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बनवासी राम से मर्यादा पुरषोत्तम : मुकेश भटनागर

 

गांधी जयंती एवं दशहरे पर्व के उपलक्ष में

*मुकेश भटनागर* नीतिरस्मि जिगीषताम् ‘- श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण की यह उक्ति बड़ी मार्मिक और महत्व की है। दसवें अध्याय के ३८वें श्लोक में श्रीकृष्ण कह रहे हैं विजय की इच्छा रखने वालों के लिए मैं ही नीति स्वरूप हूं अर्थात आदर्श हूं । भव सागर रुपी यह संसार जटिलताओं से भरा है। मनुष्य के सामने आये अवरोधों, अड़चनों अथवा समस्याओं को पार करने में जिन नियमों या नीतियों की आवश्यकता होती है, वह मैं ही हूं। आप सोचते होंगे बात हम त्रेता युग के राम की मर्यादा की बात करने जा रहे थे पर द्वापरयुग के कृष्ण पर कहां पहुंच गए। परन्तु हमारा कथानक यहीं से आरम्भ होता है। कृष्ण ने जो कहा, राम ने वो आदर्श के रूप में स्थापित किया। मनुष्य जीवन में प्रतिपल जिन निर्णयों या लक्ष्य पूर्ति के लिए साधनरूप में आवश्यकता है वस्तुत: उन्हीं का नाम नीति है। धर्म,अर्थ, काम तथा मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों तथा इन्हें प्राप्त करने के उपायों का निर्देश जिसके द्वारा अथवा जिसमें होता है उसे नीति कहते है। मानव यदि नीति वचनों के अनुसार व्यवहार करता है तो अपना अभीष्ट फल प्राप्त करता है और यदि नीति विरुद्ध आचरण करता है तो असफल हो जाता है – यह बात अनुभव सिद्ध है। वास्तव में नीतिशास्त्र का अर्थ है ‘कर्माकर्मविवेक’अर्थात हर कर्म विवेकपूर्ण हो। समाज में व्यक्ति, परिवार, जाति, वर्ग, राष्ट्र आदि भिन्न भिन्न घटक होते हैं। उसमें व्यक्ति, समाज, जाति, संस्था आदी को परस्पर कैसा व्यवहार करना चाहिए, कैसे रहना चाहिए, इस सम्बंध में कतिपय विशेष नियम होते हैं, जिन्हें नीति शास्त्र कहते हैं। राज्य के सर्वविध अभ्युदय के लिए ‘राजनीति’, धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ‘धर्मनीति’, जीवन के विविध क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने के लिए ‘व्यवहारनीति’, समृद्धि के लिए ‘अर्थनीति’, इस प्रकार प्रबल आततायी तथा धूर्त शत्रु पर विजय पाने के लिए ‘कूटनीति’ को समझने और अनुपालन करने की आवश्यकता है। गीता के जिस श्लोक के अंश को हमने नीति-विधि के रूप में समझने का प्रयास किया उसका पूर्ण भाव इस प्रकार है –

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“दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ।।”

दमन करनेवालों का दण्ड अर्थात उन्मार्ग में चलने वालों को दमन करने की शक्ति मैं हूं। विजय चाहने वालों के लिए न्याय मैं हूं। गुप्त रखने योग्य भावों में मौन मैं हूं। ज्ञान वानों का ज्ञान मैं हूं। नीतिपरख व इस सब वर्णन के उपरान्त यदि हम त्रेता युग में लौटे तो हम पाएंगे किस प्रकार राम ने मर्यादाओं और पुरुषार्थ का सजीव व उत्कृष्ट उदाहरण रखा।

भारत भूमि पर ही नहीं अपितु सुदूर पूर्व व दक्षिण एशिया के कई देशों में राम और रामायण एक असाधारण श्रद्धा का केंद्र हैं। राम एक ऐसा नाम है जो अभिवादन या नमस्कार का पर्यायवाची हैं, अपने महल को त्यागकर राम बनवास क्या गये वह घर घर में बस गए, निशाद राज से ले कर रावण वध तक राम ने सभी नीति कुशल मर्यादाओं का पालन किया और अपने आचरण से यह सिद्ध कर दिया, यदि मनुष्य उन सब का अपने दैनिक कार्यों में धारण करें – तो उसके नाम का अभिवादन से अन्तिम यात्रा तक, गुण गान होता है। श्रीराम ने जब बनवास के लिए प्रस्थान किया तब उनकी उम्र 25 वर्ष की थी और सीता की उम्र 18 वर्ष तथा लक्ष्मण अपने भाई से एक आध वर्ष छोटे रहे – समझने का विषय यह है कि इस उम्र में श्रीराम ने किस प्रकार धैर्य,अनुशासन, व्यवहार कौशल आदि गुणों द्वारा सम्पूर्ण मानव जाति एवं प्राणी जगत के लिए अनुकरणीय उदाहरण रखा। सूर्यवंशी और चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र राम, गुरुकुल तथा बनवास की सभी मर्यादाओं का पालन करते हैं। माता व विमाताओं में कोई भेद नहीं, भाईयों से प्रेम की कोई सीमा नहीं, प्रजा की आंखों के तारे, पराक्रम की कोई तुलना नहीं, हर एक को अपने मधुर स्वभाव से जीत लेने की कला, यज्ञ एवं ऋषि अनुष्ठानों में व्यवधान डालने वाले असुरों का वध यहां तक कि श्राप वश राक्षस योनि में जन्में व्यक्तियों का उद्धार किया। यदि ध्यान से मनन किया जाए तो श्रीराम द्वारा स्थापित नीति, आगे के युगों के लिए मील का पत्थर साबित हुई। उन्हीं का उल्लेख गीता में व आगे चल कर तुलसी रचित रामचरितमानस में पढ़ने को मिलता है।

