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भावी सभापति के लिए दौड़ “निधी के लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ : लीलानाथ गौतम

 

 

हिमालिनी  अंक अगस्त 2020 । सत्ताधारी नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) हो या प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस, दोनों दल में भावी पार्टी नेतृत्व संबंधी विषयों को लेकर गरमा–गरम बहस शुरु होने लगी है । कोरोना वायरस (कोविड–१९) के कारण असहज परिस्थिति होते हुए भी दोनों दलों के शीर्ष नेता से लेकर कार्यकर्ता समूह तक मुलाकात और बैठक आयोजित होती आ रही हैं । सत्ताधारी दल नेकपा सरकार संचालन संबंधी आन्तरिक विवाद में भी फंसा हुआ है, लेकिन प्रमुख प्रतिपक्षी दल कांग्रेस को इसमें खास दिलचस्पी नहीं है ।

हां, नेपाली कांग्रेस पार्टी ने आगामी फाल्गुन १०–१४ गते के लिए काठमांडू में पार्टी की १४वें महाधिवेशन आयोजन करने की घोषणा की है । महाधिवेशन के लिए क्रियाशील सदस्यता वितरण से लेकर कई संगठनात्मक काम बांकी है, उसे देख कर नहीं लगता कि कांग्रेस घोषित तिथि में ही महाधिवेशन कर पाएगी । लेकिन नेता से लेकर कार्यकर्ता तक महाधिवेशन केन्द्रीत विचार–विमर्श में जुट गए हैं ।

कांग्रेस में भावी नेतृत्व हथियाने के लिए इच्छुक बहुत सारे नेता सामने आ चुके हैं । उसमें अधिक चर्चा में हैं– वर्तमान सभापति शेरबहादुर देउवा, वरिष्ठ नेता रामचन्द्र पौडेल, पार्टी महामन्त्री डा । शशांक कोइराला, प्रकाशमान सिंह, कृष्णप्रसाद सिटौला और विमलेन्द्र निधी । इसके अलवा शेखर कोइराला, डा । रामशरण महत, गगन थापा, सुजाता कोइराला जैसे नेताओं की लिस्ट भी है, जो आगामी महाधिवेशन में खुद को सभापति के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, लेकिन यह नाम ऊपर उल्लेखित अन्य नेताओं की तुलना में कम चर्चा में हैं ।
भावी सभापति के लिए दावेदारी प्रस्तुत कर खुद को प्रचारित करनेवाले लगभग एक दर्जन नेताओं की लिस्ट है । लेकिन आज के दिन जितने भी नेता हो, उसमें से मुख्यतः दो समूह अर्थात् गुटों के बीच ही तीव्र प्रतिस्पर्धा होनेवाली है । उसमें से एक है– वर्तमान सभापति देउवा समूह और दूसरे है– वरिष्ठ नेता पौडेल समूह । इसके साथ–साथ तीसरे समूह भी है, जिसका नेतृत्व कृष्णप्रसाद सिटौला कर रहे हैं । लेकिन यह समूह कमजोर होने के कारण ज्यादा चर्चा नहीं है । खुद को भावी सभापति के रूप में दावेदारी प्रस्तुत करनेवाले जितने भी नेता हैं, वे सब यही तीन समूह के प्रतिनिधी हैं । एक अनुमान भी है कि देउवा, पौडेल और सिटौला समूहों में से जो भी दो समूह इकठ्ठा हो जाएंगे, वही समूह कांग्रेस के भावी नेतृत्व में बाजी मारनेवाले हैं ।

छोड़ने की मनःस्थिति में नहीं हैं देउवा
नेपाली कांग्रेस के भीतर जो पार्टी सभापति देउवा के नियन्त्रण में नहीं हैं, वे लोग लम्बे समय से कहते आ रहे हैं कि अब नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में पुस्तान्तरण होना चाहिए । उन लोगों का यह भी मानना है कि अब देउवा के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी आगे बढ़नेवाली नहीं है और भी कमजोर होनेवाली है । लेकिन सभापति देउवा इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और वह पुनः सभापति बनना चाहते हैं । इसके लिए उन्होंने भरपूर प्रयास जारी भी रखा है ।

