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नेपाल में गूंजा सनातन का संदेश : स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज ने संस्कृति, राष्ट्र और मानवता पर दिया प्रेरक उद्बोधन

 

काठमांडू, 20 जून। नेपाल की राजधानी काठमांडू स्थित प्रज्ञा भवन, कमलादी में कल हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल द्वारा आयोजित “प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी–2083” आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चिंतन का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरी। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविख्यात आध्यात्मिक विभूति, जूना अखाड़े के पीठाधीश्वर तथा आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज रहे, जिनके प्रेरणादायी संबोधन ने उपस्थित विद्वानों, न्यायविदों, शिक्षाविदों, संतों और बुद्धिजीवियों को गहराई से प्रभावित किया। नेपाल यात्रा को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सनातन केवल धर्म नहीं, जीवन का विज्ञान

अपने उद्बोधन में स्वामी अवधेशानंद गिरि जी ने कहा कि सनातन धर्म किसी संकीर्ण पहचान का नाम नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग है। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल का संबंध केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साझा संस्कृति, आस्था, हिमालय, वेद, ऋषि परंपरा और भगवान पशुपतिनाथ से जुड़ा हुआ एक शाश्वत आध्यात्मिक संबंध है।

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उन्होंने कहा कि समाज तभी मजबूत बनता है जब परिवार संस्कारित हो, युवा अपने मूल्यों से जुड़े हों और राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करे। आधुनिकता को स्वीकार करना आवश्यक है, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं।

राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा समाज का दायित्व

स्वामी जी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना या अर्थव्यवस्था भर नहीं होती, बल्कि उसकी संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक एकता होती है। उन्होंने युवाओं से भारतीय और नेपाली वैदिक परंपरा, शास्त्रों तथा आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विश्व अनेक प्रकार के संकटों से गुजर रहा है। ऐसे समय में सनातन दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सार्वभौमिक संदेश देकर मानवता को नई दिशा प्रदान कर सकता है।

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नेपाल के प्रबुद्ध समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति

कार्यक्रम में नेपाल के पूर्व प्रधान न्यायाधीश गोपाल पराजुली, पूर्व जीवित कुमारी, हलीनेवा गुठी के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेशमान साखेजु, हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल के राष्ट्रीय संघचालक कल्याणकुमार तिम्सिना तथा सह-राष्ट्रीय संघचालक विष्णु पौडेल सहित न्याय, शिक्षा, संस्कृति, धर्म, प्रशासन, मीडिया और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने सहभागिता की।

वक्ताओं ने नेपाल की सांस्कृतिक विरासत, सनातन परंपरा के संरक्षण तथा सामाजिक समरसता को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और सभ्यता के संरक्षण तथा भावी पीढ़ी के लिए मूल्य आधारित समाज निर्माण पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।

भारत-नेपाल की साझा आध्यात्मिक विरासत

स्वामी अवधेशानंद गिरि जी ने अपने संबोधन में नेपाल को भगवान पशुपतिनाथ और हिमालय की तपोभूमि बताते हुए कहा कि भारत और नेपाल का संबंध राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक गहरा है। दोनों देशों की साझा धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारत के प्रमुख आध्यात्मिक संतों की नेपाल यात्राएं धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक संवाद और दोनों देशों के जनस्तर के संबंधों को और मजबूत करेंगी।

सफल आयोजन पर आभार

हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल ने कार्यक्रम की सफलता पर सभी अतिथियों, विद्वानों, स्वयंसेवकों, सहयोगियों और प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से योगदान देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। आयोजकों ने कहा कि इस प्रकार के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विमर्श भविष्य में भी निरंतर आयोजित किए जाएंगे ताकि राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति के प्रति जनजागरण को नई गति मिल सके।

यह गोष्ठी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नेपाल में सनातन चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण बौद्धिक सम्मेलन सिद्ध हुई।

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