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नेपाल की विदेश नीति का परीक्षण–समय : डॉ. श्वेता दीप्ति

 


डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी, अंक अगस्त 2020। यह समय वैश्विक स्तर पर निःसन्देह हताशा और निराशा का है । पूरा विश्व आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, भुखमरी से जूझने की अवस्था में है । बावजूद इसके न तो जिन्दगी रुकती है, न कोई देश रुकता है और नही राजनेता और राजनीति की कवायद । जहाँ पूरा विश्व इस महामारी के चपेट से निकलने की कोशिश में है वहीं कुछ देश ऐसे हैं जो विस्तारवादी सोच को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं । जिसमें सबसे महत्तवपूर्ण नाम चीन का है । लगातार वह इस महामारी का फायदा विभिन्न तरीकों से लेने की कोशिश में लगा हुआ है । और इसके लिए वह छोटे–छोटे अविकसित देशों को अपना हथियार बना रहा है । मजे की बात तो यह है कि परिणाम का अंदेशा होने के बाद भी कई देश उसके ऋणजाल में सहजता से फस रहे हैं । पाकिस्तान ने तो खुद को पूरी तरह से चीन के हाथों में सौंप दिया है । कर्ज के तले दबा पाकिस्तान आज चीन के हाथों खिलौना बना हुआ है ।

इसी बीच कोरोना नियंत्रण के लिए चीन ने तीन एशियाई देशों के साथ सहयोग करने और आगे बढ़ने का प्रस्ताव रखा है । ये देश हैं नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान । यों तो नेपाल की वर्तमान राजनीति को देखें तो, यह कहने से कोई गुरेज नहीं है कि, इसपर चीन का पूरा असर दिख रहा है । और यह बात पिछले दिनों की कई घटनाओं ने स्वयं सिद्ध कर दिया है । पर आज सवाल देश की अस्मिता और सुरक्षा का है । क्या देश को विकास या सहयोग के नाम पर किसी भी सरकार को गिरवी रखने का हक है ?

सभी जानते हैं कि नेपाल में लंबे संघर्ष की बदौलत राजशाही के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई है । नेपाल में २० सितंबर २०१५ के बाद नया संविधान लागू हुआ । हालाँकि २००७ में ही अंतरिम संविधान बनने के बाद नेपाल में राजतंत्र का खÞात्मा हो गया था ।

नेपाल में इस नई व्यवस्था के बाद से राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति कमोबेश आज तक बनी ही हुई है । केपी शर्मा ओली इस नई व्यवस्था के अंतर्गत सुशील कोईराला को हराकर अक्तूबर, २०१५ में पहले चुने गए प्रधानमंत्री बने थे । लेकिन इसके कुछ ही महीनों के बाद अगस्त २०१६ में पुष्प कमल दहाल प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने । सिर्फÞ नौ महीने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफÞा दे दिया और नेपाली कांग्रेस पार्टी के शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने । शेर बहादुर देउबा के बाद फिर से केपी शर्मा ओली फरवरी २०१८ में नेपाल के प्रधानमंत्री चुने गए ।

पिछले कÞरीब साढ़े चार सालों में चार बार नेपाल के प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं । अभी बहुमत से चुनी हुई सरकार है, जिससे कई उम्मीदें जनता को थी परन्तु उन उम्मीदों को धाराशायी होने में वक्त नहीं लगा । मौजूदा जो संकट नेपाल की राजनीति में पैदा हुआ है वो किसी विपक्षी दल की ओर से पैदा किया गया संकट नहीं है । यह पार्टी के अंदर पैदा हुआ संकट है । यह सत्ता की खींचतान का संकट है । नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेता स्वार्थ के दलदल में धंस चुके हैं । सारी लड़ाई अब इस बात को लेकर है कि पार्टी का अध्यक्ष कौन होगा और प्रधानमंत्री कौन होगा । यह पहले भी होता रहा है और आज भी हो रहा है इसमें कुछ नया नहीं है ।

