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नेपाली साहित्य की आधुनिक प्रवृति और स्रष्टा : अजयकुमार झा

 

हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018,नेपाली साहित्य की लेखन परम्परा नेपाल एकीकरण के नायक पृथ्वीनारायण शाह के इर्दगिर्द घूमती दिखाई देती है । भक्ति रस, स्तुतिगान और वीररस प्रधान इस युग को नेपाली कविता लेखन का प्रारम्भिक काल माना जाता है । साहित्य के चार विधा, (कविता, कथा, नाटक और निबन्ध) का इतिहास लेखन समग्र न होकर विधागत रूप में किए जाने के कारण चारो विधाओं का काल गणना में अंतर होना स्वाभाविक है । हम इस लेख में नेपाली कविता के आधुनिक काल पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं ।

नेपाली भाषा भारोपेली परिवार के सप्तम् वर्ग की भारतेली शाखा के खस अपभ्रंश भाषा के रूप में जनमानस में प्रचलित है । और अन्य आर्य भाषाओं की तरह नेपाली भाषा भी १२ वी शताब्दी के आसपास सक्रिय होने को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । सुवानंद दास द्वारा रचित नेपाली भाषा की प्रथम कविता ‘पृथ्वीनारायण शाह’ में सन्निहित लोकलय और उसका प्रभाव यह प्रमाणित करता है कि समाज में नेपाली भाषा में लोकगीत पहले से ही प्रचलन में था ।

नेपाली साहित्य में वि.सं.१८२७(१९४० तक की अवधि को प्राथमिक काल माना गया है । इस काल में श्री ५ पृथ्वीनारायण शाह के द्वारा प्रारम्भ किए गए नेपाल एकीकरण अभियान, सुगौली सन्धि (१९७२) कोतपर्व और जङ्गबहादुर राणा का उदय इस कालावधि के साहित्य रचना का केंद्र तथा प्रेरक तत्व माना जाता है । जिसमे सुगौली सन्धि से पहले वीरधारा और सन्धि पश्चात भक्तिधारा के कविता पर विशेष जोर दिया गया ।

जिसमे इन कवियों का प्रमुख योगदान था, १. सुवानन्द दास २. शक्तिवल्लभ आर्ज्याल ३. उदयानन्द आर्ज्याल ४. राधावल्लभ आर्ज्याल ५. रामभन्द्रपाध्याय ६. गुमानी पन्त इत्यादि । इसी प्रकार वि.सं.१९४१–१९७४ तक की समयावधि को नेपाली कविता का माध्यमिक काल माना गया है ।

इस काल को नेपाली साहित्य में श्रृंगार रस प्रधान काल के रूप में लिया जाता है । मानव मन में तरंगायित प्रेम के लहर और आर्कषण के हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति को श्रृंगार रस प्रधान कहा गया है । नेपाल में तत्कालीन राजाओं और राणाओं के दरबार में देखे गए भोग विलास में डूबे जीवन शैली से प्रभावित होकर कवियों ने श्रृंगार रस प्रधान कविताओं की रचना की । माध्यमिक काल के प्रमुख कवि मोतीराम भट्ट के साथ ही अन्य कवियों में–१.राजीवलोचन जोशी २. लक्ष्मीदत्त पन्त ३. गोवीनाथ लोहोनी ४. शिखरनाथ सुवेदी ५. तीर्थराज ६. दुर्गाप्रसाद घिमिरे ७. शम्भुप्रसाद ढुंगेल ८. पहलमान सिंह स्वांर हैं । मोतीराम द्वारा रचित ‘पिकदुत’ कविता इस काल की प्रमुख कीर्ति है ।

