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तपस्या की प्रतीक मानी जाने वाली मां ब्रह्मचारिणी त्याग और दृढ़ इच्छाशक्ति का संदेश देती हैं

 

तपस्या की प्रतीक मानी जाने वाली मां ब्रह्मचारिणी भक्तों को संयम, त्याग और दृढ़ इच्छाशक्ति का संदेश देती हैं। इस दिन उनकी पूजा-अर्चना करने से जीवन में स्थिरता, ज्ञान और हर क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति होती है। खासकर विद्यार्थी व साधक वर्ग के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना जाता है। आइए, जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी के स्वरूप, पूजा विधि, मंत्र जाप, स्तुति के नियम के बारे में…
मां ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप
नवदुर्गा के दूसरे रूप मां ब्रह्मचारिणी का नाम संस्कृत के दो शब्दों ‘ब्रह्म’ (तपस्या) और ‘चारिणी’ (आचरण करने वाली) से मिलकर बना है। वे मां पार्वती का ही वह रूप हैं, जब उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए वर्षों की कठोर साधना की। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मां का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और शांत है। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं, दाएं हाथ में जपमाला धारण किए हुए हैं, जो भक्ति और जप की प्रेरणा देती है, जबकि बाएं हाथ में कमंडलु है, जो तपस्या का प्रतीक है।
उनका वर्ण स्वर्णिम चमकदार है, नेत्र गंभीर और मुख में सौम्य मुस्कान। मां को सफेद और पीला रंग अत्यंत प्रिय है, जो पवित्रता व ज्ञान का बोध कराता है। उनकी आराधना से भक्तों के मन में वैराग्य की भावना जागृत होती है और जीवन की कठिनाइयों के बीच भी कर्तव्य पथ पर दृढ़ता बनी रहती है।
पूजा विधि
सुबह जल्दी उठें, शुद्ध जल से स्नान करें। स्वच्छ सफेद या पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और स्वास्तिक या रंगोली बनाएं।
यदि कलश स्थापना कल ही हो चुकी है, तो उसे जलाएं। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और उन्हें दूर्वा, मोदक अर्पित करें।
मां की मूर्ति या चित्र को पीले आसन पर स्थापित करें। उन्हें दूध, दही, घी, शहद और चीनी यानी पंचामृत से स्नान कराएं। फिर पीले वस्त्र, चंदन, कुमकुम और पीले फूल अर्पित करें। विशेष रूप से गुड़हल और कमल के फूल चढ़ाएं, क्योंकि ये मां को अत्यंत प्रिय हैं।
ध्यान केंद्रित कर मंत्रों का जाप करें। जाप के दौरान कमंडलु या माला हाथ में लें। जाप की संख्या 108 होनी चाहिए। स्तुति के बाद दुर्गा सप्तशीती का पाठ करें।
आरती उतारें और भोग लगाएं। आरती के बाद प्रसाद वितरित करें। पूजा के अंत में मां से क्षमा याचना करें।
इस विधि का पालन करने से पूजा सिद्ध होती है और मां की कृपा प्राप्त होती है।
मंत्र जाप और स्तुति
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में मंत्र जाप का विशेष महत्व है। ये मंत्र न केवल दोष नाश करते हैं, बल्कि कुंडलिनी शक्ति को जागृत भी करते हैं। मां की पूजा के दौरान आप इन मंत्रों का जाप कर सकते हैं…
बीज मंत्र: “ह्रीं श्री अम्बिकायै नमः”। इसका जाप 108 बार करें। यह मां को तुरंत प्रसन्न करता है और तपस्या की शक्ति प्रदान करता है।
स्तुति मंत्र: “या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।” इस मंत्र से मां के सभी रूपों की स्तुति होती है।
मुख्य पूजा मंत्र: “दधाना करपाभ्यामक्षमालाकमंडलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।” यह मंत्र मां के स्वरूप का वर्णन करता है और सिद्धि प्रदान करता है।
व्रत के नियम
नवरात्रि का व्रत रखने वाले इस दिन फलाहार करें। ब्रह्मचारिणी व्रत में नमक का त्याग करें और गुड़ या चीनी का सेवन करें।
सुबह फल, दूध या पंचामृत लें। रात में एक समय भोजन करें, जिसमें सात्विक व्यंजन हों। तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित है।
क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। पूजा स्थल पर नियमित ध्यान करें।
महिलाएं इस व्रत से पति सुख प्राप्त करती हैं, जबकि पुरुष तपस्या की शक्ति पाते हैं। व्रत 24 घंटे का हो या तीन दिन का, लेकिन संकल्प लें।
इन नियमों का पालन न करने से व्रत दोष लग सकता है, इसलिए शुद्धता बनाए रखें।

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