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ओ गिरधारी सुन बनवारी बतिया सांची मोरी : निशा अग्रवाल

 

1 प्रेम निमंत्रण

मेरे अधरों का मौन निमंत्रण
स्वीकार करो मनभावन
आ जाओ बुला रहा कबसे
रूनझुन बरसता सावन

ये विरह की तपस मुझे
युग से झुलसाए जाती है
ओ निर्मोही सांवरिया, तोहे
तनिक लाज नही आती है।

मैं प्रेम बाण से बींधी मृगी
इत उत कुलांचे भरती हूं
ये बाण प्राण न ले जाए
विरहिन मरने से डरती हूं।

नैन बैचेन तेरा पंथ निहारे
पलकें पाषाण सी हो गयी रे
न जाने क्युं रोग लगाया
‘निशा’ बाबरिया हो गई रे।

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2 ओ गिरधारी

ओ गिरधारी
सुन बनवारी
बतिया सांची मोरी

बांस की बैरन बांसरिया
तनिक न भावे मोहे
जब जब थामें तू हाथों में
रस भरे अधर लगाए।

डाह मेरे उर उपजे कान्हा
नैना बरसे नीर बहाए
पी गई घट जल रो भरयो
अन्तर्दाह मिट नाही पाए।

जन्म जन्म की प्यासी मैं
कौन विधि धीरज धरूं
छोड़ के सारी लाज शर्म
तेरी चौखट आन मरूं

मरूं पण नैनां न मूंदूं
लागी दर्शन की आस रे
ह्रदय माही युं टीस उठे
ज्युं कुटे कोई कपास रे।

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जानूं तू सारे जगत का
सगरे तेरे प्रेम बावरे
एक बूंद को तरसे ‘निशा’
पूरण कर दे आस सांवरे।

निशा अग्रवाल
धरान

 

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