एक स्मरणीय बात तो यह भी है कि देउवा समूह में जो भी नेता हैं, असंतुष्ट होते हुए भी वे लोग खुलकर देउवा के विरुद्ध बोलने की हिम्मत नहीं रखते हैं । अर्थात् देउवा समूह से देउवा के विकल्प में खुद को प्रस्तुत करनेवाले नेता नहीं दिखाई दे रहे हैं । हां, उनके ही समूह में रहे नेता तथा उप–सभापति विमलेन्द्र निधि खुद को भावी सभापति के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, लेकिन देउवा के सामने खुलकर दावी प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं । नेता निधि चाहते हैं कि स्वयम् सभापति देउवा की ओर से ही उनका नाम प्रस्तावित हो जाए । लेकिन देउवा खुद सभापति पद का आकांक्षी होने के कारण तत्काल यह संभव नहीं दिखाई दे रहा है ।

इसीलिए कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि पिछली बार उप–सभापति निधी सभापति देउवा से असन्तुष्ट हैं और देउवा विरोधी समूह को इकठ्ठा कर निरन्तर संपर्क में रह रहे हैं और खुद को सभापति के उम्मीदार के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं । बताया जाता है कि राजनीतिक वृत्त में पिछली बार चर्चा में रहे देश का नयां नक्शा और नागरिकता संबंधी मुद्दा में पार्टी लाइन को लेकर नेता निधि पार्टी सभापति देउवा से असंतुष्ट हैं । कहा जाता है कि इतना होते हुए भी सभापति देउवा, नेता निधि को पुनः उप–सभापति में ही चुनावी प्रतिस्पर्धा में उतरने के लिए प्रेरित कर रहे हैं ।

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इसतरह सभापति देउवा माहौल अपने पक्ष में बनाने के लिए क्रियाशील हैं । वर्तमान अवस्था में देउवा के पक्ष में लगभग ४० प्रतिशत महाधिवेशन प्रतिनिधी हैं, उसको ५१ प्रतिशत बनाने के लिए देउवा भरपूर प्रयासरत हैं । इसके लिए विरोधी समूह में रहे कोई भी सशक्त नेता को अपने समूह में लाने का प्रयास भी देउवा कर रहे हैं । वर्तमान अवस्था में देउवा की नजर पौडेल समूह में रहे पार्टी महामन्त्री शशांक कोइराला और सिटौला समूह में रहे गगन थापा पर है । अगर उन लोगों को अपने समूह में लाना संभव नहीं हुआ तो तीन और चार समूह के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा कर दूसरे चरण में चुनाव को प्रवेश करना ही देउवा का उद्देश्य है । उसके बाद पहली चरण में हारनेवाले समूह को अपने समूह में मिलाकर दूसरे चरण का चुनाव लड़कर भी देउवा खुद सभापति बनने की तैयारी में हैं । स्मरणीय है, इससे पहले १३वें महाधिवेशन में भी देउवा ने ऐसा ही किया था ।

पार्टी सभापति बनने के लिए देउवा की दूसरी रणनीति भी है । वह है– अन्य पार्टी से नेपाली कांग्रेस प्रवेश करनेवालों को पार्टी में उच्च स्थान देना । केन्द्रीय सदस्य से लेकर क्रियाशील सदस्य तक अपने पक्षधर को वितरण कर महाधिवेशन प्रतिनिधि में बहुमत हासिल करने की कोशीश जारी है । लेकिन इसमें पौडेल समूह का अवरोध भी सामना करना पड़ रहा है ।

