“स्वाधीन मधेश जन-अभियान” है “स्वावलंबी राष्ट्र का पहरेदार” : कैलाश महतो
कैलाश महतो नवलपरासी | “स्वाधीन” का अर्थ “स्वावलंबी”, “समन्वित” व “स्वतंत्र” है । यह स्वराज का पर्यायवाची शब्द भी है । मगर स्वराज स्थापित करने ले लिए अपनी शासन/स्वशासन की आवश्यकता होती है । मधेश विगत सात दशक से नेपाल के भितर अपना स्वराज, स्वशासन और autonomous state के लिए संघर्षशील रहा है । मगर दु:ख की बात यह रही है कि मधेश ने जब भी इसकी आवाज उठाई, जबरन उसे अनेक आरोपों से नवाजते हुए नेपाली शासन ने दवाने के काम किये । राज्य ने मधेश आन्दोलन को बदनाम करने के प्रपंच रचे और मधेशी नेताओं राज्य के चक्रव्यूहों में फंसते गये । परिणाम यह हुआ कि मधेश की सारी विरासत ही नेपाली उपनिवेश का गुलाम हो गया ।
मधेश के गाँव, कस्बे, शहर, बाजार, चाय और पान की दुकानें व चौक चौराहों पर एक तरफ मधेश के राजनीति करने बाले लोग उन उपायों के जुगाड़ में नजर आते हैं कि किसी कार्यालय में उनकी पहुँच कैसे हो, किसी मन्त्रालय, विकास परियोजना व आर्थिक क्षेत्रों से उनकी लगाव कैसे बन पाये, उसकी ही उन्हें चिन्ता रहती हैं तो दूसरी तरफ मधेशी जन समान्य उन्हें देखकर उन्हें गालियां दे रहे होते हैं, उन पर चुटकियां कस रहे होते हैं और उनकी शिकायत करने में लिप्त दिखाई देते हैं । मधेशी नेता मधेशी जनता की शिकायत में दिखते हैं कि उन्होंने उन्हें और उनके पार्टी को भोट नहीं दी तो मधेशी जनता भी यह कहने में पीछे नहीं कि मधेशी दलों को भोट क्यों दें जो राज्य के हाथों बिक जाते हैं । मधेश में सबसे ज्यादा चर्चा स्वतंत्र मधेश गठबंधन की राज्य के साथ चुपके से किये गये सहमति की है । मधेशी जनता यह कहने में पूरा ताकत लगा देती है कि मधेश का अन्तिम विकल्प के रुप में रहे स्वतंत्र मधेश गठबंधन जब अपने लक्ष्य से भटक गया तो बांकी के सबको तो देखा ही जा चुका है । मधेश अब कुछ नहीं कर पायेगा । मधेशी जनता किस पर भरोसा करें, आदि इत्यादि ।
दिखने और सुनने में दोनों समूह सच ही लगते हैं । मगर क्या दोनों सत् प्रतिशत सच है ? दोनों के एक दूसरे पर लगाये जाने बाले आरोप जितने सत्य है, वास्तव में वे असत्य भी उतने ही बडे पैमाने पर है ।
कुछ लोग यह सुझाव देने में अपनी सफलता मानते हैं कि सारे मधेशी पार्टियाँ एक हो जायें । मधेश का यह बडा विचित्र गणित है कि सारे मधेशवादी पार्टियों के एकता से मधेश की बेडा पार हो जायेगी । यह बिल्कुल बेबुनियादी और अवैज्ञानिक चिन्तन है कि मधेश की समस्याएं खत्म हो जायेंगी जब मधेश में सिर्फ एक ही पार्टी होंगी । मधेश की यह महज एक भावनात्मक चाहत है जो मधेशी जनता देखना चाहती है । मगर यह संभव इसलिए भी नहीं है कि मधेशी जनता अपने धरातल को जल्द भूल जाती है । दूसरा धरातलीय सत्य यह भी है कि एक ही पार्टी मधेश के सारे विचारों व आकांक्षियों की सारी समस्याएं समाधान नहीं कर सकती । लेकिन साझा आवश्यक मुद्दों पर मोर्चाबन्दी, गठबंधन, सहकार्य या एकता भी किये जा सकते हैं ।
मधेश में एक ही मधेशी पार्टी चाहिए थी, और तब मधेशी जनता मधेशी दलको खुलकर भोट देती तो प्रजातन्त्र के गर्मागर्म अवस्था में मधेश में एक मात्र सदभावना पार्टी थी । क्यों मधेशियों की भोट सदभावना को नहीं मिली ? मधेशियों के लिए जीवन कुर्बान करने बाले सदभाना के राष्ट्रिय अध्यक्ष स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह को ही चुनाव बार बार क्यों हारने पडे ? २०६३-६४ के मधेश जन विद्रोह तत्कालिन मधेशी जन अधिकार फोरम के नेतृत्व में हुआ था । मधेश के घर घर से आन्दोन में लोग भाग लिए थे । लग तो ऐसा रहा था जैसे मधेश का भोट फोरम और मधेशी दलों को छोडकर कहीं नहीं जायेगा । मगर नेपाल के जनसंख्या के अनुपात में मधेशियों ने मधेशी सारे दलों को मिलाकर भी १२% मत भी नहीं दे पाये । ६-६ माह की आन्दोलनें हुईं । लोगों ने खुब बढचढ कर जहाँ एक तरफ आन्दोलन किये, सैकडों ने शहादतें दीं, वहीं दूसरे ओर आन्दोलनरत नेताओं ने ही रातों रात तस्करी की, उनके ही लोगों ने आन्दोलन को बेचने के काम किये ।
