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आखिर मधेश पर शक कब तक ? श्वेता दीप्ति

 

madhesh

श्वेता दीप्ति ,काठमांडू, ९, जनवरी |  जब–जब मधेश के हक या अधिकार की बातें सामने आती हैं तो सारा दोष भारत के ऊपर मढ़ दिया जाता है । मधेश के विकास की बातें मधेश की न होकर भारत के हिस्से में चली जाती है । मधेश का आन्दोलन भारत का आन्दोलन हो जाता है । अगर यही मनःस्थिति रही तो इस समस्या का समाधान कभी भी सम्भव नहीं हो सकता । अपनी ही जनता और अपनी ही मिट्टी पर शक की दृष्टि अगर राष्ट्रवादिता है तो यह समझना होगा देश के नेताओं को कि वो अपने ही हिस्से को काट रहे हैं । आज एमाले जिस नीति के साथ आगे बढ़ रहा है, कभी–कभी तो लगता है कि ये अपने ही बनाए संविधान को विफल करने की कोशिश में हैं । मधेश की हर माँग इनके लिए औचित्यहीन है तो क्या सिर्फ इनकी जिद देश को आबाद कर सकती है ? इन्हें संशोधन नहीं संविधान का कार्यान्वयन चाहिए ठीक उसी तरह जिस तरह इन्होंने संविधान मसौदा और संविधान का निर्माण किया था और इसी तर्ज पर आनेवाले चुनाव को भी सम्पन्न कराना चाह रहे हैं । पत्रकार सम्मेलन में स्वयं एमाले अध्यक्ष ने यह कहा कि क्या मधेश विरोध करेगा तो चुनाव नहीं होगा ? स्पष्ट है कि इन्हें देश के इस हिस्से के मधेशियों की परवाह नहीं है । इन्हें विश्वास है कि चुनाव की नैया राष्ट्रवाद के पतवार से यह भलीभाँति तय कर लेंगे और सत्ता बहुमत के साथ इनके हाथों में होगी । अगर सचमुच ये इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहते हंै तो यह कपोल कल्पना ही साबित होगी । जहाँ एक ओर मधेश में स्वराजियों की संख्या बढ़ रही है वहीं “बैक आफ एमाले” का नारा भी रंग पकड़ने लगा है जो निःसन्देह ही देश के हित में और एमाले के हित में भी नहीं है ।

