कैसे हुआ देवी का जन्म ? नवदुर्गा से जुड़े 9 तथ्य ..: मनीषा मारू
पार्वती, शंकर से प्रश्न करती हैं कि “नवरात्र किसे कहते हैं!” शंकर उन्हें प्रेमपूर्वक समझाते हैं- नव शक्तिभि: संयुक्त नवरात्रं तदुच्यते, एकैक देव-देवेशि! नवधा परितिष्ठता। अर्थात् नवरात्र नवशक्तियों से संयुक्त है। इसकी प्रत्येक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है।
साल में चार नवरात्रि होती है। चार में दो गुप्त नवरात्रि और दो सामान्य होती है। सामान्य में पहली नवरात्रि चैत्र माह में आती है जबकि दूसरी अश्विन माह में आती है। चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी या शारदीय नवरात्रि कहते हैं। आषाढ और माघ मास में गुप्त नवरात्रि आती है।
कैसे हुआ देवी का जन्म? नवदुर्गा से जुड़े 9 तथ्य ..
नवरात्रि का महत्व तो सभी जानते हैं। हिंदू धर्म में दुर्गा की पूजा के लिए खास ये दिन बहुत ही शुभ होते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं देवी दुर्गा का जन्म कब हुआ था, उससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं और क्यों कन्या पूजा की जाती है?
नवरात्रि यानी वो 9 दिन जब शक्ति की पूजा की जाती है जिसे देवी के रूप में मान्यता दी गई है। वो शक्ति जिसे देवताओं के महिला रूपी अवतार में देखा जाता है. दुर्गा के जन्म से लेकर उनके युद्ध में विजय पाने तक शक्ति के अनेक रूपों के बारे में हिंदू शास्त्र बताते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस नवरात्रि में हम दुर्गा पूजा करते हैं उससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं, क्यों कन्या पूजा की जाती है, कैसे देवी का जन्म हुआ और क्यों दुर्गा की सवारी शेर है?
1. कैसे हुआ देवी का जन्म?
देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में ही माना जाता है जिसे राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए जन्म दिया गया था और यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं को भगा कर महिषासुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था तब सभी देवता मिलकर त्रिमूर्ती के पास गए थे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली।
इसीलिए दुर्गा को शक्ति भी कहा जाता है। दुर्गा की छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ थे। सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें शक्ति दी इसलिए वो सबसे ताकतवर भगवान मानी जाती हैं. उन्हें शिव का त्रिशूल मिला, विष्णु का चक्र, बह्मा का कमल, वायु देव से उन्हें नाक मिली, हिमावंत (पर्वतों के देवता) से कपड़े, धनुष और शेर मिला और ऐसे एक-एक कर शक्तियों से वो दुर्गा बनी और युद्ध के लिए तैयार हुईं।
2. आखिर पूजा 9 दिन ही क्यों की जाती है?
जब दुर्गा या देवी ने महिषासुर पर हमला किया और एक-एक कर दैत्यों को मारना शुरू किया तब भैंसे का रूप धारण करने वाले महिषासुर को मारने के लिए उन्हें 9 दिन लगे।इसलिए नवरात्रि को 9 दिन मनाया जाता है। इसलिए 9 दिन 9 अलग-अलग देवियों की पूजा की जाती है। हर दिन को अलग रंग से जोड़कर भी देखा जाता है।
3. क्यों है अष्ट भुजाओं वाली?
देवी दुर्गा को अष्ट भुजाओं वाली कहा जाता है।कुछ शास्त्रों में 10 भुजाओं वाला भी कहा जाता है। वास्तु शास्त्र में 8 अहम दिशाएं होती हैं, लेकिन कई जगहों पर 10 कोण या दिशाओं की बात की जाती है।इनमें हैं प्राची (पूर्व), प्रतीची (पश्चिम), उदीची (उत्तर), अवाचि (दक्षिण), ईशान (नॉर्थ ईस्ट), अग्निया (साउथ ईस्ट), नैऋत्य (साउथ वेस्ट), वायु (नॉर्थ वेस्ट), ऊर्ध्व (आकाश की ओर), अधरस्त (पाताल की ओर). कई जगह 8 दिशाएं ही मानी जाती हैं क्योंकि आकाश और पाताल की ओर को दिशा का दर्जा नहीं दिया जाता। हिंदू शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना गया है कि देवी दुर्गा हर दिशा से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और यही कारण है कि उनकी 8 भुजाएं हैं जो आठों दिशाओं में काम करती हैं।
4. शेर की सवारी ही क्यों?
देवी को शेर पर सवार बताया जाता है। दुर्गा का वाहन शेर है और इसे अतुल्य शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि शेर पर सवार होकर दुर्गा मां दुख और बुराई का अंत करती हैं।
5. दुर्गा को त्रयंबके क्यों कहा जाता है?
