आंसू तुम्हें,कैसे थामूं ? : अभिलाषा पारीक,”अभि”,
आंसू
आंसू
तुम्हें, कैसे थामूं
तुम,प्रतिबिम्ब हो मेरे
मन की गहरी संवेदनाओं का
झर-झर झरते-झरने से निर्झर
क्रमिक-आवेग के साथ,मेरे
कपोलों पर तुम्हारी मोटी-मोटी
लगातार ,बहती बूंदे
वो बूंदे,प्रतिध्वनि है
मेरे मन
की असंख्य-अनगिनत
खंडित करते प्रहारों की
जो,समय-समय पर, तुम्हारे
स्वरूप से साधती
मेरे
अंतर्मन की व्यथा को
और,रिक्त कर देती
मन के वेदना सागर के
ज्वार को।
आंसू
तुम्हे,कैसे थामू?
प्रेम
प्रेम
शब्द नहीं
अहसास है
विश्वास है
कहे -अनकहे
बुने-अन बुने
उस,रिश्ते का
जिसे आप
आँखों को
बंद करते ही
सबसे समीप पाते है
प्रेम,विश्वास है
उस,प्रेमी का
जो अपने अंतस की
गहराई में अपने
सर्वप्रिय सखा को
सदैव सुरक्षित
अनुभूत करवाती है।

जयपुुर