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आधुनिक काल (१९९१ से अबतक)
साहित्यकार वाशुदेव त्रिपाठी ने वि.सं. १९७५ के बाद वाले अवधि को नेपाली कविता का आधुनिक काल माना है । साथ ही वि सं १९७५ से १९९० तक की अवधि को परिष्कारवादी तथा शास्त्रीयतावादी कहा है । वहीं १९९१ से २०१६ तक की अवधि को स्वच्छन्दतावादी धारा और २०१७ से २०२९ तक की अवधि को प्रयोगवादी धारा तथा २०३० साल से अबतक की अवधि को समसामयिक धारा की मान्यता दिए हैं ।
परन्तु नेपाली कविता विधा के विशेषज्ञ खगेन्द्रप्रसाद लुइँटेल ने नेपाली कविता के आधुनिक काल के सन्दर्भ में वासुदेव त्रिपाठी से भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए वि.सं.१९४० से १९९१ तक की अवधि को माध्यमिक काल माना है । उनके अनुसार शास्त्रीयतावाद पारम्परिक मूल्य मान्यता तथा शैलियों का अनुकरण करता है । इसलिए शास्त्रीयतावाद आधुनिक हो ही नहीं सकता ।
वि सं १९९१ साल से प्रयोग में आए स्वच्छन्दतावादी धारा के कारण नेपाली कविता में आधुनिक काल का आरम्भ होता है । देश, काल और परिवेश की सापेक्षता में पश्चिमी जगत् के मध्यकालीन प्रवृत्ति स्वच्छन्दतावाद, नेपाली जगत में आधुनिक प्रवृत्ति के रूप में दिखाई दिया । वैसे भी पाश्चात्यों की जूठन हमारे लिए परम भोग ही होता है । क्योंकि हम नकल के अलावा कुछ करना भी नहीं चाहते ।
नेपाली कविता में लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, सिद्धिचरण श्रेष्ठ, गोपालप्रसाद रिमाल, युद्धप्रसाद मिश्र इत्यादि के आगमन पश्चात वि सं १९९१ न्यून रूप में प्रयुक्त स्वच्छन्दतावाद आज वृहद् रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है । वि सं (१९९१–२०१६) नेपाली साहित्याकाश में धूम मचाए
स्वच्छन्दतावाद, विश्वसाहित्य में स्वच्छन्द एवं उदारवादी काव्यिक आन्दोलन के रूप में प्रचलित साहित्यिक मान्यता है । वैयक्तिकता, आत्मनिष्ठता, काल्पनिकता, भावुकता, विद्रोहात्मकता, सौन्दर्यात्मकता, सङ्गीतात्मकता, प्रकृतिप्रेम, मुक्त कृत्रिमता, मानवतावादी दृष्टिकोण, ये सब स्वच्छन्दतावाद के खास परिचायक अभिलक्षण हैं ।
स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति के मुख्य प्रयोग क्षेत्र कविता ही है । इसमे प्रबल वैयक्तिकता, तीव्र कल्पनाशीलता, भावनात्मकता, हार्दिकता, कोमलता, भावगत मुक्तता, अनियन्त्रितता, स्वच्छन्दता, सहजता, स्वप्निलता, व्यक्तिवादिता, स्वाभाविकता, अतिशय भावुकता, प्रकृति चित्रण में विविधता, प्राकृतिक सौन्दर्य की आकर्षण जैसा प्रवृत्तियों का अनुसरण स्वच्छन्दतावादी रचनाओं में किया जाता है । स्वच्छन्दतावादी कवि यथार्थ जीवन से दूर किसी कल्पना लोक में विचरण करते हुए विश्व सौन्दर्य की अपेक्षा करते हैं ।
नेपाली साहित्य जगत में प्रयोगवादी धारा (२०१७–२०३५)