दुर्गा को त्रयंबके कहा जाता है यानी तीन आखों वाली। शिव भी त्रिनेत्र कहलाएं हैं जिनकी तीन आखें थी।दुर्गा को शिव का ही आधा रूप माना जाता है जिसे शक्ति भी कहा जाता है।दुर्गा की तीन आखें अग्नि, सूर्य और चंद्र का प्रतीक मानी जाती हैं.
6. दुर्गा की पूजा के लिए 108 मंत्रों का जाप क्यों होता है?
नवरात्रि को दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि भगवान राम ने मां दुर्गा की पूजा की थी जिन्हें राम ने महिषासुर मर्दिनी के नाम से ही संबोधित किया था।ये पूजा रावण से युद्ध करने के पूर्व की गई थी और इसीलिए दशहरा नवरात्रि के अंत में मनाया जाता है जिस दिन रावण का वध हुआ था। माना जाता है कि राम जी ने दुर्गा पूजा के वक्त 108 नीलकमल चढ़ाए थे दुर्गा को और इसलिए ही 108 को शुभ माना जाता है.
7. पितृपक्ष के अंत में नवरात्रि क्यों मनाई जाती है?
पितृपक्ष में पितृों की पूजा के बाद ऐसा माना जाता है कि घर की शुद्धी होती है और उसके बाद आता है देवी पक्ष यानी नवरात्रि और इसके बाद से हर तरह के त्योहारों की शुरुआत होती है।ऐसा माना जाता है कि देवी पक्ष के पहले दिन मां दुर्गा अपने बच्चों के साथ पृथ्वी की ओर यात्रा करना शुरू करती हैं।
8. क्यों ली जाती है तवायफ के घर की मिट्टी?
इस प्रथा से जुड़ी मान्यता ये है कि तवायफ के घर जाने से पहले एक पुरुष अपनी सारी अच्छाइयां और पवित्रता उसके आंगन में छोड़कर ही अंदर जाता है। और यही कारण है कि तवायफ के आंगन की मिट्टी बहुत पवित्र हो जाती है।इसी मिट्टी को मिलाकर दुर्गा की मूर्ति बनती है ।
9. कन्या पूजन या कुमारी पूजन क्यों होता है?
कन्याओं को देवी का रूप माना जाता है और उन्हें सबसे पवित्र माना जाता है जब तक उनकी महावारी शुरू नहीं होती।क्योंकि नवरात्रि को देवी यानी महिला रूप को पूजने के लिए मनाई जाती है इसीलिए इसे छोटी कन्याओं को इससे जोड़ा जाता है।
मां दुर्गा के 9 स्वरूपों का क्या है अर्थ और विशेषता…
दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं, जो सभी प्रकार की बुरी शक्तियों और बुरे विचारों से हमारी रक्षा करती हैं। दुर्गा शक्ति की उपस्थिति में नकारात्मक विचार और ताकत के अस्तित्व मिट जाते हैं। देवी को एक शेर या बाघ पर सवार दिखाया जाता है। यह संकेत है साहस और वीरता का, जो दुर्गा शक्ति का मूल तत्व है। नवदुर्गा यानी दुर्गा शक्ति के नौ रूप। जब हम सब जीवन में बाधाओं या बौद्धिक अवरोधों का सामना करते हैं, तो देवी के नौ रूप की विशेषताओं के स्मरण मात्र से सहायता प्राप्त होती है।
1. शक्ति का प्रवाह हैं शैलपुत्री
देवी के नामों के उच्चारण से हमारी चेतना जाग्रत होती है और मन केंद्रित होकर निर्भय और शांत होता है। शक्ति का प्रवाह (शैलपुत्री) नवदुर्गा में पहली देवी हैं शैलपुत्री। शैल यानी पत्थर। इस रूप को शैल शिखर भी कहा जाता है। शैलपुत्री पर्वत शिखर की बेटी हैं।
2. ब्रह्मचारिण: ब्रह्म का अर्थ है-अनंत और चर्य का अर्थ है चलना। यहां ब्रह्मचर्य का अर्थ हुआ अनंत में चलना। स्वयं को मात्र शरीर नहीं मानना चाहिए। हम अपनी विस्तृत प्रकृति को जानें और स्वयं को एक प्रकाश पुंज मानें। संसार में आप कुछ इस तरह चलें जैसे कि आप ही ब्रह्मांड हों। आप जितना खुश होंगे आपको अपनी काया का उतना ही कम एहसास होगा। देवी की विशेषताओं का आह्वान करने के लिए हमारी चेतना अनंत में विस्तार पाती है और अनंत में विचरण करने लगती है। उस स्थिति में आप बहुत जोश और साहस महसूस करेंगे। शक्ति के विशुद्ध रूप को दर्शाते हुए देवी को कुमारी के रूप में दिखाया गया है, जो स्वतंत्र व नवीन है और जो किसी के नियंत्रण में नहीं है।
3. चंद्रघंटा: विचारों और ध्वनियों की समग्रता
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। यह देवी घंटे के आकार का चंद्रमा धारण करती हैं। चंद्रमा का संबंध बुद्धि से है और घंटा सतर्कता का प्रतीक है। जिस प्रकार चंद्रमा घटता-बढ़ता है, उसी प्रकार मस्तिष्क भी अस्थिर रहता है। चेतना संघटित होने से मस्तिष्क एक स्थान पर केंद्रित हो जाता है और इससे ऊर्जा में वृद्धि होती है। जब सतर्कता की गुणवत्ता और दृढ़ता की वृद्धि होती है, तो मस्तिष्क आभूषण के समान हो जाता है।
वह यदि शांति और संवेदना में उपस्थित है, तो दुख, कष्ट, भूख आदि में भी उसका साथ बना रहेगा। इस
का सार यही है कि चाहे सुख मिले या दुख, हमें हर परिस्थिति को समान रूप से देखना चाहिए। यही चंद्रघंटा का अभिप्राय है।
4. कुष्मांडा: ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति की प्रतीक
कुष्मांडा अर्थात कुम्हड़ा अर्थात सीताफल, जो शक्ति से भरपूर सब्जी है। एक सीताफल में अनेक बीज होते हैं, जिनसे और भी कई सीताफ ल उत्पन्न हो सकते हैं। कुष्मांडा के रूप में देवी के भीतर समस्त सृजन समाया हुआ है। यह हमें उच्चतम प्राण प्रदान करती हैं, जो वृत्त के समान पूर्ण है।
प्रकट और अप्रकट दोनों ही सूक्ष्मतम से विशाल तक। कुष्मांडा में कु यानी छोटा और ष् यानी ऊर्जा। यह ब्रह्मांड ऊर्जा से व्याप्त है। एक छोटा-सा बीज पूरा फल बन जाता है और फिर फल बीज में बदल जाता है। हमारे भीतर की शक्ति की एक विशेषता है कि यह सूक्ष्म से सूक्ष्मतम और विशाल से विशालतम हो जाती है।
5. स्कंदमाता: ज्ञान और क्रियाशीलता का साथ
स्कंद या प्रभु सुब्रमण्यम की मां स्कंदमाता कहलाती हैं। गोद में बालक स्कंद को लिए माता को शेर पर सवार दर्शाया जाता है। इनका यह रूप साहस और करुणा का प्रतीक है। स्कंद अर्थात कुशल।
स्कंद भी हमारे जीवन में ज्ञान और क्रियाशीलता के एकसाथ आने के भाव को दर्शाता है। यदि जीवन में कठिन परिस्थिति आती है, तो क्या करना चाहिए? समस्या के समाधान के लिए हमें अपने ज्ञान का इस्तेमाल करना चाहिए। जब आप बुद्धिमत्ता से कार्य करते हैं, तब स्कंद तत्व प्रकट होता है। स्कंदमाता कौशल, करुणा और साहस की प्रतीक हैं।
6. कात्यायनी: अन्याय और अज्ञानता को मिटाने का संदेश । देवी मां का यह रूप देवताओं के क्रोध से उत्पन्न हुआ। सृष्टि में दिव्य और दानवी शक्तियां व्याप्त हैं। इसी तरह क्रोध भी सकारात्मक और नकारात्मक हो सकता है। क्रोध को अवगुण न मानें। क्रोध का भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। अच्छा क्रोध बुद्धिमत्ता से संबंधित है और बुरा क्रोध भावनाओं और स्वार्थ से। अच्छा क्रोध व्यापक दृष्टिबोध से आता है। यह अन्याय और अज्ञानता को मिटाने का संदेश देता है। अन्याय और नकारात्मकता को मिटाने के उद्देश्य से जो क्रोध उत्पन्न होता है, वह देवी कात्यायिनी का प्रतीक है।
7. कालरात्रि: ज्ञान और तटस्थता का संदेश
काल अर्थात समय। सृष्टि में घटित होने वाली सभी घटनाओं का साक्षी है समय। रात्रि अर्थात गहन विश्राम या पूर्ण विश्राम। तन, मन और आत्मा के स्तर पर आराम। बिना विश्राम पाए आप दीप्तिमान कैसे होंगे? कालरात्रि गहनतम विश्राम के उस स्तर का प्रतीक है, जिससे आप जोश पा सकें। ये देवी आपको ज्ञान और तटस्थता प्रदान करती हैं।
8. महागौरी: परमानंद और मोक्ष प्रदाता
देवी के इस रूप में ज्ञान, गमन, प्राप्ति और मोक्ष का संदेश छिपा है। महागौरी हमें विवेक प्रदान करती हैं, जो जीवन सुधा समान है। निष्कपटता से शुद्धता प्रकट होती है। महागौरी प्रतिभा और निष्कपटता का मिश्रण हैं। ये परमानंद और मोक्ष प्रदान करती हैं।
9. माता सिद्धिदात्री: सभी सिद्धियों की दाता
मां दुर्गा के नौवा स्वरूप माता सिद्धिदात्री का है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति को सभी सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। इस पूरे संसार में उसके लिए कुछ अप्राप्य नहीं होता है। उसमें इस ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त कर लेने की क्षमता आ जाती है।

विराटनगर (नेपाल)
🙏मनीषा मारू🙏

