसारी माता को समर्पित है और यहां प्रतिवर्ष लाखों भक्तों द्वारा दर्शन किए जाते हैं। कालीघाट मंदिर, कोलकाता: कालीघाट मंदिर भारत में सबसे प्रसिद्ध दुर्गा मंदिरों में से एक है, जहां संसारी माता को मां काली के रूप में पूजा जाता है। कामाख्या मंदिर, असम: कामाख्या मंदिर असम के गुवाहाटी के पास स्थित है और यह तंत्रिक और शक्ति पीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहां पर्याटक और भक्त उन्नत धार्मिक महत्व के साथ आते हैं। कमाख्या मंदिर, ओडिशा: यह ओडिशा के पुरी शहर में स्थित है और संसारी माता को योगिनी के रूप में पूजा जाता है। मनिकर्णिका मंदिर, वाराणसी: मनिकर्णिका मंदिर वाराणसी में स्थित है और यह शक्ति पीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। संसारी माता को यहां पूजा जाता है और उनकी कृपा की कामना की जाती है। इसके अलावा अन्य कई स्थानों पर भी संसारी माता की पूजा होती है जैसे नागा पर्वत, मां चामुंडेश्वरी मंदिर (मैसूर), मां विशालाक्षी मंदिर (चेन्नई) आदि। इन स्थानों पर वर्ष भर में यात्री और भक्त आकर्षित होते हैं और संसारी माता की अद्भुतता का आनंद लेते हैं।
संसारी माता को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है ‘महिषासुर का वध करने वाली’। उन्होंने देवी दुर्गा के रूप में अवतार लेकर महिषासुर नामक राक्षस को परास्त किया था। यह प्रतीकवादी रूप संसारी माता की महिमा को प्रकट करता है, जो अधर्म को नष्ट करके धर्म को स्थापित करती हैं। संसारी माता को सर्वशक्तिमान और दिव्य शक्ति की अधिष्ठात्री माना जाता है। उन्हें सृष्टि, स्थिति और प्रलय की अद्भुत शक्ति प्राप्त है और वे संसार की सृजनहारिणी हैं।
संसारी माता को संरक्षण की देवी माना जाता है। उनकी कृपा से भक्तों को रक्षा मिलती है और उन्हें शांति, सुरक्षा और संयम का आदान-प्रदान करती हैं।
संसारी माता की पूजा और आराधना सौभाग्य, समृद्धि, खुशहाली और आनंद के लिए की जाती है। उनकी कृपा से भक्तों को धन, स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
संसारी माता की महिमा का वर्णन करना बहुत असंभव है, क्योंकि उनकी महिमा असीम है और व्यापक है। उन्हें दुर्गा, काली, चामुंडेश्वरी, वैष्णोदेवी और अन्य अवतारों के रूप में पूजा जाता है और उनके गुणों और महिमा का आदर्श भक्तों को प्रदर्शित किया जाता है। उनकी पूजा और आराधना उनके भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक सुख-शांति का आनंद प्रदान करती है।
नोट: आज सुबह चार बजे हजारों के संख्या में लोग अपने अपने देश, घर और स्थान को लौट रहे थे। और मधुर मुसकान के साथ गुणगुना रहे थे।
” पूजा जे करैले मेयरा, शोर तु मचैले; घरे घरे हंडिया चढ़यले रे।
देश आ विदेशबा से लोग तू बोलयले; जलेसर में कुम्भ लगएले रे।। 1
रास तू देखयले मेयरा, जागरन देखयले; माता जी दर्शन करयले रे।
धन्य भेली मिथिला बासी, धन्य तू हुँ भेले; देवता बनि फूल बरसयले रे।। ” अजय












