Mon. Jun 1st, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें himalini-sahitya

वह अतुलनीय, विषधर जड़ : अनिल कुमार मिश्र

 
स्नेह-तरु

उस 
विशाल 
वट-वृक्ष पर 
कई जीवन हँसते हैं
परिवार के साथ
तरह-तरह के प्राणी
सापेक्ष निरपेक्षता 
एवं 
निरपेक्ष सापेक्षता से दूर
ह्रदय से,बिना किसी कृत्रिमता के
खुश होते हैं
उस स्नेह-तरु पर
उनकी आत्मा हँसती है निश्छल
पत्तियां,फूल,फल और शाख़ाएँ
झूम जाती हैं 
निष्कपट भाव से
सभी को खुश देखकर
इतने सारे प्राणियों की खुशी का
एकमात्र,निर्विरोध कारण
जड़ ही तो है
उसपर विश्वास के कारण ही
प्राणियों की ख़ुशी है
पर
सभी जीव अनभिज्ञ हैं
इस सत्य से
कि इस विशाल वृक्ष के जड़ ने ही
गरल बनाना 
आरम्भ कर दिया है
उनकी खुशियाँ चुभने लगी हैं
उसे
उसने दूसरे वृक्ष के जीवों को
आमंत्रण देना आरम्भ कर दिया है
उनके कानों में विष भरना
शुरू कर दिया है
ख़ुशी छीनने की योजनाएँ
अपने शाखाओं की
स्वतः 
जड़ ही बनाने लगा है
अपनों को समाप्त करने की
साजिश रचने लगा है
गरल की व्याप्ति
पूरे वृक्ष में महसूस होने लगी है
अब कोई भी जीव हँसता नहीं
तलाश भी संभव नहीं
किसी विकल्प की
क्योंकि जड़ से जुड़े भावनात्मक रिश्ते
दिल-दिमाग को झकझोर जाते हैं
सभी चिंतित से,मौन होकर
गरल को सुधा में परिवर्त्तित करने की प्रार्थना
ईश्वर से करते हैं
निःशब्द
ताकि विशाल वृक्ष का 
व्यक्तित्त्व/चरित्र
मलिन ना हो जाए
सांसारिक जीव उसे कोसने ना लगें
'हृदयहीन'की नयी संज्ञा से विभूषित ना हो जाए
वह 
अतुलनीय, विषधर जड़।
अनिल कुमार मिश्र

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *