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गणतन्त्र में नातावाद का लहलहाता फसल : अंशु झा

 

अंशु झा, हिमालिनी पत्रिका,सितम्बर २०२० अंक । विक्रम संवत २०६२, ०६३ के जनआंदोलन के बाद नेपाल में २०६५ ज्येष्ठ १५ गते को गणतन्त्र की घोषणा हुई । २४० वर्ष के राजतन्त्र के बाद देश में गणतन्त्र आया । जनता खुश हुई कि अब हमें हमारा अधिकार मिलेगा । क्योंकि गणतन्त्र का अर्थ भी वही होता है कि जनता के द्वारा जनता के लिए जो शासन व्यवस्था हो । परन्तु वह खुशी बस क्षणिक रही । राजतन्त्र में तो एक ही शासक को झेलना पड़ता था परन्तु अभी तो बहुत सारे शासक को झेलना पड़ रहा है । राजतन्त्र में राजा का पुत्र ही राजा बनता था परन्तु अभी तो प्रत्येक बड़े ओहदे वाले व्यक्ति का रिश्तेदार बड़े ओहदे पर पहुंच रहा है । भाई, भतीजा, जीजा, साला, समधी, बेटी, बहु इत्यादि बहुत सारे रिश्ते हैं जो राजसी सुख भोग रहे हैं । जी हां वर्तमान में गणतन्त्र का शाब्दिक अर्थ मिट गया है । गणतन्त्र पर नातावाद इतना हावी हो गया है कि शासक को अपने रिश्तेदार के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा । गणतन्त्र का शाब्दिक अर्थ तो सार्वजनिक वस्तु, विषय, क्रियाकलाप आदि । गणतन्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है रिस पब्लिक (रिपब्लिक)का परिवर्तित रूप है । इसका सबसे पहले रोम में राज्य के सन्दर्भ में प्रयोग हुआ था । इसमें कानून का शासन होता है । इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अधिकारों एवं कार्यों का स्पष्ट बंटवारा होता है । सबके अधिकार सनिश्चित के लिए एक संविधान होता है ।

जनता में गणतन्त्र प्रति का सोच कुछ गलत हो गया है । लोग कहते हैं कि गणतन्त्र का मतलब तो चोर उच्चका ही होता है । क्योंकि गणतन्त्र आने के बाद रिश्तेदारों की भर्ती शुरु हो गई है, चाहे वह कोई मन्त्रालय हो या गांवपालिका की कार्यालय । सभी जगह प्राथमिकता अपने रिश्तेदारों को ही दी जाती है । सामाजिक सन्जाल में भी इस प्रकार की बातें भाइरल होती रहती है कि पदाधिकारी नियुक्ति में नियुक्त करने वाले का ही आदमी होता है । जी हां, प्रचण्ड अपने बहु को मन्त्री बना सकते हैं तो अन्य क्यों नहीं कर सकता । चाहे योग्यता हो या न हो, वह फलाना का आदमी है तो वह चिलाना का आदमी है । राज्य के इस प्रकार के व्यवहार जनता को लगा रहा है कि गणतन्त्र से अच्छा राजतन्त्र ही था । इससे स्पष्ट होता है कि नेताओं के व्यवहार और क्रियाकलाप के कारण गणतन्त्र तथा नवउदारवाद का उपहास हो रहा है भलेही सरकार जनता की समाजवाद का वकालत करे । गणतन्त्रात्मक व्यवस्था की शासन व्यवस्था और नवउदारवादी अर्थतन्त्र तथा समाजवाद के रास्ते पर चलने के लिए अग्रसर नेपाली समाज में नातावाद, परिवारवाद का अन्त होने के बदले और भी फल फूल रहा है । ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि वर्तमान का गणतन्त्र भाई भतिजा, बेटा बेटी, सास बहु और समधी समधन के इर्द–गिर्द से राजनीतिक, कूटनीतिक, प्राज्ञिक, प्रशासनिक नियुक्ति हो रहा है जिसे परिवारवाद, नातावाद ही तो कहेंगे न । नेपाली समाज अभी भी नेपोटिज्म का ही सामना कर रहा है ।

