द्वंद्व के कारक राष्ट्रपति
राजनीतिक सहमति नहीं होने और अब तक चुनाव का वातावरण नहीं बनने के लिए राष्ट्रपति भी उतने ही जिम्मेवार हैं। सरकार द्वारा भेजे गए चुनाव संबंधी अध्यादेश को अब
तक अपने पास ही दबाकर रखने और चुनाव के बजाए कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाने का उनका उद्देश्य भी अब आम जनता की समझ में आने लगा है। चुनाव का अध्यादेश स्वीकृत करने के बजाए वर्तमान सरकार को कामचलाऊ बताना, सहमतीय सरकार के लिए बार-बार आहृवान किए जाने के बाद भी दलों पर कोई असर नहीं होना, जनता के समक्ष बयान देना कि वो चुपचाप बैठने वाले नहीं है, कोई ठोस कदम उठाएंगे और शीतल निवास आते ही खामोशी से बैठ जाना। इससे लगता है कि राष्ट्रपति को अपने संवैधानिक दायरे के बारे में अच्छी तरह से मालूम है। लेकिन अपने बडबोलेपन के कारण अपनी फजीहत खुद ही करवा रहे हैं। इस समय राष्ट्रपति का एक ही मकसद चुनाव का होना चाहिए और जल्द से जल्द चुनाव के लिए सरकार को सहयोग करना चाहिए। लेकिन राष्ट्रपति होने के बावजूद कांग्रेसपन के शिकार से ग्रसित डा. रामवरण यादव के लिए वर्तमान सरकार के मातहत चुनाव कराना उनके भविष्य के लिए खतरा हो सकता है और यदि माओवादी की सरकार को छेडÞते हैं तो उनकी कर्ुर्सर्ीीी खतरे में पडÞ सकती है और साथ ही माओवादी के निशाने पर वो आ जाएंगे। इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के अध्यादेश को स्वीकृत करें और कांग्रेस-एमाले को चुनाव में जाने की नसीहत दें, यही उनके लिए अच्छा हो सकता है। राष्ट्रपति के नाम पर कानूनी सल्लाह सुझाव लेने के लिए भी कांग्रेस निकट के कानूनविदों और अधिवक्ताओं को शीतल निवास में जमघट कराकर खुद ही भ्रमित होने के बजाए निष्पक्ष तरीके से आगे बढÞना चाहिए और राजनीतिक संकट को उबारने के लिए सरकार का साथ देना चाहिए।
द्वन्द्व की आग में तपता देश

