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वर्चुअल शिक्षा- कितना लाभदायक कितना हानिकारक ? : योगेश मोहनजी गुप्ता

 
योगेश मोहनजी गुप्ता
चेयरमैन
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ, भारत

योगेश मोहनजी गुप्ता । ईश्वर प्रदत्त प्रकृति परिवर्तनशील हैं। प्रकृति का यह परिवर्तनशीलता का नियम समस्त प्राणीजगत पर क्रियान्वित होता है। परिवर्तन शीघ्र अथवा विलम्ब से हो सकता है, परन्तु इसका होना अवश्यमभावी है। कोविड – 19 के प्रभाव से सृष्टि में हुये परिवर्तन ने समस्त प्राणीजगत को अचम्भित कर दिया है।
इसके प्रभावस्वरूप जहाँ एक ओर व्यक्ति के रहन-सहन, खान-पान और जीवन शैली में परिवर्तन आया है, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति ने प्रगतिशील सोच को स्वीकार किया है। आज के तकनीकी युग में प्रत्येक व्यक्ति ने सक्रिय होकर अपने को परिवर्तित किया है। आज से 8 माह पूर्व कोरोना महामारी ने जब सभी की जीवन शैली को अस्त-व्यस्त कर दिया, तब शिक्षा जगत में भी एक अदभुत परिवर्तन आया। जो शिक्षक प्रतिदिन कक्षा-कक्ष परिस्थिति में ज्ञान प्रदान करता था, वह स्वयं को ऑनलाइन/वर्चुअल शिक्षा प्रदान करने हेतु तैयार करने को विवश हुआ। परिस्थितिवश जिस परिवर्तन को स्वीकार किया था, आज वह वरदान स्वरूप सिद्ध हुआ हैं, क्योंकि इसने वैश्विक जगत में एक क्रान्ति ला दी है, परन्तु प्रत्येक परिवर्तन में जहाँ एक ओर सकारात्मक पक्ष निहित होते हैं, वहीं दूसरी ओर उसमें नकारात्मक पक्ष भी समाहित होते हैं। आज से 8 माह पूर्व तक जहाँ बच्चों को टीवी अथवा मोबाइल का अतिशय प्रयोग करना, उनकी उद्दण्डता का प्रतीक था, वहीं आज स्वयं माता-पिता अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल व अन्य तकनीकी संसाधनों का प्रयोग करने के लिये प्रेरित करते हैं, क्योंकि आज समय की यही मांग है। इस अचम्भित करने वाले परिवर्तन ने सभी की सोच बदल कर रख दी है, जिसकी कभी किसी ने आशा नहीं की थी।
आज विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या यह परिवर्तन छात्रों के हित के लिये है अथवा उनके भविष्य से खिलवाड़ करने के लिये है। अति सर्वत्र वर्जयते – इस उक्ति का अनुकरण अवश्य ही होना चाहिये। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यदि बालक मोबाइल अथवा टीवी पर लगातार दीर्घ समय तक ध्यान केन्द्रित करके देखता है तो उसके नेत्र अवश्य ही प्रभावित होंगे। ऑनलाइन/वर्चुअल शिक्षा से छात्रों की ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं मनोयोगात्मक विकास पूर्ण रूपेण नहीं हो सकता। परिणामस्वरूप छात्र का चहुंमुखी विकास भी बाधित होता है। ऐसी परिस्थिति में वर्ष 2021 में भारत को जिस त्वरित मस्तिष्क की आवश्यकता होगी, वह एक दुःस्वप्न में परिवर्तित हो जायेगा।
इसी प्रकार छात्रों का शारीरिक व मानसिक विकास कॉलेज के खेल के मैदान में ही हो सकता है, क्योंकि वहाँ वह विभिन्न प्रकार के खेलों में भाग लेता है। विभिन्न प्रकार के शारीरिक अभ्यास करता है। जिनसे उनमें एक नया जोश, स्फूर्ति, उमंग, उल्लास की भावना का संचार होता है। इसके विपरीत टीवी अथवा मोबाइल के समक्ष बैठकर ऐसा कदापि संभव नहीं है। इसी के साथ-साथ देखने में यह भी आया है कि इस दौरान भारतीय युवाओं के शरीर के वजन में भी अनावश्यक रूप में वृद्धि हो रही है। एक छात्र का घर से विद्यालय जाना और विद्यालय पहुँचकर स्कूल की घंटी बजने के साथ ही अपनी कक्षा में पहुँचना एवं दिनभर की विद्यालयी गतिविधियों में संलग्न रहने से छात्र का शारीरिक तथा मानसिक दोनो प्रकार से पर्याप्त विकास होता है। कक्षा कक्ष परिस्थिति में अन्य सहपाठियों के साथ शिक्षा गृहण करते हुये एक प्रतियोगिता की भावना उत्पन्न होती है, जो भविष्य में अपने लक्ष्य तक पहुँचने में अत्यधिक सहायक होती है। इसी प्रकार मध्याह्न भोजन के समय परस्पर एक साथ बैठकर भोजन करने से त्याग व स्नेह की भावना का निर्माण करता है, जो भविष्य में सद्गुणों के निर्माण के लिये अत्यधिक आवश्यक होता है।
बालक अपने परिवार के अतिरिक्त अन्य संस्थाओं, यथा – पड़ौस, स्कूल, समुदाय के सम्पर्क में आता है तो वहाँ भी अपने ज्ञान का संवर्धन करता है। परिवार में बालक अपने रक्त संबंधित रिश्तों में नैतिक मूल्यों का ज्ञान लेता है, परन्तु जब वह पड़ौस, विद्यालय में पहुँचता है तो वह अलग-अलग विचारों के व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है तो उसका मस्तिष्क नवीन पौधों के समान विस्तृत होना प्रारम्भ हो जाता है। उसमें हर विषय की अच्छाई-बुराई को जानने की समझ उत्पन्न हो जाती है। विद्यालय समाज का लघु रूप है, कोठारी जी का यह कथन अत्यन्त ही उपयुक्त है, क्योंकि विद्यालय में बालक विभिन्न धर्म, समुदाय, जाति के बालकों के सम्पर्क में आता है और उनके सम्पर्क में वह न केवल अपने ज्ञान को विस्तृत करता है अपितु अपने व्यक्तित्व को पूर्णतया परिष्कृत भी करता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि यदि हम भारत की भावी पीढ़ी के व्यक्तित्व का सम्यक् विकास करना चाहते हैं तो वह घर पर ऑनलाइन/वर्चुअल शिक्षण में सम्भव नहीं है। ऑनलाइन और ऑफलाइन शिक्षण में वही अंतर है जो नियमित और पत्राचार माध्यम से शिक्षण में है। अतः परिस्थितिवश स्वीकार किया गया ऑनलाइन वर्चुअल शिक्षा का माध्यम आधारिक रूप कदापि नहीं ले सकता है। बच्चे के व्यक्तित्व का चहुँमुखी विकास विद्यालय में कक्षा-कक्ष परिस्थिति में ही पर्याप्त रूप में हो सकता है।

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