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नातेदारी की चर्चा अन्य सामाजिक विज्ञानों से अधिक मानवशास्त्र में होता है । सन् १९७० के दशक तक नातेदारी अध्ययन मानवशास्त्रीय विषय में अपना वर्चस्व जमाया हुआ था । उस समय के मानवशास्त्रियों ने इथ्नोग्राफी (समुदाय का पहला तथा विस्तृत अध्ययन) करते वक्त विभिन्न विषयों का अध्ययन करने के बावजुद भी नातेदारी की राह अपना ही लेता था । समाज नातेदारी व्यवस्था में आधारिता होने के कारण मानवशास्त्रियों का यह विश्वास था कि इसी के सहारे समाज का गहन अध्ययन किया जा सकता है । उस वक्त मानवशास्त्रियों के अध्ययन को समाज का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक संरचना की विशेषण करना बहुत बड़ी बात होती थी । जिसका मुख्य कारण उस वक्त का समाज का चरित्र ही सामन्ती था । जिससे सब उसी के अन्तर्गत रहकर अध्ययन करता था । सन् १९८० के दशक में अमेरिकी मानवशास्त्री प्राध्यापक डेभिड स्नाइडर ने निष्कर्ष निकाला कि ‘किनसिप इज डेड’ या ‘किनसिप इज बाइलोजिक ¥यादर द्यान कल्चरल’ में नातेदारी अध्ययन द्वारा संस्कृति की व्याख्या तथा विश्लेषण करना उपयुक्त नहीं है । उनके निष्कर्ष ने नातेदारी अध्ययन को पीछे छोडा । परन्तु हमारे समाज में यह नातावाद अस्सी के दशक में पहुंच गया है ।

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फिलहाल हमारे समाज में हो रहे राजनीतिक, प्रशासनिक, प्राज्ञिक, कूटनीतिक नियुक्ति और विकास के ठेक्का पट्टा में जो नातावाद को स्थान दिया जा रहा है उससे तो चलता है कि डेभिड स्नाडर गलत थे । आज अगर वो रहते और नेपाली समाज का अध्ययन करते तो उन्हें पता चलता कि नातेदारी मरी नहीं है यह तो अनन्तकाल तक जीवित रहने वाली है । सन् १९९० के दशक के बाद मानवशास्त्रीय अध्ययन में नातेदारी की व्याख्या और विश्लेषण में कुछ परिवर्तन दिखाई दिया । नातेदारी को लैंगिक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा । आधुनिक विज्ञान तथा प्रविधि विकास से वीर्य और डिम्ब का दान तथा प्रत्यारोपण, बच्चा जन्म के लिए भाडे का गर्भ लेने का चलन, सहलैंगिक विवाह इत्यादि नातेदारी की परिभाषा हो गई थी । परन्तु इससे नेपाली समाज पर उतना प्रभाव नहीं पडा जितना । विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में विकास नहीं होने का मुख्य कारण है नातावाद ।

नेपाल में गणतन्त्र के पश्चात नातावाद और भी लहलहा रहा है । देउवा की सासु जापान की राजदूत, रामचन्द्र पौडेल का समधी प्रधानन्यायाधीश, माधव नेपाल का भाई हङकङ का राजदूत, प्रचण्ड की बेटी, बहु, दामाद, भाई आदि विभिन्न उच्च पद पर । यह तो नातावाद का आंशिक उदाहरण है । मधेस केन्द्रित राजनीतिक पार्टी के नेताओं का भी यही हाल है । उन लोगों ने भी परम्परा को बरकरार रखा है । उनलोगों ने भी अपनी पत्नी और प्रेमिका को सभासद जैसा तोहफा दिया है । इससे स्पष्ट होता है कि नेपाली समाज का नातावाद एक अभिन्न अंग है ।
फिलहाल ही मन्त्रिपरिषद् ने उपप्रधान तथा रक्षामन्त्री ईश्वर पोखरेल के समधी को राष्ट्रीय वाणिज्य बैंक के अध्यक्ष में नियुक्त किया है जिससे नातेदारी का प्रभुत्व स्पष्ट दिखाई दे रहा है । नेपाली समाज में नातावाद स्थान इतना उच्च हो गया है कि वहां न त कार्य क्षमता का महत्व है न ही दक्षता का । दक्ष व्यक्ति पद पर नहीं पहुंच पाते और जिसका कोई नाता रहता वह अगर असमर्थ भी होता तो उसे उक्त पद प्राप्त हो जाता है ।

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समग्र में हमारे समाज में नातावाद का फसल इतना फल फूल रहा है कि इसका पौधा भविष्य में भी बहुत वर्षों तक हरा ही रहने वाला है । विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रक्रिया से नेपाल की स्थिति दिन व दिन दयनीय ही होती रहेगी । विकास का कोई राह कहीं दूर तक नहीं दिखाई दे रहा । इस व्यवस्था के तहत देश के दक्ष, इमानदार व्यक्तित्वों को विदेश के तरफ देखना पडता है । क्योंकि स्वदेश में उसके लिए कोई सुविधा नहीं होती । दक्ष व्यक्ति अपनी क्षमता और हुनर को विदेश में प्रयोग करने चले जाते हैं क्योंकि यहां पर शाशकीय वर्ग में उसका कोई रिश्तेदार नहीं होता । नातवाद में सिर्फ हम और हमारे होते अन्य के लिए कोई स्थान नहीं । नेपाली राजनीतिक नेतृत्व में आज भी हम और हमारे के अलावा समाज और राष्ट्र के लिए नहीं सोचने का परिपाटी यथावत है ।

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