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सिर्फ नारी के कंधों पर इज्जत और मर्यादा की जिम्मेदारी ? – दिव्या तिवारी

 

शादी के बाद बेटी को पराया करने के बजाए क्यों हम ये नही समझते के वो अब दो घरों की बेटी है । दहेज के लिए कितनी की बेटियों ने आग की जलन को झेला है,

एक तरफ लोग तरक्की कर रहे हैं, लोगों की सोच बदल रही है, शहर की जन जीवन की तरफ बढ़ रहे हैं, जमाना बदल रहा है । क्या वाकई हर जगह जमाना बदल रहा है ? आज भी कई जगहो पर समाज में औरत को रत्न के बजाए बोझ समझा जाता है, नारी को इंसान ही समझ लिया जाए तो भी महान काम हो ।

अगर एक औरत के जन्म से देखना शुरू करें तो उसका समाज और जीवन के साथ द्वन्द गर्भ में आने के साथ ही शुरू हो जाता है । एक अजन्मी, अबोध और असहाय भ्रुण कन्या भी समाज के कुछ लोगों को प्रलय या तबाही से कम नही लगती, तभी तो उसे जन्म लेने की भी इज्जाजत नही मिलती । उस भ्रुण की हत्या का जिम्मेदार भले ही कोई पुरुष हो पर क्या ये उस माँ की जिम्मेदारी नहीं के वो अपनी बच्ची के लिए इस फैसले का विरोध करे । कई बार तो इस पाप के लिए सबसे ज्यादा आग एक औरत ही लगाती है, जो सिर्फ इसलिए अपने घर बेटी पैदा नही होने चाहती क्योंकि उसका वंश आगे नही बढ़ेगा । क्यों भूल जाते है लोग के वंश को आगे बढ़ाने के लिए जितनी जरूरत पुरुष की है उतनी ही औरत की भी ।

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जन्म के बाद भी ये द्वन्द खत्म नही होता बल्कि ये तो बस एक शुरुवात है । बेटी घर की इज्जत होती है इसलिए उसपर नाना प्रकार की पाबंदियां लगा दी जाती है मसलन घर के बाहर देर तक नही रहना, आगे की पढ़ाई के लिए किसी दूसरे जगह नही जाना, मोबाइल पÞmोन का कम इस्तेमाल करना, वगेरह वगेरह, बलात्कार, जैसे घिनौने अपराध का जिम्मेदार भले ही एक पुरुष हो पर क्या ये एक माँ की जिम्मेदारी नही के वो बचपन से ही अपने बेटे को स्त्री का सम्मान करना सिखाये । बेटे बेटी में जब भेदभाव करना बंद होगा तभी वो एक दूसरे का सम्मान करेंगे । तभी मर्द खुद को औरत से उपर नही समझेगा और न ही औरत खुद को मर्दों से कमजोर या कम ।
हाल ही दिल्ली में एक १२ साल की बच्ची के साथ आरोपियों ने जैसी हैवानियत दिखाई है, उसने ‘निर्भया’ हादसे की याद ताजा हो गई बच्ची के पूरे शरीर में चोट के गंभीर निशान हैं । उसके निजी अंगों में गहरे जख्म के साथ ही पेट में इंटस्टाइन जख्मी है । सिर और हिप्स की हड्डियों में फ्रैक्चर है । आरोपी ने कैंची से उस पर कई वार किए हैं ।

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पुलिस सूत्रों के अनुसार, मासूम बच्ची बेसुध होने तक आरोपियों से मुकाबला करती रही । अब बच्ची का इलाज एम्स में चला रहा है ।. आखिर कब सुधरेंगे ऐसे लोग और कई जगह आपको मानसिक तौर से प्रताडि़त किया जाता है क्या वो रेप नहीं कर रहे हैं ?

वो भी रेप है जब भी कोई भाई अपनी बहन पर, पति अपनी पत्नी पर, बेटा अपनी बहू पर बेवजह का पुरुषार्थ दिखाए तब औरत को इसका विरोध करना चाहिए ! शादी के बाद बेटी को पराया करने के बजाए क्यों हम ये नही समझते के वो अब दो घरों की बेटी है । दहेज के लिए कितनी की बेटियों ने आग की जलन को झेला है, आज दहेजÞ की खबरें आती हैं समाज का रोना रोने से क्या होगा । आखिर इस समाज की रचनाकार भी तो हम औरतें ही है । अगर हम बचपन से ही बेटी को सशक्त और स्वाभिमानी बनाए तो क्या मजाल किसी की के उसे कमजोर समझे । बेटी को पढ़ाएं, शिक्षित बनाए क्योंकि ज्ञान की जरूरत और अधिकार सबको है । ये सोच के जब नौकरी करनी ही नही तो पढ़कर क्या होगा, अब यहाँ सबसे बड़ा सवाल है कि आज के २१वीं सदी में भी ये बात कर रहे हम ..एक तरफ हमारे शास्त्रों और पुराणों में स्त्री को देवी माना जाता है लेकिन यहाँ पर अजादी के इतनें सालों बाद महिलाओं को उनके हक, सम्मान से वंचित रखा जाता है ।

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