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कैसे बनीं सुशीला कार्की प्रधानमंत्री ?

 

 

फोटो साभार, ऑनलाइन खबर

काठमांडू, 27 भाद्र 2082 (12 सितम्बर 2025)

नेपाल की राजनीतिक हलचल के बीच राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया। उन्होंने संविधान के धारा–61 का हवाला देते हुए पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की को देश की नई प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

संविधान का प्रावधान और विवाद

अब तक नेपाल में सभी सरकारें संविधान के धारा 76 के आधार पर बनती रही थीं, जिसमें बहुमत, गठबंधन और समर्थन की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दर्ज है। लेकिन इस बार राष्ट्रपति ने सीधा धारा 61 का प्रयोग किया, जिसमें केवल राष्ट्रपति की भूमिका—राष्ट्राध्यक्ष के रूप में कार्य करना, संविधान और संघीय कानून का पालन करना, तथा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना—का उल्लेख है।

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धारा 61 में प्रधानमंत्री नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद राष्ट्रपति पौडेल ने उसी आधार पर कार्की को नियुक्त कर दिया। यही कारण है कि यह फैसला राजनीतिक और कानूनी रूप से बहस का विषय बन गया है।

जेन–जी आन्दोलन का दबाव

यह फैसला अचानक नहीं हुआ। पिछले कई हफ्तों से चले आ रहे जेन–जी आन्दोलन ने राजनीतिक परिदृश्य को हिला दिया था। युवाओं का यह आन्दोलन पुरानी राजनीतिक शैली और दलगत यथास्थितिवाद के खिलाफ खड़ा हुआ था।

इसी जनदबाव के कारण राष्ट्रपति को कठोर कदम उठाउन बाध्य भएको बताइन्छ। आंदोलनकारी युवाओं की मांग थी कि एक गैर–राजनीतिक, निष्पक्ष और ईमानदार व्यक्ति को कार्यकारी नेतृत्व दिया जाए। सुशीला कार्की की छवि न्यायपालिका में कठोर, भ्रष्टाचार–विरोधी और स्वतंत्र रही है, यही कारण था कि आन्दोलनकारियों ने उन्हें प्रधानमंत्री के लिए उपयुक्त चेहरा माना।

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कार्की की नियुक्ति का महत्व

सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला प्रधानन्यायाधीश रह चुकी हैं और अब वह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री भी बनीं। उनका प्रधानमंत्री पद पर पहुँचना नेपाली राजनीति के लिए ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।

हालाँकि, संविधान की व्याख्या को लेकर प्रश्न खड़ा हो गया है—क्या राष्ट्रपति के पास वास्तव में इस तरह की नियुक्ति का अधिकार था? या यह सिर्फ आन्दोलन के दबाव में लिया गया एक असंवैधानिक निर्णय है?

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आगे की चुनौती

अब कार्की के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—

  • आन्दोलनरत युवाओं की आशा पूरा करना,
  • राजनीतिक स्थिरता कायम करना,
  • और संविधान के प्रावधानों के भीतर रहते हुए शासन चलाना।

उनकी नियुक्ति से यह भी संकेत मिलता है कि नेपाल अब एक नई राजनीतिक प्रयोगशाला की ओर बढ़ रहा है, जहाँ पारंपरिक दलों की पकड़ कमजोर होती जा रही है और जनता सीधे हस्तक्षेप की मांग कर रही है।

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