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रक्तपात, अंधकार और प्रशासनिक उदासीनता: गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके में गहराता संकट : अनिल तिवारी

 

अनिल तिवारी, बिरगंज। दक्षिण एशिया और मध्य एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। इस बदलते वातावरण में पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की बजाय आतंकवाद, अस्थिरता और क्षेत्रीय तनावों के केंद्र के रूप में अधिक दिखाई देने लगा है। उसकी सुरक्षा नीतियाँ, अफगानिस्तान के प्रति दृष्टिकोण, बलूचिस्तान में बढ़ता विद्रोह तथा विभिन्न उग्रवादी संगठनों के साथ उसके कथित संबंध पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।

इसी बीच पाकिस्तान प्रशासित क्षेत्रों—गिलगित-बाल्टिस्तान (GB) और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK)—में वर्षों से सुलग रहा जनाक्रोश अब हिंसक विस्फोट के रूप में सामने आया है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अधिकारों से वंचित किए जाने की लंबी प्रक्रिया तथा राज्य की कठोर दमनकारी नीतियों ने इन क्षेत्रों को पिछले कई दशकों के सबसे गंभीर मानवीय और राजनीतिक संकट की ओर धकेल दिया है।

पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में बढ़ता असंतोष कोई नई घटना नहीं है। यह वर्षों से जमा हो रहे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असंतोष का परिणाम है। स्थानीय लोग लंबे समय से अपनी पहचान, राजनीतिक अधिकारों तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक नियंत्रण की मांग करते रहे हैं। लेकिन इन मांगों को सुनने और समाधान निकालने के बजाय सरकार पर बल प्रयोग और दमन का रास्ता अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।

आर्थिक शोषण और रावलाकोट का रक्तपात

हालिया संकट की शुरुआत तब हुई जब संघीय सरकार ने गेहूं के आटे पर दी जा रही आवश्यक सब्सिडी अचानक समाप्त कर दी और बिजली दरों में भारी वृद्धि कर दी। पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे लोगों के लिए यह निर्णय असहनीय साबित हुआ। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि राज्य की संवेदनहीनता और संरचनात्मक अन्याय का प्रतीक है।

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विडंबना यह है कि गिलगित-बाल्टिस्तान और उसके आसपास के क्षेत्र पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण जलविद्युत संसाधनों का केंद्र हैं। निर्माणाधीन डायमर-भाषा बांध सहित कई विशाल परियोजनाएँ यहां स्थित हैं। इन परियोजनाओं से उत्पन्न ऊर्जा पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को उपलब्ध कराई जाती है, जबकि स्थानीय आबादी स्वयं लंबे बिजली कटौती, महंगे बिजली बिल और संसाधनों से मिलने वाली वैध रॉयल्टी से वंचित रहने को मजबूर है।

आर्थिक न्याय की मांग को लेकर जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने मुजफ्फराबाद की ओर एक विशाल और शांतिपूर्ण “लॉन्ग मार्च” का आयोजन किया। यह मंच व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का संयुक्त प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन इस्लामाबाद ने इसे स्वीकार करने के बजाय कठोर आतंकवाद विरोधी कानूनों का सहारा लेते हुए संगठन को प्रतिबंधित घोषित कर दिया।

स्थिति तब और विस्फोटक हो गई जब रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव हुआ। आरोप है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और रेंजर्स ने निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाईं तथा बड़े पैमाने पर आंसू गैस का इस्तेमाल किया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 11 से 27 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक लोग घायल हुए। हालांकि स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

सूचना पर नियंत्रण और सैन्य निगरानी

रावलाकोट की घटना के बाद प्रशासन पर सूचना को दबाने के गंभीर आरोप लगे। स्थानीय सूत्रों के अनुसार मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं और मीडिया कवरेज पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। घटना की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को भी निगरानी और दबाव का सामना करना पड़ा।

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इसी दौरान मुजफ्फराबाद के निकट पाकिस्तान सेना का एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें 22 सैन्यकर्मियों की मृत्यु हो गई। हालांकि दुर्घटना को तकनीकी कारणों से जोड़कर देखा गया, लेकिन इसके बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी गई। व्यापक सैन्य तैनाती, चेकपोस्टों में वृद्धि और लगातार निगरानी ने पहले से डरे हुए स्थानीय नागरिकों की चिंताओं को और बढ़ा दिया।
स्थानीय असंतोष की जड़ केवल आर्थिक समस्याएं नहीं हैं, बल्कि दशकों से जारी राजनीतिक उपेक्षा भी है। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान ने कश्मीर विवाद और संयुक्त राष्ट्र समर्थित जनमत संग्रह के मुद्दे को आधार बनाकर गिलगित-बाल्टिस्तान को पूर्ण प्रांतीय दर्जा देने से लगातार परहेज किया है। परिणामस्वरूप वहां के नागरिक राष्ट्रीय संसद में प्रभावी प्रतिनिधित्व से वंचित हैं।

राजनीतिक असंतोष तब और बढ़ गया जब इस्लामाबाद ने गिलगित-बाल्टिस्तान विधानसभा चुनावों को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। स्थानीय लोगों और आलोचकों का आरोप है कि ये चुनाव जनता की वास्तविक आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने के बजाय केंद्र सरकार समर्थक नेतृत्व को स्थापित करने का माध्यम बन गए हैं। उनका मानना है कि स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखने और क्षेत्रीय राजनीतिक आवाज को कमजोर करने के लिए ऐसी प्रक्रियाओं का उपयोग किया जा रहा है।

इसी संदर्भ में “12 सीट विवाद” भी लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। वर्ष 1947 के शरणार्थियों के लिए आरक्षित बताई जाने वाली इन सीटों को लेकर आरोप लगाया जाता है कि इनका उपयोग राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने तथा स्थानीय मताधिकार को कमजोर करने के लिए किया जाता है।

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अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई

मार्च से लागू कर्फ्यू, लगातार सुरक्षा अभियान और हाल की हिंसक घटनाओं ने स्थानीय जनता के आक्रोश को और तेज कर दिया है। आंदोलनकारी समूहों का कहना है कि अब वे आर्थिक शोषण, राजनीतिक उपेक्षा और अधिकारहीनता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

रोटी, बिजली और जीवन-यापन से जुड़े बुनियादी मुद्दों से शुरू हुआ आंदोलन अब अधिकार, आत्मनिर्णय, मानवाधिकार और अस्तित्व की लड़ाई के रूप में विकसित होता दिखाई दे रहा है। इस संकट ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक समुदाय का भी ध्यान आकर्षित करना शुरू कर दिया है। यदि नागरिकों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है।

पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में घटित हालिया घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं। वे वहां बढ़ते राजनीतिक असंतोष, अधिकारों की मांग और राज्य की प्रतिक्रिया के बीच गहरे टकराव को उजागर करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का समाधान बल प्रयोग से नहीं निकलेगा। स्थायी शांति के लिए संवाद, राजनीतिक सहभागिता, आर्थिक न्याय और नागरिक अधिकारों का सम्मान अनिवार्य है।

वर्तमान घटनाक्रम यह संकेत भी देता है कि क्षेत्रीय राजनीति में लंबे समय से अपनाई जा रही नीतियां अब स्वयं पाकिस्तान के लिए चुनौती बनती जा रही हैं। यदि जनता की वैध मांगों को लगातार अनसुना किया जाता रहा, तो यह संकट भविष्य में और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।

अनिल तिवारी
बीरगंज

 

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