अप्प दीपो भव: अत्त दीपो भव: – : लक्ष्मण नेवटिया
अप्प दीपो भव:
धरती है आज
घने अंधेरे के सिकंजे में,
इस अंधेरे के उसपार जाने
यदि रोशनी तेरे पास
उधार की है तो
बढना होगा पकड़
किसीका हाथ,
अनुनय विनय कर
लेना पड़ेगा किसीका साथ।
रोशनी जब परायी है
तुम्हें बिना बताए
किधर भी मुड़ सकती है।
जाने अनजाने में
बुझ भी सकती है।
तब तुम हो जाओगे
अपनी मंजिल से दूर
होना पड़ेगा हताश,
टूट जाएंगी सारी आश।
करना है मुकाबला
इस घने अंधेरे से तो
जगा स्वयं में उल्लास।
स्वयं ही तुम बन जाओ ना
प्रकाशमान दीपक।
चारों तर्फ फिर होगा
विश्वास ही विश्वास
प्रकाश ही प्रकाश।
करते हुए उच्चारण
भगवान बुद्ध की महावाणी
*अप्प दीपो भव:*
*अत्त दीपो भव:*
*अप दीपो भवथ।*
तब धरती के
किसी अंधेरेमें
तेरे आगे टिकनेका दम
न होगा।
अंधेरा कितना भी बड़ा हो,
तेरे साहस से कम ही होगा।

बिराटनगर
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