Fri. Jul 17th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

दो पाटन के बीच में सावुत बचा न कोय : अजयकुमार झा

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर । दो चट्टानों के बीच कमल के रुप में प्रतिष्ठित नेपाल आज अपनी मूढ़तापूर्ण चालाकी के कारण दो भैसों के बीच का सीयार बन बैठा है। इसे ऐसे समझें! किसी जंगल में एक धूर्त सीयार रहता था। उसे भैसो के खून पीने के बहुत शौक था। अतः उसने एक दिन दो भैसों को आपस में लड़ाने का योजना बनाया। उस योजना में वह सफल रहा। अब वो दोनों भैसे आपस में टक्कर मारते और फिर पीछे हट जाते दौड़ लगाने के लिए। इस बीच सीयार एक पेड़ के नीचे छुपकर खड़ा रहता, और ज्योहीं दोनों भैंसे पीछे हटते और फिर टक्कर मारते उस बीच में वह सियार दोनों भैंसों के फूटे शिर से गिरे लहू को चाटने लगता। यह क्रम लगातार जारी रहा। भैंसे पूरी ताकत से लड़ने लगे। रक्त का मात्रा बढ़ने लगा। अब सीयार मस्ती से चाटने लगे। लेकिन इसबार कुछ जादा ही रक्त वह चूका था। सियार चाटने में इतना व्यस्त हो गया कि वह भूल ही गया कि मैं दो महारथियों के युद्ध मैदान के बिचोबीच खड़ा हूँ, और यही हुआ दोनों भैंसा फिर से आपस में टक्कर दे मारा, लेकिन इसबार उन भैंसों के बीच सियार था जो चिथड़ा चिथड़ा हो गया।
मित्रों यह हालत हमारी होनेवाली है।
भारत चीन दो महारथी है। वह लड़ाई लड़ता ही इसलिए है, ता कि कुछ राजनीतिक लाभ उठा सके। भारत अब काश्मीर, अक्साईचीन, बाल्टिस्तान आदि को अपने टारगेट पे ले चूका है। तो वही चीन अपनी आका माओ के द्वारा निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के साथ साथ विश्व सम्राट का ख्वाव देखने बाला सी जिङ् पिङ का अपना अलग ही सपना है जिसे वो हर हाल में पूरा करना चाहता है। मानवता उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। जीबन, चाहे मानव का हो या अन्य प्राणी का, उसके लिए मिट्टी के ढेले के समान है। उसके इसी योजना के तहत आज हाँङ्गकॉङ्ग और ताईवान युद्ध के कागार पर है। भियतनाम, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देसों से संघर्ष जारी है। इधर भारत से युद्ध शुरू हो चूका है। लद्दाख, नेपाल, अरुणाचल, सिक्किम और भूटान को अपना अगला टारगेट पे रखे हुआ है। इसमे सहज ही झोली में जाने का खतरा नेपाल पर मंडरा रहा है।
नेपाल आज उसी अवस्था में है, जिस अवस्थामे कभी तिब्बत था। परिणाम सबके सामने है। नेपाल से तिब्बत का पुस्तैनी झगड़ा था। तिब्बत ने नेपाल को युद्ध में मात देने के लिए चीन सरकार से सैन्य सहयोग मागा। आज तिब्बत चीनमें विलय है।
आधुनिक चीन के जन्मदाता माओत्से तुङ्ग ने कहा है कि जबतक मेरी पूरी मुठ्ठी नहीं भर जाता तबतक हमें अपने को शक्तिशाली नहीं समझना चाहिए। अपनी मुठ्ठी को प्रतीकात्मक संकेत के रुपमे दर्शाते हुए तिब्बत को दाहिने हाथ की हथेली के रूप में बताया जबकि लद्दाख, सिक्किम, भूटान, नेपाल और अरुणाचल प्रदेश को पांच उंगलियों के रूप में वर्णित किया था। अतः ड्रेगन के लिए यह पाँचो देस चीन में विलय का मुख्य बिंदु है।
सन 1959 में चीन को तिब्बत पर कब्जा करने से नहीं रोका गया और अब वह पांच उंगलियों की तरफ बढ़ रहा है। अगर तिब्बत पर चीन के कब्जे को रोका गया होता तो आज न गलवान न डोकलाम न लद्दाख गतिरोध होता।
