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राजधर्म बनाम शासन की विफलता: रविन तामाङ की आत्महत्या और उठते सवाल

 

(From Status of Rakesh mishra), काठमाडौं, १मई, ०२६। राज्य की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं होती, बल्कि प्रत्येक नागरिक की गरिमा, सुरक्षा और मानसिक स्थिति की रक्षा करना भी उसका दायित्व है। ऐसे में यदि राज्य की किसी कार्रवाई या चूक के कारण कोई नागरिक आत्महत्या करने को मजबूर हो जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि गंभीर नैतिक और राजनीतिक प्रश्न बन जाता है।

हाल ही में राजधानी में हुई एक घटना—जहाँ भारी सुरक्षा व्यवस्था की मौजूदगी के बावजूद रविन तामाङ ने आत्महत्या कर ली—ने शासन की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यह घटना उस समय हुई जब प्रशासन शीर्ष स्तर पर “सम्मानजनक व्यवस्थापन” की प्रतिबद्धता जता रहा था। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि आखिर इस विफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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इस संदर्भ में, सुबह ही बुद्ध जयंती की शुभकामनाएँ देने वाले काठमांडू महानगर के मेयर के लिए भी यह आत्ममंथन का विषय बनता है कि क्या शासन वास्तव में उन आदर्शों पर चल रहा है, जिनकी प्रेरणा ने दी थी।

बुद्ध ने अपने समय में राजाओं को “दस राजधर्म” का उपदेश दिया था, जो आज भी सुशासन की कसौटी माने जाते हैं:

  • दान (Dāna): जनता की भलाई के लिए उदारता
  • शील (Sīla): नैतिक आचरण और चरित्र
  • परित्याग (Pariccāga): निजी स्वार्थ का त्याग
  • आर्जव (Ājjava): ईमानदारी और निष्पक्षता
  • मृदुता (Maddava): विनम्रता और सौम्यता
  • तप (Tapa): संयम और सादगी
  • अक्रोध (Akkodha): क्रोध से मुक्त रहना
  • अविहिंसा (Avihiṃsā): अहिंसा और शांति
  • क्षान्ति (Khanti): धैर्य और सहनशीलता
  • अविरोध (Avirodhana): जनमत का सम्मान और न्यायप्रियता
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इन सिद्धांतों के आलोक में देखें तो यह घटना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि “राजधर्म” के पालन में आई कमी का संकेत भी देती है।

राज्य की शक्ति का असली परीक्षण संकट के क्षणों में होता है—जब उसे संवेदनशीलता, तत्परता और मानवीय दृष्टिकोण के साथ काम करना होता है। यदि सुरक्षा बलों की मौजूदगी में भी एक नागरिक—रविन तामाङ—की जान नहीं बचाई जा सकी, तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

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अब सवाल केवल घटना की जांच का नहीं, बल्कि उस व्यापक सोच का है जिसमें शासन नागरिक को “संख्या” नहीं, बल्कि “जीवित मानव” के रूप में देखे।
जिम्मेदारी तय करना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना—यही सच्चा “राजधर्म” होगा।

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