नेपाल में पूर्व राजा का पुनरागमन: समाधान या भ्रम? : डॉ.विधुप्रकाश कायस्थ

डॉ. विधुप्रकाश कायस्थ, काठमांडू । नेपाल आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। 2008 में गणतंत्र की स्थापना के साथ शुरू हुआ नया युग, जो समानता और समृद्धि का वादा लेकर आया था, आज बुजुर्ग नेताओं (बृध्द नेतातन्त्र) की गलतियों और अक्षमताओं के बोझ तले दबा हुआ है। सड़कों पर अशांति, युवाओं में निराशा और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें इस गणतंत्र की विफलताओं को उजागर करती हैं। ऐसे में कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या गणतंत्र नेपाल में इन बुजुर्ग नेताओं की गलतियों का समाधान एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति—पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की वापसी—से हो सकता है? यह लेख इस सवाल की पड़ताल करता है और तर्क देता है कि नेपाल का भविष्य न तो पुराने नेताओं के भरोसे है और न ही राजशाही की वापसी में, बल्कि एक नए, समावेशी और गतिशील नेतृत्व में है।
गणतंत्र की विफलताएँ और बुजुर्ग नेतृत्व
नेपाल का गणतंत्र, जो दशकों के संघर्ष और जनआंदोलन का परिणाम था, आज अपनी नींव पर ही सवालों के घेरे में है। प्रमुख राजनीतिक दल—नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और अन्य—ऐसे बुजुर्ग नेताओं के हाथों में हैं जो सातवें और आठवें दशक में जी रहे हैं। ये नेता, जो कभी क्रांति के प्रतीक थे, अब सत्ता की कुर्सी से चिपके हुए हैं, और उनकी नीतियाँ व प्राथमिकताएँ आधुनिक नेपाल की जरूरतों से कट चुकी हैं।
इन नेताओं की गलतियाँ असंख्य हैं। भ्रष्टाचार (ठग नेतातन्त्र) ने राज्य के संसाधनों को लूट लिया है, जिससे अस्पताल, स्कूल और सड़कें बदहाल हैं। गठबंधन की अस्थिर राजनीति ने सुशासन को कमजोर किया है, और बार-बार बदलती सरकारों ने विकास को ठप कर दिया है। युवाओं में बेरोजगारी की दर 20% के आसपास है, और लाखों नेपाली रोजगार के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं। संविधान, जिसे 2015 में ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा गया, आज भी पूर्ण रूप से लागू नहीं हुआ है, और क्षेत्रीय व जातीय समूह अपनी उपेक्षा की शिकायत करते हैं। इन सबके बीच, बुजुर्ग नेताओं ने न तो जवाबदेही दिखाई और न ही नेतृत्व को नई पीढ़ी को सौंपने की इच्छा।
सड़कों पर अशांति और युवाओं का विद्रोह
नेपाल की सड़कें आज असंतोष का पर्याय बन चुकी हैं। आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और अवसरों की कमी ने युवाओं को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया है। 28 मार्च, 2025 को राजशाही समर्थकों का हिंसक प्रदर्शन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। काठमांडू की सड़कों पर पत्थरबाजी, आंसू गैस और पुलिस के साथ टकराव ने देश को हिलाकर रख दिया। यह आंदोलन केवल राजशाही की वापसी की मांग नहीं था, बल्कि गणतंत्र के प्रति गहरे अविश्वास का प्रतीक था।
युवा, जो नेपाल की आबादी का 40% से अधिक हिस्सा हैं, इस व्यवस्था से सबसे ज्यादा निराश हैं। सोशल मीडिया पर उनकी आवाजें गूंज रही हैं, जहाँ वे नेताओं की विलासिता और जनता की बदहाली की तुलना करते हैं। वे नौकरियाँ चाहते हैं, बेहतर शिक्षा चाहते हैं, और सबसे बढ़कर, एक ऐसा नेतृत्व चाहते हैं जो उनकी आकांक्षाओं को समझे। लेकिन बुजुर्ग नेताओं ने उनकी इन मांगों को बार-बार अनसुना किया है, जिससे युवाओं का गुस्सा अब विद्रोह में बदल रहा है।
पूर्व राजा की वापसी: एक भ्रामक समाधान