पर आज सवाल यह है कि कहीं सरकार देश के अस्तित्व के साथ खेल तो नहीं रही । हमेशा से विज्ञ यह कहते आए हैं कि, नेपाल दो शक्तिशाली देशों के बीच स्थित है इसलिए इसे निरन्तर सतर्क और सजग रहने की आवश्यकता है । पर क्या आज ऐसा हो रहा है ? खुले तौर पर हर छोटी बड़ी बात के लिए मित्र राष्ट्र भारत से जो तनाव पैदा की जा रही है क्या वह सही है ? हम चीन से अधिक भारत पर निर्भर हैं क्योंकि हमारी भौगोलिक स्थिति ऐसी है, और जिसे हम बदल नहीं सकते । ऐसे में अपनी ही जनता को तकलीफों के दलदल में घसीटना कहाँ तक उचित है ? नेपाल के लिए ये दोनों ही पड़ोसी आवश्यक हैं पर जिस तरह हर मसले पर नेपाल का चीन क ीओर झुकना किसी और ही समीकरण की तरफ ध्यान खींच रहा है । जहाँ नेपाल को तटस्थ होना चाहिए था वहाँ वह खुलककर चीन के साथ खड़ा नजर आता है । ऐसे में नेपाल की विदेश नीति पर आज विश्लेषण करने की जरुरत आन पड़ी है । जिसपर समय समय पर राजनीतिक विज्ञ अपनी सलाह देते आए हैं । हाल ही में चीन के तीन दक्षिण एशियाई देशों के साथ सहयोग करने के प्रस्ताव पर, विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि नेपाल अपनी विदेश नीति की सीमाओं को स्पष्ट करके ही आगे बढ़े । उन्होंने कहा है कि दुनिया में एक नए तरह का ध्रुवीकरण उभर रहा है और इस हालत में नेपाल को इस तरह के उप–क्षेत्रीय समूहों में संलग्न होने से पहले विशेष ध्यान देना चाहिए ।

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वर्तमान में वैशिवक स्तर पर चीन अपनी विस्तारवादी नीत और कोरोना महामारी पर अपनी लापरवाही तथा बातों को छुपाने के कारण अकेला खड़ा है । उसकके साथ अगर कोई है तो वह है पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश । चीन ने तो खुले तौर पर नेपाल को नसीहत भी दे दी है कि नेपाल को पाकिस्तान के जैसा बनना चाहिए । इस बात का क्या अर्थ लगाया जाए । उदाहरण दिया गया तो उस पाकिस्तान का जो स्वयं कई मसले पर विश्व की नजर में असफल और संदिग्ध है । हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की एक संयुक्त बैठक बुलाई और सहयोग के चार बिंदुओं का प्रस्ताव दिया ।

इस विषय पर चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अपनी ओर से वीडियो कान्फ्रेंस पर अपने विचार सार्वजनिक नहीं किए हैं । जबकि विदेश मंत्रालय को अपनी नीति तत्काल जाहिर करनी चाहिए थी । चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, स्टेट काउंसिलर वांग ने कहा कि चार देशों के बीच घनिष्ठ मैत्रीपूर्ण संबंध हैं और उन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने, अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और लोगों की आजीविका की रक्षा करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए । उसके द्वारा प्रस्तावित चार बिंदुओं में संकल्प का पहला बिंदु संयुक्त रूप से कोरोनावायरस से लड़ने के लिए संचार और समन्वय पर जोर देता है । जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कुछ पश्चिमी देशों ने कोविड –१९ महामारी फैलाने के लिए चीन को दोषी ठहराया है और भेदभावपूर्ण विचारों के लिए संयुक्त प्रतिक्रिया का आह्वान किया है ।

चीन ने प्रस्ताव के दूसरे बिंदु में क्षेत्रीय सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि चीन–पाकिस्तान संयुक्त कोविड १९ प्रतिक्रिया जैसे कार्यक्रमों को अन्य दो देशों में भी विस्तारित कर सकता है । तीसरा बिंदु था कि चीन कोविड १९ के उपचार और टीकाकरण से संबंधित सहायता प्रदान करेगा और महामारी को नियंत्रित करने में तीन देशों की सहायता करेगा । सभी चार देशों के विशेषज्ञ कोरोनावायरस नियंत्रण के अनुभव और उपलब्धियों पर चर्चा करेंगे । तथा चौथा बिंदु कोरोनोवायरस महामारी के बाद आर्थिक सुधार है । यहाँ अगर सावधानीपूर्वक चीन की नीति पर गौर करें तो साफ जाहिर है कि इस बैठक के माध्यम से वह अपनी महत्वाकांक्षी अवधारणा बेल्ट एंड रोड की याद दिला रहा था क्योंकि, वो किसी भी परिस्थिति में इस योजना को ओझल नहीं होने देना चाहता और इसीलिए ऐसे वर्चुअल बैठक की आयोजना करता है ।
इस बैठक में महामारी से निबटने से ज्यादा बल अपनी योजना पर दिया ।