मधेश के गलियों में लोगों से मिलें तो ३०-३२ वर्ष के मधेशी कुछ यूवाओं का कथन होगा कि कितना लडा जाय । लडते लडते जैसे उसने उम्र खो दिया हो । २५-३० वर्ष के यूवा भी मरे पडे लास के समान दिखते हैं । बात ऐसे करेंगे जैसे उसके जैसे जानकार और विश्लेषक इस शदी में धरती पर पैदा होना संभव ही नहीं है । ३०-३५ के उम्र में ही वे ८५ वर्षों की तजुर्बा बाली बात करेंगे । मगर हकिकत खुलने पर पता यह चलता है कि मधेश आन्दोलन के समय या तो वे आन्दोलनकारियों को गाली और असहयोग करते रहें या राज्य से मिलकर आन्दोलन को बदनाम और कमजोर करने के उपाय निकालते रहें । वे कभी मधेश आन्दोलन में आये भी नहीं । आन्दोलन सफल हो गये तो सबसे आगे के पंक्ति में और असफल रहे तो गैर मधेशी पंक्तियों के साथ रहने में ही अपनी सुरक्षा मानते रहें । उस तप्के के लोग सबसे ज्यादा क्रान्तिकारी बात करेंगे । मधेशी नेताओं को गाली देंगे ।
मगर जनता केवल जनता होती है । जनता के पास अगर होश होती तो गाली के बदले वे कारण ढुंढती । उपाय निकालती । वे जनता है । राजनीतिक शास्त्र के अध्ययन को मानें तो जनता को “जन्तु” से उपर मानने से इंकार किया गया है । और सही कहा जाय तो यूनानी दार्शनिक अरिष्टोटल ने सही ही कहा है कि नागरिकता पाने और मतदान करने का अधिकार जनता जो नहीं देनी चाहिए । जनता श्रेणी के लोग न तो नागरिक होने के हैसियत को समझते हैं, न वे यह समझते हैं कि वे अपना मत किसको क्यों और किस आधार पर दे रहे हैं ।
मधेशी नेताओं ने नासमझी, बेइमानी और जल्दबाजी यह कर लिये कि आन्दोलनरत जनता को निर्वाचन के गट्टर में प्रतिकूल समय में ही डाल दिये । ऐसी गलती मधेश के केवल परम्परागत राजनैतिक नेताओं ने ही नहीं, अपितु ज्ञान विज्ञान के धुरन्धर आधुनिक अभियन्ताओं तक ने कर डाली । वे अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक सुख, सुविधा, संरक्षण और सुरक्षा के नाम पर मधेश के भोले भाले जनता को राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक, शैक्षिक, भाषिक, सांस्कृतिक और अवसरीय रुपों से असुरक्षित कर गये । समाज को बदलने चले मधेशी नेता समाज के मूढपन में ही अपने नेतृत्व को समाहित कर लिए । स्पष्टतः हम यह भी कह सकते हैं कि नेता समाज का उत्पादन बनकर रह गये । समाज को नेतृत्वदायी बनाने में मधेशी नेतृत्व बिल्कुल विफल रहा है ।
डा. सीके राउत के नेतृत्व में रहे “स्वतंत्र मधेश गठबंधन” के समय में लोगों में जो आशा, उर्जा, लगानी और हिम्मत थी, वे आज धरासायी हो चुके हैं । प्रायः लोग यह कहने से नहीं चुकते कि डा.राउत जैसे शख्स ने जब दम तोड दी तो बांकी का क्या भरोसा ? उनके इस तर्क से एक ओर मधेश में निराशा छा जाता है तो दूसरे तरफ हिम्मत करने बालों के नेतृत्व पर प्रश्न चिन्ह खडा हो रहा है । डा. राउत ने जहाँ तक अच्छा किया, वहाँ तक के कार्यों को प्रशंसा करने का संस्कार भी मधेश को सीखना बेहद जरुरी है । जरुरी नहीं कि डा.राउत ही सारे काम कर दें । कुछ तो हमारा और आप का भी जिम्मेवारी बनती है !
