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“मनुष्यता को कर स्वीकार” तथा “चुटकी भर सिंदुर” : निशा अग्रवाल

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मनुष्यता को कर स्वीकार

निशा अग्रवाल

आज रूद्र की भृकुटी में क्षणिक विलास आया है
तो मानव तुने खुद को काल के गाल में पाया है
सोच जरा होगा क्या तेरा, जो तांडव महाकाल करे
मानमर्दित धूलधूर्सित तू, शम्भू का मुण्डमाल बने
जब तक क्षीर पीया, छाती से लगा के रखा धरा ने
दोहन रक्त का किया, फिर भी रक्षित किया धरा ने
हर रेखा लांघ गए हो अब तुम, मर्यादा का भान नही
स्वारथ ताज बना तेरा, तुम्हें दया प्रेम का ज्ञान नही
कहां मनुष्य आज एक ऐसा प्राणीमात्र के लिए जिए
आहत मनुष्यता, आहत सभ्यता, आहत हैं संस्कार हुए
“परहित सरिस धर्म नहि भाई” , माने ऐसा मनुष्य कहां
“परपीड़ा सम नहिं अघ माई” , जाने ऐसा मनुष्य कहां
रक्त रंजित, अश्रुपूरित, विदीर्ण ह्रदया, प्रकृति करे पुकार
ऐ मेरी मानव संतान, उठा भुजा, करो मां का उद्धार
हो मनुष्य मनुष्यता को कर स्वीकार
दो वसुंधरा को प्रेम – प्रीत का उपहार
दीप सहस्रों दया करूणा के जलाकर
दूर करो आपदा- विपदा का अंधकार।
ये कैसी भूख लगी तुझको जो अन्न फल साग से मिटती नही
मासूम निरीह पशु पक्षियों की जान तेरे जिव्हा की बलि चढती रही
तेरे अतिक्रमण का परिणाम देख सांसे भी डर की लेते हो
न जाने कौन सी आखिरी हो सोच के आहें भरते हो।।
सावधान हाँ ऐ इंसां अब सावधान हो जाओ तुम
जीओ और जीने दो का सिद्धांत जीवन में अपनाओ तुम।।।

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चुटकी भर सिंदुर

बचपन से सुनती आयी थी
अपने घर जाएगी
तब कर लेना अपने मन की
किसी चीज पे हक जमाती
भाई चुटिया खींच कहते
यहां कुछ नही तेरा
उसी अपने घर की तलाश में
चंद खुशियों की आस में
भरवाया था मांग में
चुटकी भर सिंदुर

घर छुटा गांव छूटा
पापा से जुड़ा नाम छूटा
भाई बहन संगी साथी
विधालय से रिश्ता तमाम छूटा
जाने क्या क्या छोडा, तो मिला
चुटकी भर सिंदुर।।।।

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खोज थी जिस प्यार की
अपनेपन, सम्मान की
हाथ पकड़ जीवनसाथी का
मनचाही उडान की
कहां दे पाया मुझे
चुटकी भर सिंदुर।।।

आंखों से सपने
होंठों के गीत
जीने की उमंग
ह्रदय से प्रीत
ले गया छीन मुझसे
चुटकी भर सिंदूर।।।

तुमने तो सिर्फ धन लगाया था
मैने तो तन मन सब लुटाया था
बड़ा महंगा पड़ा बाबुल , सच में
जाने किस चाह में भरवाया था
चुटकी भर सिंदुर।।।

निशा अग्रवाल

निशा अग्रवाल
धरान

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