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मधेश आश्रित दलों का संकट,आवश्यकता और पुनरुत्थान की संभावना : चन्दन दुबे

 

चन्दन दुबे, 13 जुलाई। सन् २०८२ (वि.सं.) के प्रतिनिधि सभा चुनाव ने राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ मधेश की राजनीतिक जमीन पर भी गहरा परिवर्तन लाया है। मतदाताओं ने पारंपरिक राजनीतिक शक्तियों के प्रति बढ़ते असंतोष को व्यक्त करते हुए नए विकल्पों पर विश्वास जताया है। इसका प्रभाव केवल केंद्र की सत्ता-राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक समय मधेश के प्रतिनिधित्व का पर्याय माने जाने वाले मधेश आश्रित दलों के राजनीतिक भविष्य पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। मधेश प्रदेश की ३१ संसदीय सीटों पर एक ही राष्ट्रीय शक्ति का प्रभाव बढ़ना केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि मधेशी मतदाताओं की बदलती राजनीतिक मनोवृत्ति का भी स्पष्ट संकेत है। इससे यह साफ हो गया है कि अब मतदाता आंदोलन के इतिहास से अधिक सुशासन, विकास, रोजगार, ईमानदारी, जवाबदेही और परिणाम देने वाले नेतृत्व को प्राथमिकता देने लगे हैं।
मधेश आंदोलन की उपलब्धियाँ और राजनीतिक विचलन
२०६३/६४ का मधेश आंदोलन नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। दशकों से उपेक्षित महसूस कर रहे मधेशी समुदाय की आवाज़ को इस आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुँचाया। समानुपातिक प्रतिनिधित्व, समावेशी राज्य व्यवस्था, संघीयता, नागरिकता, भाषाई अधिकार तथा राज्य के निकायों में समान अवसर जैसे मुद्दे राष्ट्रीय बहस के प्रमुख विषय बने। इसी आंदोलन की ताकत पर मधेश आश्रित दलों ने राष्ट्रीय दलों को काफी हद तक चुनौती देते हुए अधिकारों के सशक्त प्रतिनिधि के रूप में अपनी पहचान बनाई और मधेशी जनता की आशाओं तथा विश्वास का केंद्र बने।
लेकिन आंदोलन से प्राप्त राजनीतिक पूंजी को संस्थागत उपलब्धियों में बदलने में वे सफल नहीं हो सके। आंदोलन की ऊर्जा को नीति, विकास और सुशासन की दिशा में लगने के बजाय सत्ता साझेदारी, मंत्रालयों के बँटवारे, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और लगातार दल-विभाजन में खर्च कर दिया गया। एक ही उद्देश्य लेकर बने दल बार-बार टूटते, जुड़ते और फिर विभाजित होते रहे, जिससे उनकी संगठनात्मक विश्वसनीयता कमजोर होती गई। जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा साझा एजेंडा से ऊपर चली गई, तब मधेश आंदोलन की नैतिक धरातल भी धीरे-धीरे क्षीण होती चली गई।

शासन का अवसर,परिणाम में निराशा

पिछले वर्षों में मधेश आश्रित दलों को संघ, प्रदेश और स्थानीय तीनों स्तरों पर सरकार चलाने का अवसर मिला। लेकिन जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप सेवा प्रवाह में सुधार, कृषि आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण, रोजगार सृजन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आधारभूत संरचना के विकास में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ दिखाई नहीं दीं। विकास का दायरा प्रायः मिट्टी-ग्राभेल, गेट निर्माण, बाउंड्री वॉल और पीसीसी ढलान जैसे कार्यों तक ही सीमित रहा। विशेष रूप से मधेश प्रदेश सरकार पर सुशासन की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप, अस्थिरता, सत्ता संघर्ष, प्रशासनिक कमजोरी, विकास की धीमी गति तथा भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप लगातार लगते रहे। इसका प्रत्यक्ष राजनीतिक मूल्य उन्हें २०८२ के चुनाव में चुकाना पड़ा।

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अलग-अलग दल,अलग-अलग चुनौतियाँ