वैसे तो साहित्यिक वादविशेष के रूप में, प्रयोगवाद कही पर विशेष रूप से स्थापित दिखाई नहीं देता है । परन्तु यथास्थिति प्रचलन से भिन्न प्रकार के प्रयोग किए जाने के कारण ऐसे रचनाओं को प्रयोगवादी रचना और प्रवृत्ति के रूप में मान्यता देकर उसे प्रयोगवादी धारा के रूप में स्वीकारा जा रहा है ।
वास्तव में प्रयोगवादी कवि समाज–चित्रण की अपेक्षा वैयक्तिक कुरूपता का प्रकाशन करके समाज के मध्यमवर्गीय मानव की दुर्बलता का प्रकाशन करता है । मन की नग्न एवं अश्लील वृत्तियों का चित्रण करता है । मानव जगत के लघु और क्षुद्र प्राणियों को काव्य में स्थान देता है । भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता की प्रतिष्ठा करता है ।
इसमे डार्विनवाद, माक्र्सवाद, फ्रायडवाद के साथ–साथ विभिन्न क्षेत्रों में हुए वैज्ञानिक आविष्कार तथा भौतिक उन्नति का प्रशस्त प्रभाव पाया जाता है । कविता के सन्दर्भ में प्रथम विश्वयुद्ध के वाद सङ्कटग्रस्त मानसिक अवस्था से उत्पन्न युगीन जटिलता, निराशा, कुण्ठा, अकर्मण्यता, अस्तव्यस्तता तथा अमूर्त चिन्तन को काव्य के माध्यम से किए गए अभिव्यक्ति को ही प्रयोगवादी काव्य कहा गया है ।
प्रयोगवादी कवि प्रतीकवादी, बिम्बवादी, विसङ्गतिवादी, अतियथार्थवादी प्रवृत्ति के अनुयायी होते हैं । नेपाल में प्रयोगवादी धारा २००७ साल तथा २०१७ साल के राजनैतिक परिवर्तन और विविधताजन्य युगीन परिवेश के प्रभाव में फलाफूला । नेपाली कविता में प्रयोगवादी धारा के समय में वि सं २०२० साल में भारत के दार्जिलिङ से तीसरा आयाम या कहें आयामेली आन्दोलन नाम का साहित्यिक अभियान भी विशेष उल्लेखनीय है ।
तत्कालीन स्रष्टागण, इन्द्रबहादुर राई, ईश्वरबल्लभ और बैरागी काइला द्वारा घोषित यह आन्दोलन विदेशी साहित्य और कला के क्षेत्र में हुए चिन्तन, मनन और अन्वेषण कर प्रस्तुत किया गया साहित्यिक अवधारणा है । समकालीन नेपाली कविता की समय सीमाङ्कन के सम्बन्ध में प्रवृत्तिगत परिवर्तन और अभिलक्षण के आधार पर वि सं २०३६ को नेपाली कविता के समकालीनता का निर्धारक समय मानने का कुछ विशिष्ट आधार और अभिलक्षण दिखाई देता है । सड़क कविता क्रान्ति, जनमतसंग्रह और व्यक्तिसत्ता के महत्त्व एवम् सम्प्रेष्य कविता सृजनोन्मुख अग्रसरता जैसा समकालीन अभिलक्षण के आधार पर २०३६ उत्तरवर्ती या समकालीन नेपाली कविता का सीमारम्भ है, की पुष्टि होती है ।
०३६ जेठ २६ में भवानी घिमिरे, मोहन कोइराला, हरिभक्त कटुवाल, अशेष मल्ल इन कवियों के द्वारा औपचारिक घोषणापत्र बिना ही काठमाडू से पञ्चायती अत्याचार के विरुद्ध जनचेतना जगाने तथा प्रजातांत्रिक भावना विकास करने हेतु से कविता को महल से सड़क पर लाने का क्रांतिकारी कदम उठाने के साथ ही लेखक और पाठक के वीच की दूरी को भी मिटाने का काम हुआ ।
