Thu. Jul 2nd, 2020

आस्तिक हमेशा धोखे और नास्तिक सदैव खोज में होता है : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, नवलपरासी | नास्तिक होना उतना खतरा नहीं होता जितना आस्तिक होने में है । आस्तिक हमेशा भीड में जीता है, नास्तिक अकेले खोज व अनुसंधान में । आस्तिक खतरों से घबराता है, नास्तिक खतरा मोल लेता है । आस्तिक बस्-किसी बात को बिना सवाल स्वीकार लेता है, नास्तिक सवालिया होता है । वह स्वीकारने से पहले रुकता है, सोचता है, परखता है । आस्तिक खोज को झंझट मानता है । नास्तिक खोज को अवसर मानता है । सही में कहा जाय तो आस्तिक उतने बडे आस्तिक हो ही नहीं सकते जितने बडे आस्तिक नास्तिक होते हैं । आस्तिकता और नास्तिकता हर क्षेत्र में व्याप्त है । यह विज्ञान का धरातल है । इसी के जग पर विज्ञान विकास करता है । विज्ञान ने इसी के आधार पर डीएनए (जीन) टेष्ट का आविष्कार किया है ।
आस्तिक कहता है-कौन जानने का लफडा लें ? बस्-मान लो कि देश है, देशभक्ति है, राष्ट्र है, राष्ट्रियता है । वह यही कहेगा कि बस्-मान लेना है कि ईश्वर है, परमात्मा है, गुरु है । वह अपने नेता से कभी नहीं उलझेगा यह पूछने के लिए कि वह जो कर रहा है, कार्यकर्ता के लिए, समाज के लिए, देश और जनता के लिए सही है या नहीं । वह उससे सवाल करने को खतरा मानता है । वह कहता है कि सवाल से उसका नेता बिगर जायेगा, उससे वह नाराज हो जायेगा और कल्ह उसका अवसर खतरे में पड जायेगा । नास्तिक कहलाने बाले किसी का परबाह किए बगैर नेता से सवाल करता है, उसपर शंका करता है । समाज और देश के लिए वह व्यक्तिगत फायदों को किनारे रखकर हिम्मत के साथ वह शंका करेगा, सवाल दागेगा, अनुसंधान करेगा ।
हर धार्मिक और राजनीतिक नेता अपने अनुयायियों से यही कहता है कि वे अनुशासन में रहें । दिये गये जिम्मेदारी आंख बन्द करके पूरा करें । कोई सवाल न करें । शंका किया तो अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी । परिणामतः वे नेता कुछ भी कर लें, उसके अनुयायियों को थपडी पिटकर, गला फाडकर, कलमों के इंक सुखनेतक उसके भक्ति में लीन दिखना पडता है । लेकिन वास्तविकता यह है कि वे प्रेम से नहीं, डर के कारण भक्त बना रहता है । प्रेम तो तब होता है जब दो लोग एक दूसरे को ठीक से जान लेते हैं । तब जाकर एक दूसरे को अपना मानते हैं । जानने से पहले सब आकर्षण है, प्रेम नहीं । प्रेम में वासना नहीं होता । जान गये तो वासना खत्म । आश्चर्य की बात यह है कि अक्सर लोग किसी के चेहरे मोहरे, किताब और कागजी पन्नों के लच्छेदार बातें सुनकर व किसी के सुन्दर भगवे वस्त्र को देखकर उसे साधु और स्वच्छ मानकर आकर्षण के शिकार हो जाते हैं ।
ओशो को माने तो बुद्ध के समय में भारतीय भूखंड पर तकरीबन तीन करोड़ लोग थे, जिनके देवता तैंतीस करोड रहे । तीन करोड लोगों को तैंतीस करोड देवी देवताओं ने थोडा थोडा भी आशिर्वाद दिया होता तो उस भूखंड के लोग आज के अमेरिका से हजारों गुणा विकसित और ताकतवर उसी जमाने में हो जाते । इंसान अपने शरीर और जमीनों को शुद्ध करने के लिए कई पूजा पाठ करते हैं । मगर सन् १९४७ के बाद भारत से अलग हुए जिन्ना के देश ने अपना नाम ही पाकिस्तान (पवित्र भूमि) रख ली । मगर उस पवित्र देश में आज कोई देवी देवता भी जन्म लेने से डरते हैं ।
इसी १५ जुन के दिन भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देहरादून के एक कार्यक्रम में कहा कि भारत और नेपाल के बीच रोटी बेटी का सम्बन्ध है । उन्होंने यह भी जोड देकर कहा कि भारत नेपाल सम्बन्ध को दुनियां की कोई ताकत नहीं तोड सकता । वहीं भारतीय सेना प्रमुख मनोज मुकुन्द नरवणे ने भी भारत नेपाल का रिश्ता ऐतिहासिक होने की बात कही । वर्षों से इन्हीं भावनात्मक भाषाओं के प्रयोग पिछे के कारणों को देखा जाये तो यह रणनीतिक भाषा के आलावा और कुछ भी नहीं है । वास्तव में इस भाषा के प्रयोग ने नेपाल और भारत के बीच दरार और तकरार पैदा करने के अलावा कोई नयां सम्बन्ध निर्माण करने की छनक नहीं दे सकी है । नेपाली शासकों से यदि भारत का बेटी रोटी का सम्बन्ध होता तो चीन के आगोस में नेपाल न होता । शब्दों के धरातल पर इंसान और उसकी इंसानियत कबतक जिन्दा रह सकता है ?