मधेश आश्रित दलों का संकट एक जैसा नहीं है। जसपा, लोसपा और जनमत पार्टी की चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी अलग-अलग हैं।
जसपा
जसपा मधेश आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हुई थी। उसने मधेश के साथ-साथ आदिवासी, जनजाति और अन्य उत्पीड़ित समुदायों की साझा राजनीतिक आवाज़ बनने का प्रयास किया। पार्टी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव को व्यापक मधेशी समाज के साथ-साथ यादव समुदाय का भी मजबूत समर्थन प्राप्त हुआ । लेकिन लगातार दल-विभाजन, नेतृत्व का अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रीकरण, बिना स्पष्ट एजेंडा के बार-बार सरकार में शामिल होना तथा आंदोलन की उपलब्धियों को प्रभावी राजनीतिक परिणामों में बदलने में असफल रहने के कारण उसका जनाधार लगातार कमजोर होता गया। संगठन के भीतर मजबूत छवि रखने वाले उपेन्द्र यादव पर जनता और समाज की अपेक्षा अपने करीबी लोगों को अधिक महत्व देने के आरोप भी लगते रहे । इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष बढ़ता गया। फिर भी सुधार की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है। यदि जसपा आंदोलन की विरासत को विकास, सुशासन और नई पीढ़ी के नेतृत्व से जोड़ते हुए समय सापेक्ष निर्णय ले सके, तो उसका पुनरुत्थान असंभव नहीं है।
लोसपा
लोसपा का संकट मुख्यतः वैचारिक अस्पष्टता और संगठनात्मक कमजोरी से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। आंदोलन के बाद दीर्घकालीन राजनीतिक रणनीति विकसित न कर पाने के कारण उसका प्रभाव सीमित भूगोल और पारंपरिक नेतृत्व तक सिमट गया। महंथ ठाकुर और शरद सिंह भण्डारी जैसे नेता भी अपने आसपास के चाटुकार और अवसरवादी कार्यकर्ताओं के घेरे से बाहर नहीं निकल सके। परिवारवाद और जातिवाद के आरोप, युवाओं को आकर्षित करने में असफलता, कमजोर संगठन विस्तार तथा नए राजनीतिक मुद्दे खड़े न कर पाने जैसी चुनौतियाँ उसके सामने हैं। नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन, संगठन को मजबूत करना तथा कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भारत-नेपाल के वैवाहिक एवं व्यापारिक संबंध जैसे मुद्दों पर केंद्रित राजनीतिक दृष्टिकोण ही उसके पुनर्जीवन का आधार बन सकता है।
जनमत पार्टी
जनमत पार्टी एक वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी। डॉ. सीके राउत के नेतृत्व में इसने जनमत संग्रह और देश विभाजन जैसे आक्रामक नारों के माध्यम से युवाओं को आकर्षित किया तथा कृषि, शिक्षा, वैदेशिक रोजगार, भ्रष्टाचार नियंत्रण और सेवा प्रवाह को प्राथमिकता दी। लेकिन आंदोलनकारी शैली से एक जिम्मेदार शासकीय दल में परिवर्तित न हो पाना इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गयी । बार-बार दल-विभाजन, नेतृत्व की अपरिपक्वता तथा केवल विरोध की राजनीति ने डॉ. सीके राउत के प्रति आम मतदाताओं में असंतोष और अविश्वास पैदा किया। सरकार संचालन, नीति क्रियान्वयन, संगठन विस्तार और सक्षम नेतृत्व निर्माण में कमजोरी के कारण यह पार्टी भी अपने पूर्ववर्ती मधेशवादी दलों जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है ।

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बदलता मतदाता और मधेश आधारित दलों की आवश्यकता

२०८२ के चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि मधेश के मतदाताओं की प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं। पहचान और अधिकार आज भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, लेकिन अब वे अकेले पर्याप्त नहीं हैं। विशेष रूप से युवा, शिक्षित वर्ग और विदेश से लौटे नागरिक भ्रष्टाचार नियंत्रण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवा, उद्यमिता, डिजिटल सेवाएँ, प्रभावी प्रशासन और आर्थिक अवसरों को प्राथमिकता देने लगे हैं। अब जनता घोषणापत्र से अधिक उसके क्रियान्वयन, भाषण से अधिक उपलब्धियों और नारों से अधिक सुशासन का मूल्यांकन कर रही है।
फिर भी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि मधेश केंद्रित राजनीतिक शक्तियों की आवश्यकता समाप्त हो गई है। मधेश की अपनी विशिष्ट चुनौतियाँ हैं—भारत के साथ सांस्कृतिक एवं वैवाहिक संबंध, खुली सीमा का प्रभावी प्रबंधन, सीमापार व्यापार का विस्तार, सिंचाई, बाढ़ और जलभराव नियंत्रण, कृषि का आधुनिकीकरण, औद्योगिक विकास, नागरिकता से जुड़ी व्यवहारिक समस्याएँ, भाषा और संस्कृति का संरक्षण तथा संघीय व्यवस्था का प्रभावी कार्यान्वयन। इन मुद्दों को लगातार राष्ट्रीय विमर्श में उठाने वाली क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति की आवश्यकता आज भी बनी हुई है।
साथ ही राष्ट्रीय दल भी अब मधेश को केवल चुनावी भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के निर्णायक आधार के रूप में देखने लगे हैं। वे मधेश के स्थानीय मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल कर रहे हैं। ऐसे में यदि मधेश आश्रित दल क्षेत्रीय पहचान को आर्थिक समृद्धि, निवेश, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जोड़ने में असफल रहे, तो उनके लिए दीर्घकालीन राजनीतिक प्रभाव बनाए रखना कठिन होगा।