इसी प्रकार ( २०४०) भोक कविता अन्दोलन भवानी घिमिरे के नेतृत्व में झापाली दश युवा कवियों ( हीरा आकाश, अमृतलाल श्रेष्ठ, केशव आचार्य, कृष्ण धरावासी, लक्ष्मण ढकाल, दुर्गा दाहाल, प्रकाश बुढाथोकी, डिकमान विरही, देवेन्द्र किशोर ढुंगाना) की सशक्त संलग्नता में भोक कवियों ने अभाव, गरीबी और बेरोजगारी के विरुद्ध काव्यात्मक शिष्ट शैली में आन्दोलन किया था ।
इसी तरह नेपाली काव्य यात्रा अग्रोन्मुख रहते हुए २०४० साल में नौ बुँदे घोषणापत्र सहित घोषित फणीन्द्र नेपाल, विनय रावल और तीर्थ ‘फविती’ के नेतृत्व में (तरलवाद) आन्दोलन का सुत्रपात हुआ । जिसका मूल उद्देश्य जन आनंदोलन २०४६ को बल पहँुचाना और कविता में क्लिष्टता का विरोध करना था ।
ऐसे ही छन्द बचाऊँ अभियान (२०५३) के तहत नेपाली कविता से लुप्त हो रहे छन्द के प्रयोग पुनःस्थापित करने हेतु से कवि माधव वियोगी की सक्रियता में आन्दोलन किया गया । जिसमे छन्द की महत्ता को केन्द्र में रखा गया था ।
छन्द वेद का दूसरा नाम भी है । वर्ण और मात्रा का गेय व्यवस्था छन्द है । निश्चित विधान अपनाकर वर्ण और स्वरों को व्यवस्थित करने से छन्द तयार होता है । अतः विशिष्ट काव्य संस्कृति की रक्षा हेतु से यह आन्दोलन किया गया था ।
उत्तरवर्ती समसामयिक नेपाली कविता में कालखण्ड की कुछ प्रवृत्तियाँ गौण रूप में जरुर आयी, लेकिन प्रमुख प्रवृत्तियों के रूप में उत्तर आधुनिक प्रवृत्ति का प्रभाव, कथ्यगत समानता या पुनरावृत्तीय प्रस्तुति, युगीन विविध विसङ्गत परिस्थितिप्रति व्यङ्ग्य, संस्कृतिचेतना की प्रस्तुति, सामूहिकता की अभिव्यक्ति, मानवमूल्य की उपेक्षा, मानवता की खोज और जीवन के विसङ्गतियों का चित्रण, सशस्त्र द्वन्द्वजन्य परिस्थिति का यथार्थ चित्रण, युगीन राजनीतिक अव्यवस्था का चित्रण, पश्चगमन का विरोध और अग्रगमन की अपेक्षा का अभिव्यक्ति, आर्थिक विसङ्गतियों का चित्रण, सामाजिक असमानता और विसङ्गतियों का प्रस्तुति, अन्तराष्ट्रीयतावादी सञ्चेतना, मानवअधिकारवादी चेतना की अभिव्यक्ति, चित्रकवितात्मक अभिव्यक्ति, मिथकीय प्रयोग, नारीवादी चेतना, प्रविधिसंस्कृति का प्रभाव, भाषिक सरलता का वरण और जटिलता का परित्याग इत्यादि है । इसी प्रकार अनियोजित ढाँचा का प्रयोग या शास्त्रीय ढाँचा के प्रयोग में कमी, भाव सौन्दर्य में सचेतता, वस्तुयथार्थ की अभिव्यक्ति, सरल सम्प्रेष्य शिल्पशैली एवम् भाषिक कला, अन्तर्विधात्मक पक्ष का समावेश, भाव विचार एवम् चिन्तन पक्ष का आधिक्य, विम्ब प्रतीकों का भावानुसार प्रयोग, प्रजातान्त्रिक लोकतान्त्रिक और गणतान्त्रिक अभिव्यक्ति, उत्तराधुनिक शैली का प्रयोग, जीवनसापेक्ष चेतना, नारीवादी चेतना, डायस्पोरा, भयवादी अराजकवादी विषयवस्तु, चिन्तन और शैली का प्रयोग । इन सभी को भी नेपाली कविता के उत्तरवर्ती समसामयिक प्रवृत्ति के रूप में माना जा सकता है ।

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