उपलब्धिहीन सर्र्खियों में बाबुराम का एक साल
डा. बाबुराम भट्टर्राई ने जब प्रधानमन्त्री का पद सम्हाला, सिर्फएकीकृत नेकपा माओवादी पार्टर्ीीे कार्यकर्ता ही नहीं, आम र्सवसाधारण और कुछ प्रतिपक्षी दल भी बहुत आशावादी हुए थे। सभी ने सोचा था कि अब मुल्क में कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य ही होगा। लेकिन उसके ठीक विपरीत जितनी सत्ता की आयु बढÞती गई, उतना ही डा. भट्टर्राई दर्ुगन्धित होते गए। डा. भट्टर्राई नेपाल के इतिहास में ही ‘नायक’ सिद्ध होंगे, ऐसी आम धारणा थी, लेकिन वही व्यक्ति बाद में सभी के नजर में ‘खलनायक’ के रुप में रुपान्तरित होने लगे। अर्थात् डा. भट्टर्राई का यह एक साल इतिहास के सभी प्रधानमन्त्री की तुलना में चर्चा में तो रहा, लेकिन उपलब्धि शून्य रहा।
पत्रपत्रिका में आनेवाले सामान्य पाठकपत्र के प्रति भी आकषिर्त होकर उसी अनुसार आमजनता को राहत के लिए कार्यक्रम लाने की प्रतिवद्धता व्यक्त करनेवाले डा. भट्टर्राई नेपाल में ही निर्मित सस्ती मुस्ताङ गाडी में सवार होकर खूब चर्चा में आए। जनता की समस्या को सम्बोधन करने के उद्देश्य को ध्यान में रख कर उन्होंने ‘हेलो सरकार’ और ‘जनता के साथ प्रधानमन्त्री’ जैसा अभियान भी सञ्चालन किया। लेकिन एक समय लोकप्रिय ‘हेलो सरकार’ जैसे कार्यक्रम अभी र्सवसाधारण के लिए मजाक का विषय बन गया है। हर महिने एक दिन र्सवसाधारण के घर में जाकर रहना भी उनका एक लोकप्रिय अभियान था।
लेकिन समग्र में मूल्यांकन किया जाए तो एक वर्षकी अवधि में डा. भट्टर्राई उनके द्वारा शुरु किया गया सकारात्मक प्रयास और नकारात्मक परिणाम से ज्यादा चर्चा में रहे। शान्ति प्रक्रिया, संविधान निर्माण और नये निर्वाचन जैसे जिन मुद्दों को लेकेर डा. भट्टर्राई ने प्रधानमन्त्री की कर्ुर्सर्ीीम्हाली थी, उसमें से अभी शान्ति प्रक्रिया के अलावा कोई भी कार्य पूरा नहीं हुआ है। संविधानसभा भंग होने के कारण जेठ १४ गते मंसिर ७ गते के लिए घोषणा किया गया नया संविधानसभा का निर्वाचन भी नहीं हो पाया है।
इसके साथ साथ डा. भट्टर्राई के ही कार्यकाल में नेपाल और भारत से जुडेÞ कुछ सन्धि-सम्झौता विवाद में आया है। राष्ट्रियता, जनजीविका और पार्टर्ीीववाद के सवाल को लेकर एमाओवादी पार्टर्ीीी विभाजित हो गई। पार्टर्ीीध्यक्ष प्रचण्ड ने तो यहाँ तक कहा है कि भट्टर्राई के कारण ही मोहन वैद्य अपने पार्टर्ीीे अलग हो गए हैं, नजाने कब फिर पार्टर्ीीवभाजन होगा ! इस तरह पार्टर्ीीा विभाजन होना सिर्फडा. भट्टर्राई के लिए ही नहीं पूरे मुल्क के लिए दर्ुभाग्यपर्ूण्ा साबित हो रहा है।
माओवादी लडÞाकुओं को नेपाली सेना में समावेश का काम तो हुआ लेकिन इस घटना ने पार्टर्ीीे अन्दर तीव्र असन्तुष्टि पैदा की। जिसके कारण शिविर के भीतर की आर्थिक अनियमितता तो र्सार्वजनिक होना ही था, इसके अलवा माओवादी के हर कार्यकर्ता और लडÞाकू गुट-उपगुट में विभाजित हो गए।
