चलो सभी मिलकर संविधान का अंतिम संस्कार करते हैं ! लेकिन..? : जयप्रकाश आनन्द
जयप्रकाश आनन्द ।२०७७ पौष २५ गते । पौष २७गते “राष्ट्रीय एकता दिवस” का धुमधाम है। उस दिन काठमांडू में बड़ा नगाडा बजने वाला है। इसका कोई दुख नहीं है।
संविधान खत्म हो ही गया है ! उस समय, हमे दौड़ा -दौड़ा कर लाश बनाते समय भी हमलोगो ने कहा था की “बैल प्रजनन नहीं करता “। अब जब यह संविधान हरामी हो गया तो हमें क्यों रोना चाहिए। हमेशा संविधान की मृत्यु की कामना करने वाले “जसपा बहादुर” अब इसके पुनर्जीवन का बेहूदा नाटक मंचन कर रहे हैं। इस निष्ठाविहीन नाटक में “कालावर्ण” क्यों आत्मरति करेगा ?
पृथ्वी नारायण शाह इतिहास के आदरणीय पात्र हैं। इनको प्रतिगमन का मुखौटा क्यों बनाया जाए ? ज्ञानेंद्र शाह ने पंचायत के बत्तीस साल और अपने अधिनायकत्व के दो साल के भीतर हुए जनहत्या और नागरिक अधिकारों के अपहरण की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं।सरकार वर्तमान अव्यवस्था के ताल में राष्ट्रवादी लेपन लगाना चाहती हैं। जनता को बताए की बार-बार भारत जाकर योगी आदित्यनाथ जैसे पाखंडियों और आठ दशक पहले अपने “राज्य और पूर्ववर्तियों” को खोने वाले पूर्व सामंतीयों के आशीर्वाद से नेपाल में किस तरह का जनपक्षीय शासन जन्माना चाहते है। उसने जो शासकीय संरचना का स्वरुप सोचा हो वही देदे ? उसमे वो कहा होगा और दल कहाँ होंगे- बताओ ?
बत्तीस वर्षों तक, नंग्रा-दारा के साथ राजतन्त्र भी था और राज्यपोषित धर्मान्ध शासन भी था। जब नारायणहिटी फोडने के लिए जनता उतरी तब क्यों स्पष्टीकरण नहीं दे सके ? यदि भारत ने राजा को हटाया था तो क्या डॉ. कर्ण सिंह, राजा और संसद के “दो स्तंभ” का प्रस्ताव “दक्षिण ब्लॉक” से लाए थे या शंकराचार्य की कांचिकामाकोटी पीठ से लाए थे ? क्या आज यह तथ्य मायने नहीं रखता कि अगर सात दलों के नेताओं ने यदि डॉ. कर्ण सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता, तो क्या उन सभी को २०४७ साल में टेकु में कुटीकुटी कर मारे गए ८/९ प्रहरी वाला दशा नहीं भोगना पड़ता ? क्या गिरिजा प्रसाद कोईराला सहित सभी “लिंचिंग” के चपेट में नहीं पड़ने वाले थे ? क्या आज के भ्रमित जनता उस समय शक्तिहीन थे ?
इसलिए, पूर्व राजा और उनके सभी पक्षपोषण करने वाले, भावी राजनीतिक संरचना के खाका के साथ, शासकीय संरचना के चरित्र के साथ आने से होगा। पृथ्वी नारायण शाह को आंदोलन का झंडा नहीं बनाया जाना चाहिए। पृथ्वी नारायण शाह को जितना हो सके विवाद से अक्षुण्ण रखना चाहिए ।
मैं फिर कहता हूं। यह संविधान खत्म हो गया है। इसका अब बचाव नहीं किया जा सकता है। जो लोग कहते हैं कि मैं इस संविधान की रक्षा करूंगा, वे इतिहास में वाराणसी या काशी के उन पंडों की तरह हैं, जो दालमंडी में रंडी के साथ देहखुख भोगते थे और बिश्वनाथ के दर्शन के बाद घर लौटते थे। वह क्रूर पाखंड था।
संसद के विघटन के बाद, देश में कुछ नई चर्चाएँ जन्म ले रही हैं। क्या संविधान को अभी बनाए रखा जा सकता है? क्या इस संविधान की संवैधानिक शक्ति या कौमार्य को अब भी बचाया जा सकता है ? क्या संघीयता के अंत के लिए इस संविधान को बलि का बकरा बनाया जा रहा है ? ऐसी स्थिति में जहां आज राष्ट्रवाद समाप्त हो गया है, क्या देश के राष्ट्रवादी अभियन्ता भविष्य की सरकार के गठन में खुले विदेशी हस्तक्षेप को रोकने की स्थिति में हो सकते हैं ? क्या मधेस, आदिवासी जनजति, दलित और अन्य बहिष्कार करने वाले आज के थूथुन से आवाज निकाल पाएंगे ? हालांकि, इसकी आधिकारिक प्रतिक्रिया के बावजूद, इस संविधान को बचाया नहीं जाएगा।
इसलिए, समय रहते सोचिए ! चार प्रश्नों के उत्तर पर विचार करें:
1) संविधान को समाप्त करने का विधि सम्मत तरीका क्या होगा ?
1) संविधान को समाप्त करने का विधि सम्मत तरीका क्या होगा ?
२) अब नया संविधान बनाने का रास्ता क्या होगा ?
3) किस शासन संरचना पर सहमति बनेगी/होगी ? और,
4) क्या संघीयता के अंत के बाद हितधारकों को चुप कराने के लिए सरकार फिर से दमन को दोहराएगी का कोई अन्य तरीका है ?
तब कीजिए – संविधान का दाह संस्कार !!

