Fri. May 29th, 2020

कंकरीट के जंगल में लौट आया है अपना गाँव, क्योंकि आजकल सन्नाटा बोलता है :श्वेता दीप्ति

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आजकल सन्नाटा बोलता है

श्वेता दीप्ति

घर की खामोश दीवारों पर
डोलती तनहाई
जकड़ लेती है खामोश शब्दों को, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
छिपकली की आवाज
भी आज गहरी लगती है,
दीवार पर टँगी
घड़ी की टिकटिक
रात के साए को
और भी गहरा करती है, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
खो गई थी जो चैत के महीने में
कोयल की कूक
चिडि़यों की चहचहाहट
सूरज की पहली किरण के साथ
कानों में घोलती है शहद, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
घर के आँगन में खड़ा
इकलौता आम्रपाली का पेड़
सज गया है मंजरों से
धूल, पेट्रोल की गंध में
खोई उसकी खुशबु
आज पहचानी सी लगी, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
कल हुई बारिश की बूँदों ने
जब भिगोया था धरती को
तब मिट्टी की सोंधी खुशबू को
महसूस किया था मन ने, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
भरी दोपहरी
पेड़ों की टहनियों पर
हवा का झूमना और
पत्तियों की सरसराहट
के बीच पक्षियों के बसेरे में
होती कलरव, भाता है मन को, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
आज नहीं है सड़कों पर
एम्बुलेन्स की डराती आवाज
गाडि़यों के हॉर्न और भागती जिन्दगी
कंकरीट के जंगल में
लौट आया है अपना गाँव, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।

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