योजना बनवाकर बहुत तामझाम के साथ बजार अनुगमन होने से भी डा. भट्टर्राई के कार्यकाल में महंगी ने आसमान चूम लिया। प्रधानमन्त्री की कर्ुर्सर्ीीम्हालने के बाद कुछ महिने तक उनके द्वारा किए गए कामों को देखकर कालाबजारी और दो नम्बरी धन्दा में कमी आने की उम्मीद थी, लेकिन वह भी नहीं हो पाया। इतिहास में ही सबसे बडÞा मन्त्रिमण्डल भट्टर्राई ने ही बनाया। उस में हत्या और भ्रष्टाचार के आरोपी भी सामिले थे। आर्थिक मितव्यायिता का नारा देनेवाले प्रधानमन्त्री के चायपान-इतिहास मंे ही सबसे खर्चिला साबित हुआ। साथ ही निजी सचिवालय, कर्मचारी की संख्या और उनके खर्च में भी डा. भट्टर्राई सब से आगे ही रहे है।
इसी तरह प्रधानमन्त्री हो कर भी ‘मुल्क चलाने की चावी अन्यत्र है’ जैसी अभिव्यक्ति देने से भी वे विवाद में रहे। सहमतीय सरकार निर्माण में असफल, अध्यादेश से सरकार चलाने का प्रयास, अत्यधिक मात्रा में सरकारी कर्मचारी की अनावश्यक तबादला और पदोन्नति आदि कारण ने भी डा. भट्टर्राई को चर्चा में लाया। प्रधानमन्त्री स्वयं अपने क्रियाकलाप से ही नहीं, उनकी सरकार में सहभागी विजयकुमार गच्छेदार, शरदसिंह भण्डारी, प्रभु साह, र्सर्ूयमान दोङ, जयप्रकाशप्रसाद गुप्ता, सरोज यादव, सरिता गिरी जैसे मन्त्रियों के कारण भी चर्चा में आए।
जनआन्दोलन-२ के बाद सरकार के नेतृत्व करनेवाले चार प्रधानमन्त्री में से सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी डा. भट्टार्राई ही रहे। कभी सस्ते प्लेन टिकट में यात्रा करके तो कभी सरकारी खर्च कटौती के नाम पर आर्थिक मितव्यायिता के नारे लगा कर, कभी ‘हेलो सरकार’ कार्यक्रम में तो कमी ‘जनता के साथ प्रधानमन्त्री’ जैसा नारा देकर, कभी काठमाडू में सडÞक विस्तार में तो कभी राजमार्ग के होटलों में जाकर अचानक निरीक्षण और महंगी तथा मूल्यवृद्धि के विरुद्ध सडÞक पर आकर भी उन्होंने खूब सर्ुर्खियाँ बटोरी।
सरकार में सम्मिलित कुछ मधेशी मन्त्री के प्रति संकेत करते थे- भ्रष्टाचारी के कारण ही मेरी सरकार असफल तो नहीं होगी – मुझे इसी का डÞर है। लेकिन उनकी यह बात भी मजाक का विषय बन गया। क्योंकि प्रधानमन्त्री डा. भट्टर्राई अपनी पत्नी हिसिला यमी और पार्टर्ीीे कुछ मन्त्री द्वारा हो रही अनियमितता रोक नहीं पाए। इसीतरह पर्ूवराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, तथा कुछ पर्ूवविशिष्ट सरकारी अधिकारियों के लिए उन्होंने आजीवन सरकारी सुविधा देने का निर्ण्र्ााकिया। इस मामले में चौतर्फी आलोचना तो हर्ुइ ही, सर्वोच्च में रिट भी दायर हुआ। सर्वोच्च द्वारा सरकारी निर्ण्र्ााके विरुद्ध में फैसला होने के बाद भी कानून बनवा कर ऐसी सुविधा लेने/देने के लिए डा. भट्टर्राई अग्रसर हो गए।
उसीतरह गत साल ही सरकार ने प्रजातन्त्र दिवस नहीं मनाया। उसमें डा. भट्टर्राई खूब आलोचित हुए। वि.सं. २००७ साल से होते आ रहे उस कार्यक्रम को सरकार की ओर से उपक्ष किए जाने पर प्रतिपक्षी दलों ने कहा था- सरकार तानाशाही लाद रही है और प्रजातन्त्र खत्म करने की राह पर चल रही हैं। इस तरह अनेक काण्डों में चर्चित और विवादित भट्टर्राई की लोकप्रियता धीरे-धीरे शून्य की ओर लुढÞकने लगी।