निधी के लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’
वैसे तो पार्टी उप–सभापति विमलेन्द्र निधि देउवा समूह के ही एक सशक्त नेता हैं । देउवा समूह में से देउवा के अलावा दूसरा कोई सभापति के दावेदारी प्रस्तुत करते हैं तो पहले नम्बर पर नेता निधि का ही नाम आता है । इसीलिए १४वें महाधिवेशन मार्फत सभापति होने का सपना देखना नेता निधि के लिए स्वाभाविक है । लेकिन इसके लिए बाधक बन रहे हैं– खुद वर्तमान सभापति शेरबहादुर देउवा । तब भी नेता निधि ने खुद को भावी सभापति के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रचार–प्रसार शुरु कर दिया है । नेता निधि ने ठान लिया है कि अभी नहीं तो कभी नहीं । यही मानसिकता के साथ नेता निधि ने अपने निकट और देउवा समूह के भीतर उनके विरुद्ध में रहे नेताओं से संपर्क बढ़ाना शुरु किया है । कहा जाता है कि देउवा समूह में ही रहे कुछ नेता भी नेता निधि को भावी सभापति के रूप में आगे बढ़ाने के लिए इच्छुक हैं । लेकिन इसके लिए सभापति देउवा सकारात्मक ना होने के कारण माहौल नहीं बन रहा है ।

बताया जाता है कि निधि के पक्ष में रहे कुछ नेताओं ने सभापति देउवा को सुझाव भी दिया है कि भावी सभापति में निधि और उप–सभापति में देउवा–पत्नी आरजु राणा को आगे बढ़ाया जाए । लेकिन देउवा–पत्नी राणा के नाम में देउवा समूह में ही सहमति होने की संभावना कम है । कार्यकर्ता तह में भी देउवा–पत्नी राणा के संबंध में सकारात्मक मानसिकता नहीं है । जिसके चलते निधि के पक्ष में रहे देउवा समूह के नेता खुलकर बाहर नहीं आ रहे हैं । अगर देउवा सकारात्मक होते हैं तो निधि को भावी सभापति के दावेदार होना निश्चित है । क्योंकि निधि को सभापति बनने के लिए देउवा का समर्थन अनिवार्य है । लेकिन तत्काल यह संभावना नहीं दिखाई दे रही है ।

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पौडेल समूह में आकांक्षियों की भीड़
वर्तमान सभापति देउवा के अलावा कांग्रेस के भीतर दूसरे सशक्त समूह है, उसका नेतृत्व वर्तमान में वरिष्ठ नेता रामचन्द्र पौडेल कर रहे हैं । पौडेल वही नेता है, जो इससे पहले १३वें महाधिवेशन में देउवा से पराजित हो गए थे । नेपाली कांग्रेस में भावी सभापति के रूप में खुद को प्रस्तुत करनेवाले अधिकांश नेता भी रामचन्द्र पौडेल समूह के ही हैं । नेता पौडेल खुद भी अपने को भावी सभापति के रूप में दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं । लेकिन आज उनके ही समूह में उनके पक्ष में बोलनेवाले नेता कम हैं । इसीलिए १३वें महाधिवेशन में पौडेल को साथ देनेवाले अधिकांश नेता पौडेल को नहीं, किसी दूसरे को भावी सभापति के रूप में आगे लाना चाहते हैं । यही कारण पौडेल समूह से डॉ. शशांक कोइराला, प्रकाशमान सिंह, डा । रामशरण महत, शेखर कोइराला, सुजाता कोइराला जैसे व्यक्तियों ने खुद को भावी सभापति के रूप में प्रचार शुरु किया है । अर्थात् नेता पौडेल जिन नेताओं को अपने पक्षधर मानते हैं, वे लोग खुद पौडेल के विकल्प में अपने को प्रस्तुत कर रहे हैं । नेता प्रकाशनमान सिंह ने तो यहां तक कहा है कि अगर हमारे समूह से पौडेल जी सभापति के उम्मीदवार नहीं बनेंगे तो एक मात्र विकल्प मैं ही हूँ । यही मानसिकता अन्य अकांक्षियों में भी है ।

