लोकतंत्र की अलोकतांत्रिक यात्रा, बहुमत की सरकार का नेपाली जनता को तोहफा : डॉ श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, काठमांडू । 21 डिसम्बर 2020। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की अलोकतांत्रिक यात्रा एकबार फिर से नेपाल की राजनीति में एक और दिन ने काले दिन के रूप में अपनी तारीख दर्ज करा ली है । विकास के बड़े–बड़े सपने, कितने ही दावे, राष्ट्रवाद की सीढी चढ़ कर आए जनता के प्रतिनिधि ने जनता को तोहफे में यह दिन दिया है । ऐसा नहीं है कि नेपाल में पहली बार संसद विघटन हुआ है । परन्तु जिस तरह से बहुमत की सरकार ने यह कदम उठाया है वह निश्चय ही वितृष्णायोग्य है । महीनों से चले आ रहे तमाशे का यह पटाक्षेप है यह नहीं कह सकते क्योंकि अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है । किन्तु जनता के कटघरे में प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली और राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी तो खड़े हो ही गए हैं ।
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा पार्टी के भीतर विवाद को बढ़ाए जाने के कारण किए गए अप्रिय निर्णय से देश में राजनीतिक संकट पैदा हो गया है और उनकी भविष्य में अपनी राह भी असहज होती दिख रही है। ओली के फैसले का उनकी ही पार्टी सीपीएन (माओवादी) में सबसे अधिक आलोचना हो रही है, जो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की तैयारी कर रही है। आगामी पूस सात गते केंद्रीय समिति की बैठक में ओली के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का प्रस्ताव पेश किया जाएगा । वहीं उनके फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका तैयार की जा रही है, संवैधानिक विशेषज्ञों ने कहा है कि यह कदम असंवैधानिक है क्योंकि संसद को भंग करने के लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं है । उनके इस कदम से सड़कों पर विरोध के स्वर उठने लगे हैं,जनता सोशल मीडिया के द्वारा अपना रोष और आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं ।
नेपाल के इतिहास को टटोला जाए तो सर्वविदित है कि यह अस्थिरताओं से हमेशा जूझता रहा है । लोकतंत्र की स्थापना नेपाल में पहली बार १९५१ में हुई थी । १९५५ में महाराजा त्रिभुवन के निधन के बाद महेंद्र सत्ता में आए । और वे देश में लोकतंत्र नहीं चाहते थे । १९५९ में आम चुनाव में नेपाली कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ और बीपी कोईराला प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए। राजा महेंद्र ने दिसंबर, १९६० में संसद को भंग कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर दिया । महेंद्र की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र विरेंद्र वीर विक्रम शाहदेव नए राजा बने ।
सन १९७२ में राजा बीरेंद्र बिक्रम शाह ने राजकाज सँभाला । सन १९८९ में एक बार फिर लोकतंत्र के समर्थन में जन आंदोलन शुरु हुआ और राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह को सांवैधानिक सुधार स्वीकार करने पड़े । फिर मई १९९१ में पहली बहुदलीय संसद का गठन हुआ । उधर १९९६ में माओवादी आंदोलन शुरू हो गया । एक जून २००१ को नेपाल के राजमहल में हुए सामूहिक हत्या कांड में राजा, रानी, राजकुमार और राजकुमारियाँ मारे गए । उसके बाद राजगद्दी संभाली राजा के भाई ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह ने । फरवरी २००५ में राजा ज्ञानेंद्र ने माओवादियों के हिंसक आंदोलन का दमन करने के लिए सत्ता अपने हाथों में ले ली और सरकार को बर्खास्त कर दिया ।
नेपाल में एक बार फिर जन आंदोलन शुरू हुआ और अंततः राजा को सत्ता जनता के हाथों में सौंपनी पड़ी और संसद को बहाल करना पड़ा । संसद ने एक विधेयक पारित करके नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया । २००७ में सांवैधानिक संशोधन करके राजतंत्र समाप्त कर दिया गया और नेपाल को संघीय गणतंत्र बना दिया । और अब एक बार फिर से जनमत का अपमान करते हुए लोगों के हजारों असहाय बच्चों की बलिदान की शहादत के बाद, संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य को राजनीतिक अनिश्चितता और अस्थिरता के भंवर में डूबा दिया गया है ।
दो तिहाई बहुमत के प्रधानमंत्री केपी ओली ने संसद को भंग करने करने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग किया है । देखा जाए तो प्रधानमंत्री ओली का कदम २०५० में तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने भी संसद विघटन कर के मध्यावधि चुनाव करवाया था, लेकिन आज की परिस्थिति और उस समय की परिस्थिति में अंतर है । उस पर आज का संविधान प्रधानमंत्री को यह अधिकार भी नहीं देता । आश्चर्य की बात यह है कि प्रधान मंत्री के इस तरह के एक असंवैधानिक कदम का राष्ट्रपति ने बिना किसी भी राजनीतिक परामर्श के मंजूरी कैसे दे दी, राष्ट्र का संरक्षक जिसका मुख्य कर्तव्य संविधान का पालन करना और उसकी रक्षा करना है उनसे ही जनता ऐसे गैर संवैधानिक कार्य की अपेक्षा नहीं करती है । राष्ट्रपति श्रीमती विद्यादेवी भंडारी के पास प्रस्ताव संबंधित विशेषज्ञों से परामर्श, चर्चा और परामर्श के बाद इसे मंजूरी देने या पुनर्विचार करने का विकल्प था । परन्तु उन्होंने इसे अनुमोदित करने के लिए समय नहीं लिया । उनके इस कार्य ने साबित कर दिया है कि वो सिर्फ एक रबर स्टाम्प की तरह काम कर रही हैं । उन्हें सिर्फ आदेश का पालन करना है और कुछ नहीं । अध्यादेश को मंजूरी देकर पहले भी उनकी किरकिरी हो चुकी है और अब तो आक्षेपों के सारे दरवाजे खुल चुके हैं । राष्ट्रपति किसी राष्ट्र का नहीं बल्कि पार्टी विशेष का प्रतिनिधित्व करती नजर आ रही हैं । पहले भी यह आरोप लगता रहा है और अब तो तकरीबन सिद्ध हो चुका है ।
देश की बदहाल स्थिति, गिरती अर्थव्यवस्था, कोरोना संकट के बीच मध्यावधि चुनाव का अनावश्यक खर्च तय है कि गरीब और निःसहाय जनता को ही भुगतना होगा । इतिहास इस निरंकुशता और असंवेदनशीलता की समीक्षा अवश्य करेगा । जनता चाहे तो आने वाले समय में सत्तालोलुप इन प्रतिनिधियों को अवश्य आइना दिखा सकती है किन्तु अफसोस तो यही है कि उनके समक्ष कोई चेहरा नहीं है जिसे वो चुन सके । बाद में भी यही चेहरे अपने झूठ के साथ सामने आएँगे ।

सम्पादक-हिमालिनी