कुछ भारतीय लाल बुझक्कड प्राय: यह कहकर आत्मतृप्ति कर लेते है कि नेपाल भारत का छोटा भाइ है । कभी यह कहा जाता है कि नेपाल के पास है ही क्या ? सब तो भारत से ही पूरा होता है न ! नवनिर्मित भारत के लोग राजनीति को कितना समझते हैं, यह तो वे ही जानें, मगर इतना तो अक्ल से कमजोर है ही कि वे किसी देश को उसके क्षेत्रफल से आंकते हैं । उन्हें कमसे कम इतना ज्ञात होना चाहिए कि विशाल भारत पर आक्रमण करने बाले आक्रान्तायें कोई भारत से बडे देश के नहीं रहे । भारत पर आक्रमण करने बाले प्रथम आक्रमणकारी दारा और मोहम्मद विन कासिम बहुत बडे मुल्क से नहीं आये थे । भारत पर ३४७ वर्ष तक शासन करने बाले अंग्रेज समुद्र के एक छोटे से टापुई देश से ही थे ।
जहाँतक नेपाल भारत बीच बेटी रोटी की सम्बन्ध की बात है तो यह नेपाल और भारत दोनों को समझने की बात होनी चाहिए कि वह सम्बन्ध तो राम और सीता, अयोध्या और जनकपुर के कारण ही तो है न ? आज भी बेटी रोटी सम्बन्ध की बात करें तो क्या कोई पटना-दोलखा, गोरखा-गोरखपुर, पोखरा-लखनउ या काठमांडू-दिल्ली के सम्बन्ध के कारण है या विराटनगर-सहरसा, जनकपुर-पटना, बीरगंज-मुजफ्फरपुर, भैरहवा-कानपुर या अवधगंज-बहराइच सम्बन्ध के कारण ? भारत के ही भाग रहे दार्जिलिंग, सिक्किम, कुमाऊँ, गढवाल जैसे नेपाली भाषा भाषियों के लोग सांस्‍कृतिक रुप से दिल्ली, लखनउ, जबलपुर, कानपुर, हरियाणा से जुडने के बजाय धरान, कांकरभिट्टा, काठमाण्डौ, गोरखा आदि से क्यों सम्बन्ध रखते हैं ? नेपाल ही गोपाल योञ्जन, पारिजात जैसे भारतीय साहित्यकारों को अपना साहित्यकार क्यों मानता है‌ ?