नेता पौडेल के अति विश्वासयोग्य पात्र हैं– डा । रामशरण महत और अर्जुनरसिंह केसी । वे लोग अभी तक पौडेल को ही भावी सभापति के रूप में प्रचार कर रहे हैं । लेकिन अगर पौडेल खुद पीछे हटेंगे तो डा । रामशरण महत प्रमुख दावेदारी प्रस्तुत करनेवाले हैं । डा । महत का मानना है कि पार्टी के भीतर देउवा और पौडेल के बाद वही उत्तराधिकारी और पुराने नेता हैं ।
इधर पौडेल समूह के रूप में परिचित नेता डा । शशांक कोइराला ने पौडेल के विकल्प में खुद को प्रस्तुत करते हुए प्रचार अभियान ही शुरु किया हैं । इसी बीच में शेखर कोइराला को लेकर चर्चा करनेवाले भी कम नहीं हैं । उन लोगों का मानना है कि कांग्रेस को पुस्तान्तरण कर परिवर्तन करना है तो शेखर कोइराला को भावी सभापति के रूप में आगे लाना चाहिए । पिछली बार नेता शेखर की सक्रियता अन्य नेताओं की तुलना में अधिक भी है । पार्टी केन्द्रीय सदस्यों में से सबसे अधिक जिला भ्रमण करनेवाले और पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देनेवाले नेता शेखर ही हैं । लेकिन अनुमान है कि अगर डा । शशांक सभापति के उम्मीदवार बनेंगे तो शेखर उनको ही सहयोग करेंगे ।

कमजोर सिटौला समूह
नेपाली कांग्रेस की १३वें महाधिवेशन में दो सशक्त समूह (देउवा और पौडल) के बीच में एक तीसरा समूह भी था । उसका नेतृत्व कर रहे थे– कृष्णप्रसाद सिटौला । उस समय सिटौला समूह की चर्चा इसलिए भी हो रही थी कि इसी समूह से युवा वर्ग में चर्चित नेता गगन थापा पार्टी महामन्त्री पद के प्रतिस्पर्धी थे । लेकिन सिटौला और थापा दोनों को भारी मत से पराजित होना पड़ा । आज भी सिटौला समूह पार्टी में क्रियाशील है । देउवा और पौडेल समूह के बीच जारी राजनीतिक बहस में यह समूह भी अपना उपस्थिति प्रस्तुत करती आ रही है । कांग्रेस के भीतर आज भी चर्चा है कि आगामी महाधिवेशन में सिटौला समूह भी अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती है । लेकिन यह समूह अन्य दो समूहों की तुलना में कमजोर है ।

चर्चा है कि कमजोर होते हुए भी सिटौला इस बार भी पार्टी सभापति में उम्मीदवारी देने की तैयारी में हैं । लेकिन सिटौला समूह से ही दूसरे पात्र भी चर्चा में हैं, वह हैं– गगन थापा । हां, सिटौला समूह में रहे कुछ लोगों ने थापा को भावी पार्टी सभापति के उम्मीदवार के रुप में चर्चा में लाए हैं । लेकिन सिटौला खुद भावी सभापति के रूप में प्रस्तुत होते हुए प्रचार अभियान में शरीक होने के कारण थापा की संभावना कम है । एक स्मरणीय बात यह भी है कि सिटौला के पास पहले जो नेता थे, आज वे लोग नहीं है । आरोप है कि सिटौला अपनी गुट कायम रखने में असफल हो गए हैं, इसीलिए अब सिटौला को पीछे हटना होगा । इसी बीच में उनके ही समूह में रहे नेता गगन थापा ने युवा नेताओं के समूह (रमेश लेखक, चन्द्र भण्डारी, प्रदीप पौडेल, सुरेन्द्र पाण्डे, कमला पन्त, गुरू घिमिरे, एनपी साउद जैसे १३ युवा नेता) द्वारा हाल में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि आप लोग सभापति के लिए दावेदारी प्रस्तुत कीजिए, नहीं तो मुझे सभापति के उम्मीदवारी में समर्थन कीजिए । खैर कमजोर समूह होने के कारण देउवा और पौडेल दोनों समूह की नजर इस समूह पर है । क्योंकि सिटौला समूह को जो अपने कब्जे में कर सकता है, महाधिवेशन में वही समूह बलशाली होने की संभावना है ।