ऐसे में कुछ लोग पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की वापसी को समाधान के रूप में देख रहे हैं। 77 वर्षीय ज्ञानेंद्र, जिनका शासन 2008 में समाप्त हुआ, उनके समर्थकों का तर्क है कि राजशाही स्थिरता और एकता का प्रतीक थी, जो गणतंत्र में खो गई है। वे दावा करते हैं कि राजा भ्रष्टाचार से मुक्त थे और देश को एकजुट रख सकते थे। मार्च के हिंसक प्रदर्शन में भी यही भावनाएँ उभरीं, जहाँ कई युवाओं ने भी राजशाही के समर्थन में नारे लगाए।
लेकिन क्या यह समाधान वास्तव में व्यवहारिक है? इतिहास इसका जवाब नकारात्मक देता है। ज्ञानेंद्र का शासन स्वयं विवादों से घिरा था। 2005 में उनके द्वारा लोकतंत्र को निलंबित करना और सत्ता अपने हाथों में लेना जनता के गुस्से का कारण बना था, जिसने अंततः राजशाही के पतन को जन्म दिया। राजशाही के दौरान भी जातीय और क्षेत्रीय समूह उपेक्षित थे, और आर्थिक विकास सीमित था। एक बुजुर्ग पूर्व राजा, जो अब आधुनिक नेपाल की जटिलताओं से दूर हैं, क्या वैश्वीकरण, प्रौद्योगिकी और युवा आकांक्षाओं के युग में देश को आगे ले जा सकते हैं? यह एक भ्रामक आशा है।
यह विडंबना ही है कि गणतंत्र के बुजुर्ग नेताओं की विफलताओं का जवाब लोग एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति में खोज रहे हैं। दोनों—चाहे गणतंत्र के नेता हों या पूर्व राजा—उसी पुरानी पीढ़ी का हिस्सा हैं, जो बदलते समय के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ रही है। नेपाल को जरूरत है एक ऐसे नेतृत्व की, जो युवा, गतिशील और समावेशी हो, न कि पुरानी व्यवस्थाओं की पुनरावृत्ति की।
समाधान का रास्ता
नेपाल का भविष्य न तो बुजुर्ग नेताओं के हाथों में सुरक्षित है और न ही राजशाही की वापसी में। असली समाधान व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव से आएगा। सबसे पहले, राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना होगा। नेतृत्व में उम्र की सीमा और योग्यता को प्राथमिकता देकर नई पीढ़ी को मौका देना होगा। उदाहरण के लिए कुछ दलों ने उम्र सीमा लागू करने की कोशिश की थी, लेकिन उसे वरिष्ठ नेताओं के दबाव में रद्द कर दिया गया। इसे पुनर्जनन की दिशा में एक कदम के रूप में फिर से लागू करना चाहिए।
दूसरा, भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए स्वतंत्र संस्थाओं को सशक्त करना होगा। पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था और जवाबदेही सुनिश्चित करके जनता का विश्वास जीता जा सकता है। तीसरा, आर्थिक नीतियों को युवा केंद्रित करना होगा। रोजगार सृजन, बेहतर शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण से युवाओं को देश में ही अवसर मिल सकते हैं, जिससे विदेश पलायन कम होगा।
सिविल सोसाइटी और मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ये भ्रष्टाचार को उजागर कर सकते हैं और सुधार की मांग को बल दे सकते हैं। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चाहिए कि वह नेपाल के लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने में मदद करे, न कि भ्रष्ट नेताओं को संरक्षण दे।
निष्कर्ष
नेपाल आज एक दोराहे पर खड़ा है। गणतंत्र के बुजुर्ग नेताओं की गलतियाँ—भ्रष्टाचार, अक्षमता और युवाओं की उपेक्षा—ने देश को अशांति और अविश्वास के भँवर में धकेल दिया है। लेकिन इसका समाधान पूर्व राजा ज्ञानेंद्र जैसे एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति की वापसी में नहीं है। यह पुराने युग की ओर लौटना होगा, जो पहले ही अपनी असफलता सिद्ध कर चुका है। नेपाल को चाहिए एक नया नेतृत्व—युवा, उत्साही और जनता के प्रति जवाबदेह। गणतंत्र को बचाने और इसे सच्चा लोकतंत्र बनाने के लिए अब समय है कि देश की बागडोर उस पीढ़ी को सौंपी जाए, जो भविष्य का निर्माण कर सकती है। केवल तभी नेपाल की सड़कें शांति और आशा का प्रतीक बनेंगी।


