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सरकार के सामाजिक न्याय का वादा खोखला है और एजेंडा विचलित है : जयप्रकाश आनंद

 

प्रदेश २ के सरकार में :- पीड़क समुदाय का वर्चस्व कायम है। 

जयप्रकाश आनंद । पूरे देश में दलित समुदाय पर अत्याचार हो रहा है। पहाड़ और मधेस दोनों जगह पर। यहाँ इसके कई उदाहरणों का हवाला देना आवश्यक नहीं है। दलितों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों और अत्याचारों के संदर्भ में, खास करके मधेस में, विशेष रूप से प्रदेश २ के जिलों का उदाहरण देकर सामाजिक न्याय में एक मनोरम स्थान दिखाया गया है। जबकि यह सच नहीं है। दलित समुदाय पर अत्याचार, वर्ण व्यवस्था और सत्तावादी सोच से निर्मित प्रवृत्ति है। पहाड़ और मधेस दोनों के सत्ता ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दमन का पृष्ठपोषण किया है। यदि आप रुक्म में हुए घटना और मधेश में हो रहे घटना पर विचार करे तो पहला सवाल यह आता है कि पुलिस इन मामलों में मामला दर्ज करने से इनकार क्यों कर रही है ? वर्तमान में, दलित समुदाय का सब जगह प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा यह है कि पुलिस प्रशासन प्रथम दृष्टया अपराध के वावजूद मामला दर्ज नहीं करना है।  आम दलितों की नजर में सामाजिक उत्पीड़कों के जगह पर राज्य दमनकारी लगता है।

हाल ही में, प्रदेश-२ से सांसद सुंदर बिश्कर्मा ने एक गंभीर बात कही है। वे कहते है: “मानवाधिकारों के संदर्भ में, प्रदेश-२ रेड ज़ोन में है। यहाँ दलितों के जीवन का अधिकार ही प्रश्न में है। सामंती सोच का बड़ा अवशेष अभी भी बाक़ी है। ” यह निष्कर्ष अपने आप में एक गंभीर मामला है। गंभीर इसलिए  क्योंकि प्रदेश-२ में सरकार चलाने वाली पार्टी का मुख्य एजेंडा ही  सामाजिक न्याय है। यदि सांसद सुंदर बिश्कर्मा के आरोपों की पुष्टि तथ्यों से होती है, तो यह नहीं कहा जाना चाहिए कि प्रदेश-२ की सरकार और सत्ता पक्ष सामाजिक न्याय के मुद्दे पर विचलित हैं और यह एजेंडा छोड़ दिया है।
आइए तथ्यों को देखें। रुकम घटना के बाद से, मधेस में आठ दलितों को बेरहमी से मार दिया गया। कैलाली में एक घटना के अलावा, अन्य सात घटनाएं केवल कोर मधेस या प्रदेश-२ में हुई हैं। प्रदेश-२ में सभी सात हत्याएं या तो सरकार की पुलिस जेल के अंदर हुई हैं या समाज में हुई हैं। ये सभी दलित हत्याएँ, चाहे जेल के भीतर हों या समाज के भीतर, सभी घटनाओं और जेल के अपराधियों की सामाजिक स्थिति और समाज के अपराधियों को देखें तो  एक ही समुदाय के लोगों द्वारा हत्याओं को अंजाम दिया गया।
आइए संक्षेप में विवरण देखें:
 1) रौतहट में  निरंजन राम का हत्या साह परिवार के घर में हुआ।
 2) उक्त निरंजन राम के हत्या में जुड़े बिजय राम की हत्या प्रहरी अधिकृत ज्ञान कुमार महतो और नवीन सिंह के कमान में रहे पुलिस हिरासत में हुई।
3) धनुषा के सबैला में ड्राइबर शम्भू सदा का हत्या प्रहरी निरीक्षक चंद्रभूषण यादव की कमान के पुलिस हिरासत में हुई ।
 4) सप्तरी के डाकनेश्वरी में मेहता परिवार के साथ हाथापाई में मेहता परिवार के प्रहार से सुकदेव मंडल की हत्या हुई।
5) सप्तरी के शंभूनाथ -3 के त्रिभुवन राम का हत्या रासलाल पाल गडेरी और वही के साह परिवार पर हत्या का आरोप लगा।
 6) रौतहट के गढीमाई -3 की मिन्ता देवी की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के अपराधी अज्ञात हैं।
कुछ अपवादों के वावजूद, इन प्रतिनिधि घटनाओं के पीड़ितों और पीड़कों की जातीय और सामाजिक पहचान क्या संदेश देता है ? पुलिस में कार्यरत पीड़क हो या समाज के भीतर के लोग किस समुदाय के  हैं ? उपरोक्त तथ्यों से पीड़क के सामाजिक पहचान का पता चलता है। वे कल के सुनहरे समुदाय से ताल्लुक नहीं रखते हैं। प्रदेश-२ की सरकार में इन दमनकारी समुदायों के लोग अभी भी सत्ता में हैं। सामाजिक न्याय के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता लड़खड़ा गई है और उसका एजेंडा लड़खड़ा गया है।
क्या इस समालोचना का कोई मतलब है ?

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