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श्रीराम राज्याभिषेक के समाचार से प्रसन्न नहीं होते और बनवास गमन का उन पर लेश मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। सभी योजनाओं में उनका पराक्रम झलकता है लेकिन वे इसका श्रेय अनुज लक्ष्मण को व बानरों और अपनी सेना को देते हैं। राम जातिवर्ग से परे हैं शबरी, निषाद, केवट से अगाध प्रेम जताया, नर हो या बानर, मानव हो या दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता झलका। क्षमाशील और शरणागत वत्सल इतने कि राक्षसों को भी मुक्ति देने को तत्पर। वे सिखाते हैं कि बिना छल-कपट के मानव अपना जीवन सहर्ष ही नहीं अपितु इश्वरीय-तत्व को भी प्राप्त कर सकता है। ‘नरो नारायणो भवेत’ अर्थात नर ही नारायण है को उन्होंने ऐसा प्रमाणित कर दिया कि आज उनका नाम ही ‘पतित पावन’ हो गया। राम, भगवान विष्णु के सातवें अवतार माने जाते हैं या यूं कहें कि उनका जीवन ही विष्णु स्वरूप है – पालन करता। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यों और संयम का नाम राम है। असीम ताकत अथवा अद्वितीय गुण आमतौर पर अंहकार को जन्म देते है लेकिन अपार शक्ति के बावजूद राम संयमित हैं। युवा पत्नी के साथ 14 वर्ष तक आरण्य विहार में रहते हुए भी राम ने आसक्ति भावना एवं अपनी कामुक इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा। पत्नी के हरण कर्ता, दैत्य राज रावण का वध करने के उपरान्त भी वह उसके अन्तिम क्षणों में उस से ज्ञान प्राप्ति के लिए अपने अनुज लक्ष्मण को भेजते हैं।

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राम का जीवन एक आदर्श जीवन है। ईमानदार व सज्जन के लिए वो सखा है और आतताइयों के बैरी व शत्रु। जब राम अयोध्या से बनवास के लिए चले तो साथ में सीता और लक्ष्मण थे, जब लौटे तो पूरी सेना के साथ। एक राज्य को नष्ट करके और एक राज्य का निर्माण करके। कलयुग की बात करें तो महात्मा गांधी ने राम के जरिए हिन्दुस्तान के सामने एक मर्यादित तस्वीर रखी। गांधी उस राम राज्य के हिमायती थे जहां लोकहित सर्वोपरि हो। गांधी ने बिना खड्ग बिना ढाल, एक साम्राज्य की नींव हिला दी और युग पुरुष मानें गये। गांधी का प्रिय भजन, राम के जीवन को चिरतार्थ करता है – “वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीड़ पराई जाणे थे। पर दु:खे उपकार करें तो ये, मन अभिमान न आणे रे ।।”

आईये १५१वी गांधी जयंती तथा दशहरे के अवसर पर, हम सभी अपना अवलोकन करें कि वास्तव में हमारे भीतर कितना ‘राम’ और कितना ‘गांधी’ का अंश है। आज आदर्श, मर्यादाओं और वैदिक परम्पराओं को पुरातत्व संग्रहालय के रूप में देखा जाता है परन्तु अनुभव यह कहता है वहीं मुल्य आदमी को इंसान का दर्जा देते हैं। बहुत जल्दी बहुत ज्यादा पाने की लालसा व्यक्ति को उन्माद और अनैतिक कर्मों की ओर धकेल रही है। सहस्त्रों वर्ष हो गए आज भी राम सभी के हृदय में बसे हुए है। हमें क्षणिक सपनों और शोहरत की दौड़ में आदर्शों का परित्याग नहीं करना है। मर्यादित रहते हुए परम्परागतआदर्शों का पालन करना व्यक्ति को सुख और शांति की ओर अग्रसर करता है।

मुकेश भटनागर*
*वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं समाज सेवी*
*दिल्ली, भारत से*

 

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