मगर एक बात से मधेश को वाकिफ होना बेहद जरुरी है कि विकासीय प्रयोजन समेत के लिए भी नेपाल के निर्वाचन प्रणाली से मधेश में कभी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन संभव नहीं हो सकता । राजनीतिक बदलाव तो असंभव ही रहेगा । संसार के राजनितिक बदलाव के इतिहसों को देखें तो चुनावों से राजनीतिक परिवर्तन कहीं भी संभव नहीं रहा है । स्पेन और स्कटल्ल्याण्ड जैसे पूर्ण शिक्षित समाज के लोगों ने भी चुनावी प्रक्रिया से आमूल परिवर्तन नहीं ला सकने के उदाहरण सामने हैं । स्पेन से क्याटेलोनिया के प्रदेश संसद ने ९०% के तुफानी बहुमत समेत से स्वतंत्र नहीं हो पाने का उदाहरण विश्व के सामने पडा है ।
नेपाल के सन्दर्भ में ही देखें तो चुनाव, संसद और मन्त्रिमण्डल वगैरह से न राणाओं का शासन खत्म हुआ, न तीस वर्षे पंचायत का कुछ बिगाड सके । संसदीय चुनावों से न तो प्रजातान्त्रिक कलहतन्त्र को झुकाया जा सका, न ज्ञानेन्द्रतन्त्र का कुछ हिलाया जा सका । संसद से न तो माओवादी नशे को तोडा जा सका, न संघीय प्रणाली का उद्भव हो सका । जो और जितने भी आमूल परिवर्तनें हुईं, सब सडक संघर्ष, जन विद्रोह, जन आन्दोलन और जन दवाब के ही बदौलत हुए हैं ।
“स्वाधीन मधेश जन-अभियान” नेपाल में पूर्ण प्रजातन्त्र की प्रत्याभूति के साथ नेपाल के समस्त वर्ग और समुदाय को राजनीति और राजसत्ता लगायत राज्य के समस्त अंग व निकायों में पहुँच निर्माण के लिए २०६३-६४ साल में मधेश द्वारा उठाये गये पूरा मधेश एक प्रदेश (या पूर्वी मधेश तथा पश्चिमी थरुहट प्रदेश), पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली, राष्ट्र (जनता) की स्वाधीनता (मुक्ति), स्वायत्तता, आत्मनिर्णय का अधिकार, राज्य के हरेक अंग, क्षेत्र और निकाय में पूर्ण समानुपातिक जनप्रतिनिधित्व की व्यवहारिक ग्यारेण्टियों के मांगों को अपना आधारभूत मुद्दे बनाकर सरकार से अपिल करेगी । जबतक मधेश के उपरोक्त मांगों को राज्य व्यवहारिक रुप से लागू नहीं करेगी, सरकार के हर चुनाव को मधेश विरोध और बहिष्कार करेगा ।

“स्वाधीन मधेश जन-अभियान” है “स्वावलंबी राष्ट्र का पहरेदार”।