पुनरुत्थान का रास्ता

मधेश आश्रित दलों का पुनरुत्थान असंभव नहीं है, लेकिन केवल उपेन्द्र यादव, महंथ ठाकुर और सीके राउत के एक मंच पर आ जाने से यह संभव नहीं होगा। इसके लिए गंभीर आत्ममंथन और संरचनात्मक सुधार अनिवार्य है।
पहला, समान उद्देश्य रखने वाले दलों के बीच न्यूनतम साझा एजेंडे पर सहयोग या एकीकरण आवश्यक है। व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण लगातार होने वाले विभाजन ने मतदाताओं में भ्रम और अविश्वास पैदा किया है।
दूसरा, नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन होना चाहिए। आंदोलनकालीन नेतृत्व का योगदान ऐतिहासिक है, लेकिन बदलते समाज, तकनीक और राजनीतिक चेतना के अनुरूप युवाओं को निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में लाना होगा।
तीसरा, पहचान की राजनीति के साथ विकास का स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करना होगा। कृषि, औद्योगिक कॉरिडोर, सीमापार व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, पर्यटन, कौशल आधारित शिक्षा और स्थानीय रोजगार सृजन जैसे व्यवहारिक कार्यक्रमों के बिना नई पीढ़ी को आकर्षित नहीं किया जा सकता।
चौथा, सुशासन, पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र को व्यवहार में लागू करना होगा। भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अवसरवाद और व्यक्तिकेंद्रित राजनीति से मुक्त राजनीतिक संस्कृति के बिना जनता का खोया हुआ विश्वास वापस नहीं आएगा।
पाँचवाँ, अधिकार प्राप्ति के आंदोलन से आगे बढ़कर अधिकारों के प्रभावी उपयोग की राजनीति विकसित करनी होगी। यदि संघीयता, समावेशिता और समानुपातिक प्रतिनिधित्व को व्यवहार में प्रभावी बनाने की स्पष्ट नीति प्रस्तुत की जा सके, तभी मधेश आश्रित दल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता पुनः स्थापित कर पाएँगे।

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अंततः

२०८२ के प्रतिनिधि सभा चुनाव ने मधेश आश्रित दलों को एक स्पष्ट संदेश दिया है। जनता अब भाषण से अधिक उपलब्धियाँ, नारों से अधिक सुशासन, भावनाओं से अधिक परिणाम और व्यक्तियों से अधिक संस्थागत नेतृत्व चाहती है। यदि मधेश आश्रित दल इस संदेश को समय रहते आत्मसात कर लें, तो उनका राजनीतिक भविष्य अभी भी सुरक्षित रह सकता है। लेकिन यदि वे पुराने तौर-तरीकों, व्यक्तिकेंद्रित नेतृत्व, सत्ता-केंद्रित राजनीति और आंतरिक विभाजन में ही उलझे रहे, तो उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार सिमटता जाएगा।
अंततः मधेशवादी राजनीति का भविष्य किसी एक नेता या दल के एकीकरण से तय नहीं होगा। उसका भविष्य विचारों के नवीकरण, सक्षम नेतृत्व, सुशासन, विकासोन्मुख राजनीति, संगठनात्मक सुधार और जनता का विश्वास पुनः अर्जित करने की क्षमता पर निर्भर करेगा। इसलिए २०८२ के चुनाव को मधेश आश्रित दलों के अंत के रूप में नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन, संरचनात्मक सुधार और नई राजनीतिक यात्रा की शुरुआत के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। तभी मधेशवादी राजनीति नई ऊर्जा प्राप्त कर सकेगी, अन्यथा आंदोलन द्वारा निर्मित ऐतिहासिक राजनीतिक विरासत धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सीमित होने का खतरा बना रहेगा।

चन्दन दुबे

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