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न्यायपालिका को आज्ञाकारी बनाने की कोशिश स्वीकार नहीं : कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश

 

कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल का सरकार और सत्ता पर तीखा प्रहार

काठमांडू, 9 मई । कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव और हस्तक्षेप को लेकर कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि न्यायपालिका को “आज्ञाकारी” बनाने या राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने का माध्यम बनाने की कोशिश किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं होगी।

कानून दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को डर, दबाव और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए। उन्होंने न्यायाधीशों से निर्भीक होकर न्याय करने का आह्वान करते हुए कहा—
“डर और प्रभाव में न्याय संभव नहीं है, चाहे वह दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार का डर हो या महाभियोग की धमकी।”

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को कमजोर करने, विधि के शासन को क्षति पहुँचाने और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को समाप्त करने की कोशिशें लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा हैं।

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प्रधान न्यायाधीश नियुक्ति विवाद के बीच आया बयान

मल्ल का यह बयान ऐसे समय आया है जब ने सर्वोच्च अदालत के प्रधान न्यायाधीश पद के लिए का नाम सिफारिश किया है।

यह निर्णय इसलिए विवादों में है क्योंकि नेपाल में लगभग सात दशक पुरानी परंपरा के अनुसार सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठतम न्यायाधीश को प्रधान न्यायाधीश बनाया जाता रहा है।

लेकिन इस बार वरिष्ठता क्रम में सबसे आगे रहीं कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल, उनके बाद के न्यायाधीश और को दरकिनार करते हुए चौथे नंबर के न्यायाधीश मनोजकुमार शर्मा को आगे बढ़ाया गया।

इस निर्णय को न्यायपालिका की परंपरा और संस्थागत मर्यादा पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

“एक को खाने वाला बाघ दूसरे को भी खा सकता है”

अपने संबोधन में सपना प्रधान मल्ल ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—
“एक को खाने वाला बाघ दूसरे को भी नहीं खाएगा, यह नहीं कहा जा सकता।”

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उनका संकेत सत्ता के उस रवैये की ओर माना जा रहा है जिसमें राजनीतिक स्वार्थ के लिए संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।

उन्होंने कहा कि यदि आज किसी को समाप्त करने के लिए कानून और प्रक्रिया को तोड़ा-मरोड़ा जाता है, तो वही प्रवृत्ति भविष्य में सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।

“विधि की हत्या निरंकुशता की ओर ले जाती है”

कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वैधानिक परंपराओं और विधिक प्रक्रियाओं की हत्या करके किए गए स्वार्थ प्रेरित कार्य अंततः निरंकुशता को जन्म देते हैं।

उन्होंने कहा—
“संविधान को जस का तस रखकर संविधान विरोधी काम करना कोई क्रांति या परिवर्तन नहीं हो सकता। संविधान को विकृत करके सत्ता संचालकों की छवि चमकाने की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण है।”

उन्होंने चेतावनी दी कि “औचित्य” के नाम पर कानून में छेड़छाड़ करना लोकतांत्रिक शासन नहीं बल्कि स्वेच्छाचारिता की निशानी है।

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“महाभियोग और सत्ता का डर दिखाकर न्याय प्रभावित नहीं होगा”

सपना प्रधान मल्ल ने न्यायाधीशों से अपील करते हुए कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में भयभीत न हों। उन्होंने स्पष्ट कहा कि दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार का दबाव हो या महाभियोग का भय, न्यायपालिका को उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा—
“अब डर और प्रभाव में न्याय संभव नहीं है। न्यायाधीशों को अदम्य साहस और निडरता के साथ आगे बढ़ना होगा।”

उनका यह बयान नेपाल की न्यायपालिका और राजनीति के बीच बढ़ते टकराव के बीच बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक नियुक्ति विवाद नहीं, बल्कि नेपाल में संस्थागत स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादा की परीक्षा बन चुका है।

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