चीन ने अपनी इस बैठक में चार देशों को जल्द से जल्द महत्वपूर्ण बेल्ट एंड रोड अवधारणा परियोजनाओं को शुरू करने और आर्थिक और उत्पादन–आपूर्ति प्रणालियों को स्थिर करने पर काम करने का आह्वान किया । चीन ने कहा है कि वह ऋएभ्ऋ नामक पाकिस्तान के साथ अपने आर्थिक गलियारे का विस्तार करेगा और नेपाल के साथ हिमालयी सीमा पार संचार नेटवर्क और अफगानिस्तान के साथ ऋएभ्ऋ का विस्तार करेगा । चीन और पाकिस्तान ने एक दूसरे को ‘सुख और दुःख के दोस्त’ के रूप में चित्रित किया है । वहीं हाल के वर्षों में, चीन ने अफगानिस्तान में अपने राजनयिक और आर्थिक प्रभाव में वृद्धि की है । हालांकि चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि सभी तीन देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, पर नेपाली अधिकारियों ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है ।

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इस साल मार्च तक, १३८ देश चीनी बेल्ट एंड रोड अवधारणा में शामिल हो गए हैं, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में बड़े पैमाने पर विकास के बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है । बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत चीन ने नेपाल को उसमें शामिल होने का न्योता दिया और उसके लिए रेल से लेकर सड़क मार्ग तक बनाने की पेशकश की । नेपाल उसमें शामिल हो गया । अब तिब्बत से लेकर उत्तर प्रदेश से सटे नेपाल की सीमा के अंदर कुछ किलोमीटर दूर तक की रेल लाइन की योजना तैयार है । इसी तरह तिब्बत के ल्हासा से लेकर बिल्कुल भारतीय सीमा के पास तक सड़क बनाने की योजना है ।

ये दोनों परियोजनाएँ नेपाल को मुफÞ्त में नहीं मिलने जा रही हैं, जैसे चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इसलामाबाद को मुफÞ्त में नहीं मिल रहा है । इन दोनों परियोजनाओं से नेपाल पर जो आर्थिक बोझ पड़ेगा वह उससे कभी बाहर नहीं निकल पाएगा । जैसे चीन ने श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह ८ अरब डॉलर में तैयार किया और पैसे न होने पर कोलंबो ने उसे वह बंदरगाह ९९ साल के लीज पर दे दिया, वैसा ही कुछ नेपाल को भी करना पड़ सकता है । क्योंकि आज का समय और भी बदतर होने जा रहा है ।

अब एक साधारण सी बात जो सामयिक है नेपाल के लिए वह है फिलहाल कोरोना से निबटना । और हम सभी जान रहे हैं कि देश इस बीमारी से निबटने के लिए असक्षम साबित हो रहा है क्योंकि ना तो संसाधन हैं ना ही उचित व्यवस्था और उस पर दिन प्रतिदिन कोरोना के बढ़ते आँकड़े । जनता बेरोजगार है, व्यापार–व्यवस्था ठप, दुकानें या तो बंद हैं या खाली किए जा रहे हैं । भूखों मरने की नौबत है । शिक्षण संस्थान बंद, होटल व्यवसाय बंद, बड़ी–बड़ी दुकानें बंद । सरकार के पास इससे निबटने की कोई योजना नहीं है । वह बस ऐन–केन–प्रकारेण लॉकडाउन के भरोसे इस विपदा से निबटना चाह रही है, भले ही जनता बीमारी से मरे या भूख से । ऐसे में चीन पिछले समय में मंहगे दामों में अपने उपकरण बेचकर जिस सहायता की दावा कर रहा है, क्या उसे सहायता का नाम दिया जा सकता है ? सीधी सी बात है कि सहायता प्रस्ताव के नाम पर इस वर्चुअल कार्यक्रम के द्वारा वो अपनी महत्तवाकांक्षी योजना की याद दिला रहा था ।

वैसे इस विषय पर विदेशी मामलों के विशेषज्ञों ने इस बैठक की विषय वस्तु और चीन की तीन दक्षिण एशियाई देशों के साथ ‘उप–क्षेत्रीय स्तर पर’ संयुक्त वार्ता के समय में दिलचस्पी दिखाया है । नेपाल अंतर्राष्ट्रीय और सामरिक अध्ययन संस्थान के निदेशक भास्कर कोइराला कहते हैं, ‘वर्तमान में चीन कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है । संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध तेज हो गया है । हांगकांग में भी समस्याएं हैं । ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत सहित देशों के साथ चीन का तनाव दिख रहा है । इस बिंदु पर, यह समझ में आता है कि चीन ऐसे बैठक के माध्यम से दक्षिण एशिया में अपना समर्थन दिखाने की कोशिश कर रहा है ।’

उन्होंने कहा, ‘चीन ने २००६ के बाद से दक्षिण एशियाई देशों के साथ इस तरह की सामूहिक चर्चा नहीं की है । प्रारंभिक चर्चा में दीर्घकालिक और रणनीतिक परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया था । परन्तु वर्तमान में, भारत और चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं । ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि चीन ने इस तरह के सहयोग का प्रस्ताव किस रूप में किया है ?’

