सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग : ओशो रजनीश
विकासनगर के मुख्य ट्रस्टी स्वामी वेद भारती जी से ओशो रजनीश की मुख्य विचारधारा को जानने का प्रयास किया
एस.एस. डोगरा, ओशो भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश या केवल रजनीश के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय विचारक, धर्मगुरु और रजनीश आंदोलन के प्रणेता नेता थे । अपने संपूर्ण जीवनकाल में आचार्य रजनीश को एक विवादास्पद रहस्यदर्शी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में देखा गया । वे धार्मिक रूढि़वादिता के बहुत कठोर आलोचक थे, जिसकी वजह से वह बहुत ही जल्दी विवादित हो गए और ताउम्र विवादित ही रहे । १९६० के दशक में उन्होंने पूरे भारत में एक सार्वजनिक वक्ता के रूप में यात्रा की और वे समाजवाद, महात्मा गाँधी और हिंदू धार्मिक रूढि़वाद के प्रखर आलोचक रहे । उन्होंने मानव कामुकता के प्रति एक ज्यादा खुले रवैया की वकालत की, जिसके कारण वे भारत तथा पश्चिमी देशों में भी आलोचना के पात्र रहे, हालाँकि बाद में उनका यह दृष्टिकोण अधिक स्वीकार्य हो गया । वे एक आध्यात्मिक गुरु थे, तथा भारत व विदेशों में जाकर उन्होने प्रवचन दिये ।
रजनीश ने अपने विचारों का प्रचार करना मुम्बई में शुरू किया, जिसके बाद, उन्होंने पुणे में अपना एक आश्रम स्थापित किया, जिसमें विभिन्न प्रकार के उपचारविधान पेश किये जाते थे । तत्कालीन भारत सरकार से कुछ मतभेद के बाद उन्होंने अपने आश्रम को ऑरगन, अमरीका में स्थानांतरण कर लिया । १९८५ में एक खाद्य सम्बंधित दुर्घटना के बाद उन्हें संयुक्त राज्य से निर्वासित कर दिया गया और २१ अन्य देशों से ठुकराया जाने के बाद वे वापस भारत लौटे और पुणे के अपने आश्रम में अपने जीवन के अंतिम दिन बिताये ।
पिछले दिनों हमारे ब्यूरो प्रमुख, दिल्ली,भारत के एस.एस. डोगरा ने व्यक्तिगत रूप से उत्तराखंड में हथियारी ओशोधारा–विकासनगर के मुख्य ट्रस्टी स्वामी वेद भारती जी से मुलाकात कर ओशो रजनीश की मुख्य विचारधारा को जानने का प्रयास किया । गौरतलब है कि कैथल, हरियाणा के सरकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत स्वामी वेद जी जब २२ वर्ष के थे उस दौरान उन्होंने एक किताब पढ़ी समाजवाद से सावधान । और तभी से वे ओशो भक्त हो गए और पुणे में व्यक्तिगत साक्षात्कार के लिए घर–परिवार छोड़कर कुछ समय तक वहीं रहे । तो आइए जानते हैं ओशो रजनीश के मुख्य एवं सर्वाधित लोकप्रिय विचार ः
साधना ः
बिल्कुल मौन बैठ जाइये और कुछ न करें यही सच्ची साधना है ।
ध्यान ः
अमृत भीतर है । भोजन भी बाहर है, उपवास भी बाहर है भोजन तुम्हारी आत्मा में नहीं जाता, तुम्हारे शरीर में ही अटका रह जाता है, तुम चाहे पैर के बल खड़े होओ, चाहे सर के बल खड़े होओ, तुम्हारे सर के बल खड़े होने से तुम आत्मवान नहीं हो जाते । शरीर को इरछा–तिरछा करो तरह–तरह के आसन–व्यायाम करो, इस सबसे कुछ भी न होगा, जाना होगा भीतर और भीतर जाने की एक ही प्रक्रिया है ध्यान !
असली सन्यासी कौन ?
जी हाँ यह बड़ा ही दिलचस्प प्रश्न है । लेकिन इस शब्द की व्याख्या ओशो रजनीश ने बखूबी दी है । उनका मानना था कि ‘मैं एक सन्यासी की नई धारना दे रहा हूँ मौलिक भेद यही है कि मैं सन्यासी को सर्जनात्मक देखना चाहता हूँ । उसकी कीमत उसके उपवास करने से नहीं होगी, वह कितना पैदा करता है इस दुनिया में, इससे होगी । उसकी कीमत उसने क्या छोड़ा, इससे नहीं होगी, क्या निर्माण किया, इससे होगी । उसकी कीमत उसने शरीर को कितना कुरूप और अपंग किया, इससे नहीं होगी, बल्कि शरीर को कितना सुन्दर किया, स्वस्थ किया, इससे होगी । इस संसार को तुमने जैसा पाया है, उससे कुछ थोडा सुन्दर छोड़ जाओ, तो तुम सन्यासी हो । इस संसार में थोड़े फूल खिला जाओ थोड़ी सुंगध बिखरा जाओ, तो तुम सन्यासी हो ।
आत्मा ः
मैं सन्यास को सिर्फ ध्यान का पर्याय मानता हूँ, सन्यास अर्थात ध्यान । ध्यान से ज्यादा कुछ और करने की जरुरत नहीं है । ध्यान सध जाए, सन्यास साध गया । ध्यान साधने का अर्थ है तुमने जान लिया कि मैं देह नहीं, मन नहीं, आत्मा हूँ ।
मोक्ष ः
प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर बुद्धत्व को लेकर चल रहा है । जब तक वह फूल न खिले, तब तक बैचैनी रहेगी, अशांति रहेगी, पीड़ा रहेगी, संताप रहेगा । वह फूल खिल जाए, निर्वाण है, सच्चिदानंद है मोक्ष है । तुमने यह रहस्य देखा, कमल जैसा कोई फूल नहीं । और कमल गंदगी से पैदा होता है । हमने बुद्ध को कमल पर बैठाया है और हमने विष्णु की नाभि से कमल उगाया है । और समस्त ज्ञानियों ने कहा कि सातवें चक्र में जब उर्जा पहुँचती है तो सहस्रदल कमल खिलता है । जो भी श्रेष्ठ है इस जगत में, हमने उसकी उपमा कमल से दी है । और कमल पैदा कीचड़ में होता है । योग कहता है कीचड़ को फैंको, सफाई करो । सफाई तो हो जाएगी, लेकिन कमल फिर पैदा नहीं होंगे । तंत्र कहता है कीचड़ है इससे कमल हो सकते हैं जरा धैर्य रखो, धीरज रखो, कला सीखो । कमल पैदा हो सकते हैं । और कमल पैदा हो जाए तभी कुछ खूबी है । कमल पैदा हो जाए, तभी कुछ बुद्धिमानी है ।
ओशो रजनीश की एक टैग लाइन सबसे लोकप्रिय हुई ‘सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग’ यह सत्य भी है कि हम कई ऐसे कार्य एवं गतिविधियाँ हमारे जीवन में घटित होती है और यदि हम लोगों के तानों एवं कहासुनी पर ध्यान न दे तो ज्यादा चिंतामुक्त हो खुशहाल जिन्दगी जी सकते हैं ।