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कोइराला परिवार की चर्चा
इसी बीच में ‘कोइराला परिवार में से भावी सभापति’ कहकर बहस करनेवालों का समूह भी कम नहीं है । विशेषतः कार्यकर्ता पंक्ति में यह समूह अधिक दिखाई देता है । एक समय लोगों में ऐसी मनःस्थिति भी थी, जिस समय लोग कहते थे– कांग्रेस का मतलब कोइराला परिवार और कोइराला परिवार का मतलब कांग्रेस । हां, सिर्फ नेपाली कांग्रेस के इतिहास में ही नहीं, नेपाली राजनीतिक इतिहास में ही स्व. मातृकाप्रसाद कोइराला, विश्वेश्वरप्रसाद (वीपी) कोइराला और गिरिजाप्रसाद कोइराला की भूमिका महत्वपूर्ण है । इसीलिए कई कांग्रेसीजन में आज तक इसका ‘ह्याङओभर’ बांकी है और वे लोग कहते हैं कि जब तक कोइराला परिवार से कांग्रेस सभापति नहीं बनेंगे, तब तक कांग्रेस पार्टी आगे बढ़नेवाली नहीं है । उन लोगों का स्पष्ट संकेत हैं– कांग्रेस के भावी सभापति शशांक कोइराला, शेखर कोइराला और सुजाता कोइराला में से एक होना जरूरी है ।
कांग्रेस राजनीति में क्रियाशील यह तीनों पात्र ऐतिहासिक पात्र मातृका, विश्वेश्वर तथा गिरिजाप्रसाद के ही पारिवारिक सदस्य हैं । कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ता में रहे इसतरह की मानसिकता को ‘कैश’ करने की कोशिश उल्लेखित तीन पात्रों ने नहीं किया, ऐसा नहीं है । कई बार प्रयास किया, लेकिन अभी तक वे लोग सफल नहीं हो रहे हैं । महाधिवेशन की चर्चा–परिचर्चा के बीच फिर एक बार ‘कोइराला परिवार से सभापति’ की चर्चा भी सुनने को मिल रही है । कहा जाता है कि शेखर कोइराला और सुजाता कोइराला इसी नारे को आगे बढ़ाने की मनःस्थिति में हैं । अगर रामचन्द्र पौडेल पीछे हटकर विकल्प में कोइराला खानदान को ही चयनित करते हैं तो यह भी असंभव हीं है ।

अन्त में
राजनीतिक पार्टी के अन्दर गुट–उपगुट निर्माण करना और आन्तरिक प्रजातन्त्र को मजबूत बनाने के लिए स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा करना अन्यथा नहीं है । लेकिन जब वही गुट और प्रतिस्पर्धा विधि और पद्धति को स्थापित करने के बजाए, व्यक्ति को स्थापित करने के लिए हो जाता है, तब प्रजातन्त्र ही कमजोर पड़ जाता है । स्मरणीय है कि नेपाली कांग्रेस, खुद अपने को एक मात्र प्रजातान्त्रिक पार्टी कहती है, लेकिन कई बार देखने को मिला है कि इसी पार्टी के भीतर सबसे अ–प्रजातान्त्रिक संस्कार है । प्रजातान्त्रिक मूल्य–मान्यता को स्थापित कर उसको देश और जनता की हित में प्रयोग करना है तो सबसे पहले नेपाली कांग्रेस के भीतर आन्तरिक प्रजातन्त्र को ही मजबूत करना है । आगामी महाधिवेशन इस काम के लिए कामयाब हो सके, तत्काल इतना ही कह सकते हैं ।

 

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