आज चीन हर प्रकार से एक शक्तिशाली मुल्क है और उसका अपने पड़ोसियों से आक्रामक रवैया किसी एक चीज़ की वजह से नहीं है। सबसे बड़ा मुद्दा चीन की उच्च महत्वाकांक्षा है। चीन की महत्वाकांक्षा उसको एक ऐसी दिशा में ले जा रही है जहां स्पर्धा और लड़ाई स्वाभाविक हो जाती है। चीन हर प्रकार से दुनिया का सुपरपावर बनना चाहता है, कम्युनिज्म के क्रूर सिद्धांत को विश्वव्यापीकरण करना चाहता है, आज अमरीका भी चीन की ओर देखने को मजबूर है। ट्रम्प और मोदी के राजनीतिक पदों का तो समय सीमा है। इन्हें राजनैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है। लोकतांत्रिक मुल्य और मान्यताओं को लेकर चलना पड़ता है। विपक्षी और पडोसी देसों के भावनाओं को समेटकर चलना इनका राजनैतिक धर्म तथा मान्यता है, जबकि चीन इन सभी समस्याओं से मुक्त है। निष्कण्टक आजीबन राष्ट्र प्रमुख के रुपमे रहने बाला व्यक्ति भला क्योंकर किसी क्षणिक सत्ताधारी से डरे? चीन में जनता को सरकार के किसी भी निर्णय के विरोधमें आन्दोलन करने का कोई अधिकार है नहीं। इधर भारत, अमेरिका अपनी प्रणाली से वाहर नहीं जा सकते। इनकी इस मजबूरी को चीन अच्छी तरह जानता भी है और इन देसों के राजनीति में अपनी दखलंदाजी भी करता है। भारत के मुख्य राजनीतिक धार में आज भी इनके समर्थकों की कमी नहीं है। इस हालात में चीन भारत से क्यों डरेगा? मोदी के विरुद्ध में माहौल तैयार कर किसी पप्पू चप्पू को भारत का प्रधान मंत्री बनाकर अपना सारा योजना पूरा कर लेगा। इसके लिए उसके पास धैर्य और धन दोनों है, जो भारत के पास नहीं है। इसी धैर्य और दूरगामी योजना के कमी तथा खोखला अहंकार के कारण भारत आज नेपाल जैसे विश्व में नमूना पड़ोसी को भी खोने लगा है। इधर इर्ष्या में उबल रहे नेपाल उस देस से गले मिला रहा है जिससे न उसका भाषा मिलता है न संस्कृति। न खानपान मिलता है न रहनसहन। इसके अलाबा चीन आजतक किसीका नहीं हुआ इसका भी बोध नेपाल में नहीं दिखता या नेपाली इसको जानकर नजरंदाज करना चाहता है। आखिर जो भी हो! हर हाल में चीन के साथ दोस्ती आत्मघाती ही सिद्ध होने वाली है।
ज्ञातब्य हो! जब चीन से खुदको बचाने के लिए (द क्वाड्रिलैटरल सिक्युरिटी डायलॉग) (क्यूसिड) जिसे क्वॉड (QUAD) के नाम से भी जाना जाता है, ये अमरीका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच का एक अनौपचारिक राजनीतिक वार्ता समूह है। सन 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने इसका प्रस्ताव रखा था जिसे भारत, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने समर्थन दिया था।
जब साउथ चाइना समुद्र में चीन ने जब अपनी प्रभुता दिखानी शुरू की तो सबको चिंता होने लगी कि चीन दुनिया के नियमों को लात मारकर अपनी दादागिरी चलाना चाहता है। इधर भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया का कारोबार इस रास्ते से होता है। तो एक सामूहिक प्रतिरोध का उपाय यहीं से निकाला गया। आज आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका का चीन के विरुद्ध में भारत के प्रति का समर्थन का भाव इसीका नतीजा है।
नोट:- बुद्धिमान के लिए इशारा पर्याप्त होता है! आगे आप बुद्धिमान हैं।

यह भी पढें   कर्णाली प्रदेश सरकार से कांग्रेस के मंत्रियों ने दिया सामूहिक रुप से इस्तीफा

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *