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हिमाचल की पांडव कालीन प्राचीन धरोहरों में से एक धार के शिव शंकर: (पांगणा मण्डी हि.प्र.)

 

राज शर्मा । मझांगण सड़क पर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धार गांव ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत संपन्न है। यहाँ पर नाथ जाति के लोग रहते हैं।धार और इसके उपगांव फणोग को मिलाकर 20 परिवारों की जनसंख्या 80 के करीब है।धार गांव में शिव का एक प्राचीन मंदिर है।संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर हिमेन्द्र बाली और डॉक्टर जगदीश शर्मा के अनुसार धार निवासी जयराम का कहना है कि उनके नाना अर्जुनु राम निहरी गांव के मकराहड गांव से यहां आकर रहने लगे।एक दिन वे खेत में  हल चला रहे थे तो हल की नोक एक शिला से टकराई।अर्जुनु राम ने मिट्टी हटाकर देखा तो वहां पर काले रंग का स्वंभू शिवलिंग प्रकट हुआ।अर्जुनु राम ने गांव वासियों  के सहयोग से इस शिवलिंग को वहीं स्थापित करके तुरत-फुरत मंदिर बना दिया।आज भी यह मंदिर साधारण सा ही है।जयराम का कहना है कि अभी हमारी शक्ति-सामर्थ्य नहीं है,जब होगी तब जन सहयोग प्राचीन शैली का मंदिर जरूर बनेगा। इस शिवलिंग के विषय में इतिहासकारों का मानना है कि यह शिवलिंग पांडव कालीन है।इसी मंदिर में भीमाकाली की मूर्ति  भी स्थापित है।दैनिक पूजा के साथ हर संक्रांति को विशेष पूजा का आयोजन होता है।जिसमें   शिव,विष्णु,इन्द्र,सूर्यदेव,भीमा काली को गंगाजल,दूध,दही,शहद और  शक्कर से “क्लै” लगती है।लालचंदन और कुंकुम के तिलक के साथ गुग्गुल धूप और राल धूप से पूजा होगी।नवरात्रि में नौ दिन तक जप-पाठ और भंडारा होता है। जिसमें फेगल,गलूहन,जनौल,शरचा,बेलर,थाची,महारल,फणोग,जशन सहित आस-पास के लोग शामिल होते हैं।हर संक्रांति को धार और फणोग गांव के नाथ समुदाय के लोग परंपरागत ढंग से मंदिर में श्री पूजा के बाद अपनी कोई न कोई  नई फसल के साथ साथ विषम संख्या में अखरोट के दाने,दाड़ु,गरी,मछुआरे सहित पंचमेवा,मौसमी फल-फूल,नैवेद्य शिव व अन्य देवी-देवताओं को अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।महाशिवरात्रि को “चंदो” लगता है। मंदिर के नाम से दो विश्वा जमीन भी है।मंदिर के पास ही सरकार की ओर से सराय भवन भी बना है।मंदिर की व्यवस्था के लिए गांव वासियों ने एक कमेटी बनाई है।इस कमेटी में  प्रधान तोताराम सहित ग्यारह व्यक्ति पदाधिकारी और सदस्य हैं।जयराम पुजारी और भीमाकाली के गूर तथा लीलाधर पंडित का कार्य करते हैं।अध्यापक बुद्धि सिंह और सुमित गुप्ता का कहना है कि इस क्षेत्र  में बिखरे पड़े अनेक प्राचीन मंदिरों की महत्ता को देखते हुए धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं  हैं।

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राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश

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