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मरने के बाद ही मिलता, उस आराम का क्या करें : जयप्रकाश अग्रवाल (चैनवाला)

 

*ज़िंदगी बवाल है या फिर सवाल है *

हो गये बदनाम पाकर जिसे, उस नाम का क्या करें
हर सुबह आ जाती हौले से, उस शाम का क्या करें

इस दुनिया में हर कोई, बनना चाहे केवल ख़ास,
गलियों में नकारा भटकता, उस आम का क्या करें

भागें पागलों की तरह, क़ब्ज़ा करने खुदाई पर,
जो ख़्वाहिशों के हाथों बिका, उस गुलाम का क्या करें

जनता तो सच में बेचारी है, क़िस्मत की मारी है,
झूठे वादों से बहलाये, उस निज़ाम का क्या करें

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मतलब बदल गये, तरीक़े भी बदल गये ज़िंदगी के,
हारता हूँ सब कुछ जिसे पा, उस इनाम का क्या करें

छूने को नयी ऊँचाइयाँ, रोज़ बनाते हैं जिसे-
न मुमकिन हो पहुँचना जहाँ, उस मुक़ाम का क्या करें

जी हुजूरी को मान कर , पैमाना कामयाबी का,
मजबूरी में दिखावा करें, उस सलाम का क्या करें

लड़ता रहा सारी उमर, बिना मतलब की बातों पर,
मरने के बाद ही मिलता, उस आराम का क्या करें

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लिखा न जाने कौन सी ज़ुबान में, न समझ सका मैं,
तुमने क्यों भेजा बता, ऐसे पैग़ाम का क्या करें?

जयप्रकाश अग्रवाल चैनवाला, काठमांडू ।

(नेपाल)

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