भारत और चीन बीच गलवन उपत्यका में हुए झडप में भारतीय सैनिक के शहादत पर कौन सी नेपाली समुदाय खुशी मनाती है और कौन दु:ख व्यक्त करता है ? भारत पाकिस्तान बीच होने बाले खेलों के प्रतिस्पर्धा में भारत के जीत पर कौन नेपाली ताली बजाता है और कौन भारतीय जीत को गाली देता है ? भारत की राजनीति और राजनेता द्वारा आजतक इन बातों को नहीं समझ पाना आश्चर्य की बात है । स्पष्ट रुप से कहें तो मधेश भारत के इसी द्वैध नीति व भाषा के कारण भारत के नाम से बदनाम होकर नेपाल में दु:ख झेलता आ रहा है ।
हर लेख/आलेख, हर विज्ञापन, हर तर्क, हर स्ट्याटस व हर समाचार में भारत को गाली देना, हर उस मधेशी को जो भारत से सम्बन्धित सत्य बात व्यक्त करें, उसे भारतीय जामा पहनाना नेपाली राष्ट्रवाद का पर्याय हो जाता है । भारत के पक्ष का सही विश्लेषण करने बाले डा. सुन्दर मणि दीक्षित, नेपाली साधु बाबा और सुजाता कोइराला जैसे व्यक्ति/नेतृत्व खुलकर बोलें तो उनपर रमेश प्रसाईं और  अधिवक्ता डा. सुरेन्द्र भण्डारी जैसे राष्ट्रवादी की कागज और कलम दोनों गायब हो जाते हैं । सांसद डा. सुरेन्द्र यादव के अपहरण मुद्दा निवेदन को प्रहरी और सरकारी वकिल कार्यालय द्वारा निवेदन अस्वीकार किया जाता है । काठमाण्डौ में एक यादव के दुकान में घुसकर उनके शर फोड दिये जाते हैं । प्रहरी को कोई मतलव नहीं होता । मगर सरिता गिरी को गिरफ्तार करने हेतु न्याय के प्रवक्ता और प्रहरी दोनों द्वारा तुरन्त निवेदन दर्ता कर दी/ली जाती है ।
आवश्यकता से ज्यादा आस्तिकता और आवश्यकता से ज्यादा नास्तिकता होना दोनों भ्रष्टाचार है । नेपाल गम्भीर न हुआ तो भारत विरोधी आधारहीन नास्तिकता और चीन परस्त आस्तिकता नेपाल के लिए संकट बन सकता है जिसका आभास सोनबरसा के नेपाल भारत सीमा पर हुए विवाद पश्चात नेपाली गोली का शिकार हुए भारतीय युवक के समर्थन में सीतामढी के राजनीतिक पार्टी एवं नागरिक समाज द्वारा लगाये गये “सारा मिथिला भारत का, नेपाल में रहे मिथिला को भारत वापस लें” बाला आवाज कहीं दूसरा मोड ना ले लें । वैसे ही कालापानी लगायत के नक्शे को लेकर नेपाली संसद द्वारा हुए संसोधन को भारत द्वारा अवमानना होना और नेपाल से उस विषय पर भारत के ओर से कोई बात न करने की आवाज आना गंभीर स्थिति को दर्शाता है । नेपाल‌ को हालात को समझने में थोडा भी देरी नहीं करनी चाहिए । अब नेपाल‌ को इस मनस्थिति से भी दूर होना होगा कि भारत का तरफदारी करके चीन से लाभ लें और चीन का धम्की दिखाकर भारत को ऎंठे । नेपाल को सबसे पहले अपना राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक स्तर को उठाना होगा । नेपाल को इस बात से भी वाकिफ होना बेहतर होगा कि अन्तर्राष्ट्रीय अदालत के फैसले के बावजूद फिलिपिन्स ने चीन से अपनी भूमि को वापस नहीं ले पायी है ।
कालापानी,लिपुलेक और लिम्पियाधुरा के विषय में नेपाल को अति गम्भीर व शान्त होकर भारत से बात करने की जरुरत है । वहाँ की जमीनी हकिकत यह भी है कि नेपाल द्वारा दावे किये जा रहे सरजमीनों के दर्जनों लोग भारतीय IAS, IPS जैसे उच्च प्रशासनिक निकायों में कार्यरत हैं । वे सब भारतीय नागरिक कहलाते हैं । दूसरी गंभीर बात उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्य नाथ योगी ने नेपाल से चीन नियन्त्रित तिब्बत के इतिहास को समझने का भी सन्देश दी गयी है ।
आस्तिक और नास्तिक होना व्यक्ति की निजी मामला है । मगर  किसी के आस्तिकता या नास्तिकता से किसी को हानी हो तो वह निजी बात नहीं रह जाता । वह जन सरोकार का बात हो जाता है । कम से कम दो पक्षों की बात तो हो ही जाती है । इस हालत में उसका सही समाधान न हो तो परिणाम भयंकर होने की संभावना होती है जो युद्ध और बर्बादी को आमन्त्रण करता है ।

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