“भारतीय उदारता और उग्र, आत्मघाती, खुंखार, खोखला नेपाली राष्ट्रवाद !”
डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
नेपाल और नेपालियों के मन – मस्तिष्क में हालफिलहाल कोरोना Vs मातृभूमि की अवस्था दिखाई पड रही है ! परन्तु, जान से बडा राष्ट्र ही होता है, इस सिद्धान्त और मान्यता को नकारा नहीं जा सकता ! नेपाल के आम जन-मानस के मन-मस्तिष्क में यहाँ के उग्रवामपन्थी विचारधारा के कुछ नितान्त व्यक्तिवादी वर्चस्व और नश्लवादी चिन्तन से ग्रस्त राजनीतिक नेतृत्व द्वारा “भारत और भारतीय राज्य-सत्ता” का विरोध ही “असली नेपाली राष्ट्रवाद” है कहकर भर दिया गया है, नेपाल और नेपाली का पूरे ब्रम्हाण्ड में अगर कोई सब से बडा शत्रु है तो वो है भारत और भारतीय राज्य-सत्ता, जो वर्षों से निरन्तरता दे रहा है । 5 प्रतिशत नेपाली द्वारा अन्य 95 प्रतिशत नेपाली और पूरे विश्व को बताया जाता है या सभी को आश्वस्त करने कि कोशिश की जाती है कि नेपाल के राज्य-सत्ता में पदासीन लोग स्वच्छ, राष्ट्रवादी, निर्दोष, कलंकरहित, साधु-महात्मा है और भारत के राज्य-सत्ता द्वारा अनैतिक तरीके से नेपाल और नेपाली सताया हुआ और अवहेलित है । वास्तविकता से परे और निराधार मनगढंत प्रवृत्ति की उपज आज के खोखला नेपाली राष्ट्रवाद का दोषी सिर्फ नेपाली ही नहीं बल्कि इसका दोषी भारत के शासन-सत्ता के ईर्द-गिर्द देखने वाले कुछ भारतीय राजनीतिक दल, राजनीतिकर्मी और सरकारी संयन्त्र भी है । नेपाली राजनीति का मूल-मंत्र है, भारत का विरोध करो और शासन-सत्ता में काबिज हो जाओ, या फिर सस्ता लोकप्रियता बटोरो । और भारत भी उसी को तबज्जो देता है या फिर युँ कहे कि उसी को अपना मानता है जो उसे बिना कारण ही नंगा करता हो, भर पेट गाली देता हो, उसके राजदूतावास में पथराव और घेराव करता हो, भारतीय राजदूत पर चप्पल से प्रहार करता हो या करबाता हो और भारतीय प्रधानमन्त्री का पुतला जलाता हो । अजीबोगरीब भारत की विदेश नीति है नेपाल के मामले में ! और नेपाल-भारत सम्बन्ध भी । कहने को तो रोटी-बेटी का सम्बन्ध है, पर नेपाली खुंखार राष्ट्रवादियों द्वारा हर समय भारत और भारतीयों को सार्वजनिक रुप से ही नङ्गा किया जाता रहा है । चाहे कितने भी भारत विरोधी गतिविधियाँ क्यों न हो नेपाल में फिर भी बहुत ही सु-मधुर एवं उत्कृष्ट भाईचारा और परम मित्रवत सम्बन्ध होने का दाबा किया जाता रहा है ।
हमेशा से भारत के प्रति नेपाल और नेपालियों की दोधारी नीति रही है अर्थात समायानुकुल स्व-स्वार्थ सिद्धि के हिसाब से अपनी अपनी ब्याख्या और विश्लेषण के साथ साथ उपयोग प्रयोग और उपभोग करना । जैसे कि सन १९५० के दशक में नेपाल के “राणा शासन / श्री ३ शासन ब्यवस्था” के बिरुद्ध तत्कालीन नेपाली कांग्रेस और शाह बंशीय राज संस्था के बीच कार्यगत एकता कराकर नेपाल में प्रजातन्त्र बहाली कराना, सन १९९० के दशक में नेपाली कांग्रेस और तत्कालीन राजनीतिक दलों के अनुरोध, विनती और हारगुहार के प्रभाव में पर भारत द्वारा नाकाबन्दी सहित तत्कालीन राजा बिरेन्द्र पर व्यापक राजनीतिक, कुटनीतिक, आर्थिक, सामरिक एवं सैन्य दबाब डालकर नेपाल में बहुदलीय शासन ब्यवस्था स्थापित करबाना, नेपाल के माओवादी स-शस्त्र आन्दोलन में माओवादी नेताओं को संरक्षण, आर्थिक तथा हाथ हथियार एवं सैन्य तालिम सहित का सहयोग करना, तत्कालीन संसदीय दल और माओवादी नेतृत्व के बीच १२ बुँदे दिल्ली समझौता, बृहत् शान्ति समझौता, २५० वर्ष पुराना परम्परागत एवं नेपाली राष्ट्रीय एकता के प्रतीक एवं विश्व सनातन धर्म के रक्षक तथा विश्व हिन्दु सम्राट की उपाधि से विभुषित राजा और राज संस्था को सदा के लिए नेपाल के ईतिहास में सीमित करवाना लगायत का अनेकन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, संवैधानिक, सैन्य, कूटनीतिक,ब्यापारिक रुपान्तरण और विकास में भारत का सहयोग समर्थन सद्भाव प्रभाव दबाब प्रत्यक्ष रुप से रहा है । और ये तथ्य पूरी दुनिया जानती है और समझती भी है । और इसलिए नेपाल के सम्बन्ध में कोई तीसरा अन्तर्राष्ट्रिय शक्तिकेन्द्र कोई भी नीति बनात है तो उसमे भारतका पक्ष अवश्य सोचता है और भारत से अनिवार्य सहमति भी लेता देखा जाता है । जैसे कि नेपाल में हिन्दु, हिन्दुत्व और हिन्दु राष्ट्र के संवैधानिक प्रावधान और नेपाल के राज संस्था को इतिहास के पन्नों में सीमित करने का जो पश्चिमी मुलक (European Union) का गम्भीर दूरगामी षड्यन्त्रपूर्ण रणनीति बना उसका एक प्रमुख हिस्सेदार, जिम्मेवार और कर्ताधर्ता तत्कालीन भारतीय संस्थापन पक्ष ( डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्वबाले सरकार और भारत के तत्कालीन सत्ता साझेदार राजनीतिक दलों के UPA गठबन्धन) को बनाया गया । अगर तत्कालीन भारतीय संस्थापन पक्ष सजग, सचेत और गम्भीर होकर भविष्य में इससे नेपाल – भारत सम्बन्ध पर पडनेवाला दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पर गम्भीर सुक्ष्म विश्लेषण कर परिणामों पर जोर दिया गया होता तो आज का नेपाल – भारत सम्बन्ध जो एक गम्भीर दुर्घटनाग्रस्त मोड पर खडा है वो शायद नहीं रहता । परिणाम, प्रभाव और परिदृश्य ही कुछ अलग रहता । सदियों से चले आरहे सम्बन्ध में और चार चाँद लग जाता, आज के भारत का रुतबा ही कुछ अलग रहता, विश्वगुरु और महाशक्ति बनने की राह में खडा भारत सूर्य की गति से आगे बढ रहा होता ।
सन 2014 और 2019 में जब अद्भूत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय प्रचण्ड-जनादेश के साथ भारत के शासन-सत्ता में नरेन्द्र मोदी जी और ” भारतीय जनता पार्टी सहित का राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन / NDA” का उदय एवं पुनःसत्तासीन हुआ तब भारतीयों के ही तरह नेपाल के भी आम मुक्ति कामी नेपाली जनता और नेपाल-भारत के हित सोचने बाले पक्षों में भी बहुत सी आशाए, आकांक्षाएँ, उम्मीदें अन्धेरे में सूर्य की किरण की तरह विश्वास पैदा हुआ था पर मोदी जी भी UPA सरकार की नेपाल सम्बन्धी बिदेश नीति को बदलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाए या उतना ध्यान नहीं दिए । और उसका परिणाम ये हुआ कि दिनानुदिन नेपाल-भारत सम्बन्ध और भी गहरी खाई मे गिरता चला गया । पूरी दुनिया जानती है कि भारत सरकार का RAW और बिदेश मन्त्रालय (MEA) नेपाल के मामला में पूरी तरह फेल है, और इसी का फायदा आज पाकिस्तान, चीन, अमेरिका और युरोपियन युनियन उठा रहा है नेपाल और नेपालियों को प्रयोग-उपयोग-परिचालन करते दिख रहा है, नेपाल में अपना प्रभाव – प्रभुत्व – दबदबा अत्यन्त सुक्ष्म स्तर पर बढा रहा है । जिससे नेपाल और नेपाली के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक पर प्रत्यक्ष सूक्ष्म एवं गम्भीर सकारात्मक कम एवं नकारात्मक अधिक प्रभाव डाल रहा है, जिससे न नेपाल और नेपालियों का किसी भी तरह का हित होगा और न ही भारत और भारतीयों का परन्तु भारत के लिए अभिशाप जरुर सिद्ध होगा । आज के नेपाल की अवस्था का सुक्ष्म अध्यन एवं विश्लेषण किया जाए तो भारत के लिए भारत का आन्तरिक काश्मीर मसला है उससे कई गुणा अधिक सरदर्द नेपाल होने जारहा है भारत के लिए, जो निकट भविष्य में भारत के पहुँच और नियन्त्रण से बहुत आगे निकल जाना तय है । अन्तर्राष्ट्रीय महाशक्ति बनने के दौड में रहे सभी महाशक्तियाँ नेपाल के भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य एवं सामरिक वस्तुस्थिति का Micro-Management कर उसे प्रयोग एवं उपयोग करने कि दिशा में दिनानुदिन गुणात्मक छलाङ लगाता दिख रहा है ।
निष्कर्ष :- मेरा और मेरे जैसे आम नेपाली जिनकी आबादी नेपाल में 90% से अधिक है उनका मानना है कि नेपाल और भारत सम्बन्ध को फिर से सु-मधुर, सौहार्दपूर्ण, मित्रवत, सहयोग एवं सहकार्य में आधारित सकारात्मक सम्मानजनक अवस्था में पुनः स्थापित करने के लिए तत्काल निम्नलिखित बुंदागत तथ्यों पर तदारुपता के साथ सूर्य की गति से अविलम्ब निर्णायक कदम उठाया जाए !
1) सन 1950 से आज के दिनांक तक नेपाल सरकार और भारत सरकार के बीच किए गउ सभी लिखित सन्धि, समझौता, प्रतिबद्धता को सार्वजनिक कर उसका अक्षर-अक्षर पालन किया जाए कराया जाए ।
2) सन 1950 से आज के दिनांक तक नेपाल के राजा-महाराजा, राजनीतिक दलों और उनके दलपति एवं प्रतिनिधियों द्वारा भारत सरकार समक्ष किया गया लिखित सहमति, समझौता एवं प्रतिबद्धता सार्वजनिक कियाजाए और पालन किया कराया जाए।
3) भारत सरकार के पहलकदमी, मध्यस्थता और उपस्थिति में नेपाल सरकार द्वारा किया गया, नेपाल के राजनीतिक दलों द्वारा किया गया, नेपाल के राजा-महाराजाओं के बीच हुए सभी प्रकार के लिखित सहमति, समझौता, समझदारी, प्रतिबद्धता सार्वजनिक किया जाए और तत्काल कार्यान्वयन किया कराया जाए ।
धन्यवाद !!
डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
(डा. मनोज कुमार झा)
राष्ट्रिय अध्यक्ष
जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा
अस्वीकरण
ये लेखक के अपने विचार हैं आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए हिमालिनी उत्तरदायी नहीं है ।