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देखा जाय तो यह लगता है कि चीन अपने इस तरह के प्रयास से विश्व के समक्ष अपनी मजबूत स्थिति दर्शाना चाहता है । ऐसे बैठक का दायरा सिर्फ महामारी नियंत्रण तक मानना गलत होगा । क्योंकि कोविड १९ के कारण चीन की विश्वसनीयता पर पूरा विश्व सवाल कर रहा है । यहाँ तक कि इसे जैविक हथियार के रूप में देखा जा रहा है । चीन का पड़ोसी देशों के साथ एक शीतयुद्ध शुरू है और इसलिए यह मान सकते हैं कि चीन ऐसी बैठकों को कर के विश्व के समक्ष अपने पक्ष वाले देशों को रखना चाहता है या गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है । इस स्थिति में यह आवश्यक है कि नेपाल अपनी विदेश नीति को खंगाले और उसकी समीक्षा करे । नेपाल अमेरिका और भारत की अवहेलना कर के क्या खुलकर चीन का साथ देना चाहेगा, या एक संतुलित विदेश नीति के साथ बढ़ा चाहेगा ? वर्तमान सरकार की जो नीति सामने आ रही है उससे आज नेपाल एक अजीबोगरीब स्थिति में दिख रहा है ।

बहुत से विज्ञों का मानना है कि नेपाल एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए आज उसे यह चुनना होगा कि लोकतांत्रिक विचारधारा वाले देशों के साथ गठबंधन करना अधिक फायदेमंद होगा या चीन के साथ संबंधों का विस्तार करना अधिक फायदेमंद होगा । अब समय आ गया है कि नेपाल अपनी विदेश नीति की व्याख्या फिर से करे । जिस तरह भारत से सीमा विवाद है, उसी तरह से चीन के साथ भी विवाद है । किन्तु यहाँ सरकार का मौन पक्षपातपूर्ण दिखता है और इसका असर नेपाल भारत के सम्बन्धों पर पड़ रहा है । इस अवस्था में आवश्यक है कि नेपाल की विदेश नीति को स्पष्ट किया जाय । यह माना गया है कि अगर छोटे राष्ट्र के साथ किसी बडेÞ और शक्तिशाली राष्ट्र का साथ हो तो वह स्वयं बलशाली हो जाता है तो क्या नेपाल इसी नीति के साथ चीन के संग खड़ा है ? क्या सचमुच नेपाल को किसी अन्य देश के सहयोग की आवश्यकता नहीं है ?

चीन के साथ खुले तौर पर आना या तटस्थ रहना, नेपाल को अपनी विदेशनीति स्पष्ट करनी ही होगी । वैसे भारत पोषित परियोजनाओं पर १७ अगस्त को होने वाली बैठक को लेकर विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली का एक वक्तव्य आया है कि, ‘कुछ वक्त के लिए सीमा विवाद का मसला अलग किया जा सकता है, किंतु देर सबेर हमें इसका हल निकालना होगा । एक मुद्दे पर मतभेदों की छाया हमारे सभी आपसी मसलों पर नहीं पड़नी चाहिए । हमें आगे बढ़ना चाहिए । हम रचनात्मक संबंधों में विश्वास करते है और आगामी बैठक इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक कदम है । सीमा विवाद को लेकर हम अपने सभी संबंधों को बंधक बनाकर नहीं रख सकते हैं । हमें इस बात का विश्वास है कि भारत के साथ हमारी दोस्ती सही दिशा में आगे बढ़ेगी ।’ एक सकारात्मक सोच को जाहिर करता यह कथन बताता है कि हमारे लिए एक ही पड़ोसी नहीं बल्कि दूसरा पड़ोसी भी मायने रखता है । ऐसे में सरकार को अपनी तल्खी वाली नीति को मुलायम करना ही देश हित में है । वहीं भारत को भी नेपाल को विश्वास में लेकर अपनी नीति का निर्धारण करना होगा और सदियों के रिश्ते को एक नई उम्मीद देनी होगी ।

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