जिद और अहंकार की राजनीति की उम्र लम्बी नहीं होती, इसका उदाहरण महाभारत का युद्ध है, जहाँ कौरवों की जिद और अहंकार ने सिर्फ विनाश का इतिहास लिखा था, हाथ उसके भी खाली रह गए थे । एमाले की सरकार में जो एजेन्डा था तकरीबन उसे ही आज प्रस्तावित किया गया है किन्तु आज इनके द्वारा इसका विरोध कुछ इस तरह हो रहा है मानो देश को गिरवी रखा जा रहा है, जबकि ऐसी बातें भी इनके ही हिस्से में है । अगर देश का सारा भूखण्ड एक ही है तो क्या फर्क पड़ता है कि वो भूखण्ड किसके हिस्से में गया । मधेश वर्षों से विभेद के जहर को पी रहा है इस बार जरा आप ही उदारता दिखा दें और शिव बन जाएँ तो अमर हो जाएँगे । किन्तु ऐसा होगा नहीं, क्योंकि ये उदारता इन्हें मिली ही नहीं है । स्वार्थगत राजनीति का इनका इतिहास रहा है ।
क्या होगा अब ?
फिलहाल संवैधानिक तौर पर कोई रास्ता नहीं दिख रहा सिवा इसके कि स्वार्थ की राजनीति का त्याग करें और सही मायने में देश हित के लिए काम करें । अगर तीनों तह का चुनाव नहीं होता है तो संविधान और संवैधानिक निकाय क्रियाशील नहीं रह जाएगी और देश लाचार हो जाएगा, जिसका फायदा विदेशी ताकतों के हिस्से में जाएगा । दस वर्षों के जनयुद्ध के बाद देश ने जिस परिवर्तन की कल्पना की थी आज वो सिर्फ सोच में सिमट कर रह गयी है । शांति समझौता के साथ ही देश ने गणतंत्र को पाया और जनता ने नई उम्मीद और विकास का सपना देखा । किन्तु आज यह दशा है कि जनता निराश हो चुकी है और यह निराशा इस हद तक कायम हो गई है कि देश के युवा पलायन कर रहे हैं और देश रेमिटान्स लेकर उज्ज्वल भविष्य की कामना कर रहा है । जहाँ युवाशक्ति का पलायन हो रहा है वहाँ विकास के सपने देखना बेमायने है । इस सच्च्चाई को हम नकार नहीं सकते कि जनयुद्ध और उसके बाद नेपाल में दलों के बीच जो असहमति सामने आई वही देश के विचलन का कारण बन रहा है । देश की दशा निरन्तर नीचे की ओर जा रही है । गरीब और भी गरीब हो रहे हैं, भ्रष्टाचार अपनी चरम स्थिति में है, नेतागण संसद में अपनी सत्ता और भत्ता पर गिद्ध दृष्टि डाले हुए हैं और उसमें निरन्तर बढ़ोत्तरी हो रही है । गरीब इलाज के अभाव में मरता है और सुसम्पन्न सुजाता कोईराला जैसों के इलाज के लिए सरकार मदद मुहैया कराती है । भूकम्प पीड़ित की आँखें मदद का इंतजार करते–करते थक गईं पर आज भी वो मैदानों में जी रहे हैं । यह है हमारे देश की प्रगति, जिस पर क्या हम नाज कर सकते हैं ?
सामाजिक विग्रह और विचलन की स्थिति सामने है । संक्रमण काल की भयावहता बढ़ती जा रही है । जहाँ एक ओर ०६२÷६३ का आन्दोलन राजा ज्ञानेन्द्र की अतिवादी महत्तवाकांक्षा और कम्युनिष्ट की हिंसात्मक आन्दोलन का परिणाम था वहीं पिछले वर्ष हुए मधेश आन्दोलन के मूल में भी सत्तासीन की निरंकुश शैली ही थी । मधेश की जनता स्वतःस्फूर्त रूप में सड़कों पर आई थी उनकी यह लड़ाई किसी परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि अपने अस्तित्व और पहचान की लड़ाई थी किन्तु सत्तापक्ष के द्वारा निर्ममतापूर्वक दमन की नीति अपनाई गई । नृशंसता अपनी चरम सीमा पर थी । आन्दोलन देश का था और आक्षेप पड़ोसी पर लग रहा था । आज भी कमोवेश आलम वही है । सदियों से शोषित मधेश आज भी हाशिए पर है । विकास की असंख्य सम्भावनाओं के बावजूद मधेश मे आज कुछ है तो वह है असंतोष, अशिक्षा, गरीबी और पिछड़ापन । मधेश की समतल भूमि विकास के लिए हमेशा से सहायक सिद्ध हो सकती है बावजूद इसके, इसकी उपेक्षा ही की जा रही है । आज जो संशोधन का प्रस्ताव आया है उसे मधेशी और पहाड़ी को अलग करने की सोच के साथ ही देखा जा रहा है और इसी को हथियार बना कर मतभेद को हवा दी जा रही है । अगर सब नेपाली ही हैं तो मतभेद की तो कोई सम्भावना ही नहीं होनी चाहिए । किन्तु इस प्रस्ताव को तो राष्ट्रघाती और आयातित कहकर विरोध किया जा रहा है । जब तक सोच और मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक किसी अच्छे परिणाम की आशा और उम्मीद ही बेकार है । वैसे इस संशोधन प्रस्ताव से मधेशवादी दल भी संतुष्ट नहीं हैं और परिमार्जन की माँग कर रहे हैं, परन्तु एमाले का उतावलापन कुछ समझ में नहीं आ रहा । मधेशवादी दल से अपेक्षा है कि वो एकजुट हों और अपनी दूरदर्शिता का परिचय दें । अपनी सोच को एक खुली दृष्टि और सकारात्मकता दें, व्यक्तिगत और पार्टीगत भावना से ऊपर उठकर सोचें और निर्णय लें । देश और मधेश दोनों विकास की राह देख रहा है । आन्दोलन की स्थिति अस्थिरता लाती है जो सिर्फ विकास का बाधक बन सकती है । देश को आन्दोलन का देश बनने से रोकना ही समझदारी होगी । कल तक डा.केसी अनशनरत थे आज अनशन टूटा नहीं कि उनसे हुई सहमति के विरोध में आन्दोलन शुरु हो गया है । जबकि हम सभी जानते हैं कि उनकी लडाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है । त्रिभुवनविश्वविद्यालय का हर निकाय भ्रष्टाचारियों के चुंगुल में है । पद और विभाग राजनीतिक भागबन्डा का शिकार हो रहे हैं । पद पाने के लिए पार्टी का सहारा लेना आम बात हो गई है । अरबों घाटा में देश का पहला विश्वविद्यालय साँस ले रहा है । इन सभी बातों को समझने के बावजूद कोई चूँ शब्द नहीं बोल रहा । सब अपनी अपनी रोटी सेकनें में लगे हुए हैं । ऐसे में कोई एक व्यक्ति अगर आवाज उठाता है तो उसे पागल की संज्ञा दी जाती है । जबकि सच तो यह है कि आज देश के हर क्षेत्र में ऐसे न जाने कितने केसी की आवश्यकता है, जो देश को उबार सके । पता नहीं इस देश को क्या हो गया है और किस दिशा में यह जा रहा है ? दूसरों के ऊपर आक्षेप लगाना बहुत आसान होता है किन्तु क्या हम खुद का विश्लेषण कर रहे हैं ? समय है आत्मविश्लेषण का दोषारोपण का नहीं ।

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संविधान पर मंडराता संकट : डा. श्वेता दीप्ति

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