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नेपाल में बंद सार्वजनिक उद्योगों का पुनरुत्थान: नवउदारवादी भ्रम बनाम सामरिक राज्य की भूमिका

 

(राकेश मिश्रा के विचार एवं विश्लेषण पर आधारित) काठमांडू, २२ अगस्त।बअर्थशास्त्र के बारे में एक पुरानी कहावत मशहूर है—*“पांच अर्थशास्त्रियों से राय मांगिए, आपको पांच अलग-अलग जवाब मिलेंगे; और अगर उनमें से एक हार्वर्ड से पढ़ा हो, तो छह जवाब मिलेंगे।”*

नेपाल में जब भी बंद या रुग्ण सार्वजनिक उद्योगों के पुनरुद्धार की बात उठती है, तो नवउदारवाद (Neoliberalism) का पुराना मंत्र दोहराया जाने लगता है: *“सरकार का काम व्यापार करना नहीं है, इसे निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ देना चाहिए।”* लेकिन यह दृष्टिकोण न तो वैश्विक आर्थिक इतिहास से मेल खाता है और न ही नेपाल की मौजूदा जमीनी हकीकत से।

बाजार और निजी क्षेत्र की भूमिका निसंदेह महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। लेकिन यह मान लेना कि बाजार अपने आप हर जरूरी रणनीतिक निवेश कर देगा, अर्थशास्त्र नहीं बल्कि एक संकीर्ण विचारधारा है। निर्माण (Manufacturing) क्षेत्र में बड़े पैमाने की बचत (*Economies of Scale*), तकनीकी प्रभाव (*Technological Spillovers*), समन्वय की कमी (*Coordination Failure*) और लंबी अवधि के निवेश के जोखिमों के कारण बाजार अक्सर सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से आवश्यक स्तर से कम निवेश करता है।

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वैश्विक अनुभव क्या सिखाते हैं ?

इतिहास गवाह है कि किसी भी विकासशील देश ने केवल बाजार के भरोसे औद्योगिक क्रांति हासिल नहीं की:

दक्षिण कोरिया: सरकार ने सैमसंग और हुंडई को केवल बाजार के हवाले नहीं छोड़ा, बल्कि स्टील, शिपबिल्डिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में रियायती कर्ज, तकनीक और नीतिगत संरक्षण दिया। पोहांग आयरन एंड स्टील कंपनी (**POSCO**) की स्थापना राज्य की सक्रिय पहल का ही नतीजा थी।
* **जापान:** अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय (**MITI**) ने जापानी औद्योगिक नीति और तकनीकी उन्नयन में निर्णायक भूमिका निभाई।
* **सिंगापुर:** आर्थिक विकास बोर्ड (**EDB**) और सरकारी कंपनियों (*GLCs*) ने राज्य के निवेश को वैश्विक निजी पूंजी के साथ कुशलता से जोड़ा।
* **भारत:** इस्पात, ऊर्जा, भारी इंजीनियरिंग और बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक उपक्रमों (**PSUs**) ने ही देश की मजबूत औद्योगिक नींव रखी।

नेपाल का संदर्भ और सार्वजनिक उद्योग

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नेपाल में सार्वजनिक उपक्रमों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका निभाई है:

* **दुग्ध विकास संस्थान (DDC):** हजारों किसानों को सीधे बाजार से जोड़ते हुए बड़े पैमाने पर दूध का संकलन और प्रसंस्करण करता है।
* **उदयपुर सीमेंट उद्योग:** घरेलू चूना पत्थर का उपयोग कर देश के निर्माण क्षेत्र को मजबूती देता है।
* **हेटौड़ा कपड़ा उद्योग:** अतीत में लगभग 1,200 लोगों को रोजगार देने के साथ सालाना 26 लाख मीटर कपड़ा उत्पादन की क्षमता रखता था।
* **गोरखकाली रबर उद्योग:** इसका बंद होना सिर्फ एक कारखाने का बंद होना नहीं, बल्कि नेपाल की औद्योगिक क्षमता और तकनीकी ज्ञान की भारी क्षति है।

प्रबंधन की चुनौती: सेना समाधान नहीं

औद्योगिक पुनरुत्थान की चर्चा के बीच इन उपक्रमों का प्रबंधन नेपाली सेना को सौंपना कोई व्यावहारिक या टिकाऊ समाधान नहीं है। सेना एक अनुशासित और लॉजिस्टिक्स में सक्षम संस्था जरूर है, लेकिन व्यावसायिक विनिर्माण चलाना उसका मुख्य मैंडेट नहीं है। ऐसा कदम नागरिक संस्थागत जवाबदेही, पेशेवर प्रबंधन और परिचालन दक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उद्योगों के संचालन की जिम्मेदारी प्रशिक्षित औद्योगिक प्रबंधकों और जवाबदेह नागरिक संस्थानों की ही होनी चाहिए।

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इसका अर्थ यह कतई नहीं कि करदाताओं के पैसे से घाटे में चल रहे हर संस्थान को अंतहीन समय तक पाला जाए। इसके लिए पांच स्पष्ट मानक जरूरी हैं:

* पेशेवर और स्वायत्त प्रबंधन
* प्रदर्शन आधारित अनुबंध (*Performance Contracts*)
* आधुनिक तकनीक में निवेश और उन्नयन
* पारदर्शी वित्तीय लेखांकन
* निजी क्षेत्र के साथ रणनीतिक साझेदारी

अंतमें 

समाधान केवल अंधाधुंध निजीकरण नहीं है। नेपाल को ‘राज्यविहीन बाजार’ नहीं, बल्कि एक सक्षम राज्य और प्रतिस्पर्धी निजी क्षेत्र का मजबूत समन्वय चाहिए। नवउदारवादी नारे चाहे जो कहें, आर्थिक इतिहास इस सच को कभी नहीं झुठला सकता कि सतत विकास केवल अनियंत्रित बाजार से नहीं, बल्कि बाजार को सही दिशा देने वाले सक्षम और रणनीतिक राज्य से ही संभव होता है।

*(साभार: राकेश मिश्रा के विचार एवं विश्लेषण पर आधारित)*

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