महात्मा गान्धीजी के प्रति श्रद्धाञ्जली स्व. हरिश्चन्द्र शाही
किताबों के पन्ने से
महात्मा गान्धीजी के प्रति श्रद्धाञ्जली
स्व. हरिश्चन्द्र शाही (वि.स.१९४८–२०३०)
१– भारत के प्राण ! महात्मा गान्धी ।
गारत के त्राण कर परतन्त्र भारत को ।
सिधारे हाय ! घोर संकट काल में !
तजफर, इस स्वतन्त्रता के बालक को ।।
२– स्वराज वृक्ष दृढ जमने भी न पाया,
विपत्ति चारों ओर मंडराने लगी ।
धीरता, दूर्दर्शिता के कारण,
प्रगति पथ से बाधायें टलने लगीं ।।
३– राष्ट्र के पिता ! पथ–प्रदर्शक आप थे
सन्मार्ग दिखाएगा, अब कौन हमें ?
स्वराज रुपी रत्न, जवाहर को सौंप
कर्तब्य पूर्ण कर, विश्राम लेने चले !
४– अहिंसा के सच्चे पुजारी आप थे ।
विश्व शान्ति के दिव्य प्रचारक आप थे ।।
सत्य के तो मानो प्रतीक ही आप थे ।
हिन्दू–मुस्लिम मेल की कुञ्जी आप थे ।।
५– धन्य ! कर्मवीर ! अहिंसा रुपी अस्त्र से,
लिया स्वराज आप ही ने, भारत में ।
दिखाया चमत्कार आत्मिक–बल का,
घोर हिंसात्मक स्वार्थमय जग में ।
६– मनुज जाति की निष्पक्ष सेवा करना,
जीवनका लक्ष और महान ब्रत था ।
अन्तिम सयमय तक, आदर्श कर्मयोगी !
सदा दृढ ब्रत पालन, आप ने किया था ।
७– निष्काम कर्म–योग की उत्तम शिक्षा,
आप सदृश कर्मयोगी ने हमें दी है ।
अमूल्य स्वराज–फल, हम सब को खिलाया ।
किन्तु अर्जित फल स्वयं अपने न खाया है ।।
८– श्रेष्ठ कर्म करने से नरलोक में,
नर से नारायण भी बनते हैं ।
कुकर्म करने से ही धराधाम में,
नर से हाय ! नराधम भी बनते हैं ।।
९–जग में अजर–अमर हुआ नाम जिसका,
मरकर भी वह नरश्रेष्ठ मरता नहीं ।
दुर्लभ मानव तन पाकर क्या हुआ ?
जो स्वदेश और परहित मरता नहीं ।।




एक नेपाली द्वारा रचित यह एक अच्छी कविता है बापू के नाम । लकिन प्रस्तुति की असावधानी साफ दिखाई पड् रहा है । कृपया बापू के सम्मान और कविता का सदुपयोग हेतु इस काे फिर आकर्षक प्रस्तुति के साथ पेश करें ।