आशा और भरोसा सर्वोच्च अदालत के प्रति
आगामी वैशाख १७ और २७ गते चुनाव संभव है या नहीं
हिमालिनी 2021 जनवरी अंक | दो शीर्ष नेता केपी शर्मा ओली और पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ में अन्तरनिहित सत्ता–स्वार्थ के कारण अन्ततः नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) विभाजित हो गई । दो समूह में विभाजित नेकपा के दोनों समूह आज अपने आपको वैधानिक ‘नेकपा’ बता रही है । लेकिन दो समूह में से किस को वैधानिकता मिलती है, यह अभी तक तय नहीं हुआ है । सामान्यतः ‘नेकपा’ नाम, झण्डा और चुनावचिन्ह ‘सूर्य’ जिस समूह को मिलेगा, वही समूह आधिकारिक नेकपा होनेवाला है । यह तो है, नेकपा की आन्तरिक राजनीति और भविष्य संबंधी सामान्य अनुमान ।
लेकिन नेकपा विभाजन के कारण आज देश की समग्र राजनीति ही नहीं, राज्य–संयन्त्र, संवैधानिक एवं प्रजातान्त्रिक मूल्य–मान्यता भी प्रभावित दिखाई दे रही है । नेकपा में विकसित आन्तरिक विवाद के कारण देश को मध्यावधि चुनाव के नाम पर अस्थिरता की ओर धकेल दिया गया है । लगभग दो–तिहाई बहुमत प्राप्त सरकार अपने कार्यकाल (५ साल) पूरा करने से पहले गिर गयी है । सरकारी घोषणा के अनुसार वि.सं. २०७८ वैशाख १७ और २७ गते देश में आमचुनाव होनेवाला है । लेकिन यह संभव है या नहीं ? आम लोगों के लिए इस सवाल पर ज्यादा ध्यान नहीं है, जितना संसद् पुनस्र्थापना और नेकपा की वैधानिकता पर है ।
राजनीतिक माहौल भी कुछ ऐसा ही है । विभाजित नेकपा के दोनों समूह खुद को वैधानिक ‘नेकपा’ प्रमाणित करने के लिए अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं । उसमें से एक प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली संबंद्ध समूह है तो दूसरा समूह है– पूर्व प्रधानमन्त्री द्वय पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ और माधवकुमार नेपाल का समूह । सत्ताधारी नेकपा के पक्ष में सिर्फ सत्ता से जुड़े हुए नेतागण दिखाई देते हैं तो प्रचण्ड–माधव समूह में प्रमुख प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस के साथ अन्य राजनीतिक दल भी दिखाई दे रहे हैं, जो कहते हैं– संसद् विघटन धोखा और असंवैधानिक भी है । उन लोगों का कहना है कि अब संसद् पुनस्र्थापना ही एक मात्र विकल्प है । इसी मांग और नारे के साथ प्रचण्ड–माधव समूह एवं कुछ विपक्षी दल सड़क संघर्ष में उतर आए हैं । लेकिन सत्ताधारी नेकपा का कहना है कि प्रजातान्त्रिक अभ्यास में ताजा जनादेश के लिए चुनाव का घोषणा होना असंवैधानिक नहीं है, इसीलिए निर्धारित तिथि में चुनाव होनेवाला है ।
अर्थात् आज देश की राजनीति स्पष्ट दो समूह में दिखाई दे रही है, जहां एक समूह नया चुनाव (जनमत) का पक्षधर है तो और दूसरा संसद् पुनस्र्थापना का पक्षधर । इन दो समूह में से विशेषतः प्रचण्ड–माधव समूह प्रधानमन्त्री भी रहे ओली समूह के ऊपर सशंकित है, आशंका है कि सत्ता का दुरुपयोग कर कई ओली समूह संकटकाल लागू तो नहीं कर रही है । उन लोगों का यह भी आशंका है कि ओली समूह संघीयता एवं धर्मनिरपेक्षता को खारिज करने की दिशा में भी अग्रसर है । ऐसी ही आशंका बीच संघीयता, धर्मनिरपेक्षता और गणतन्त्र पक्षधर अर्थात् परिवर्तनकारी शक्ति आज वर्तमान ओली–सत्ता के विरुद्ध दिखाई देने लगे हैं तो वहीं पहले से ही संघीयता और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध में क्रियाशील शक्ति प्रधानमन्त्री ओली के पक्ष में दिखाई देने लगे हैं ।
नेकपा सबंद्ध दो समूह बीच जारी शक्ति संघर्ष हो या संघीयता, गणतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता के संबंध में प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए संघर्ष करने वालों की गतिविधि, दोनों देश को अस्थिरता की ओर ले जा रही है । ऐसी ही अवस्था में तत्काल के लिए दो समूह में विभाजित नेकपा में से किस को वैधानिकता मिलनी चाहिए ? यह सवाल सबसे पेचीला होता जा रहा है । राजनीतिक वृत्त में हो या बौद्धिक समूह में, निर्वाचन आयोग से लेकर सर्वोच्च अदालत तक इस सवाल की जोड़ व्याख्या–विश्लेषण हो रही है । यहां तक कि सत्ताधारी नेकपा हो या सड़क में उतरनेवाला नेकपा, दोनों का कहना है कि सर्वोच्च अदालत से उचित निर्णय आनेवाला है, न्याय मिलनेवाला है । संसद् विघटन के विरुद्ध आवाज बुलंद करनेवाले नागरिक समूह के अगुवा से लेकर न्यायक्षेत्र से जुड़े हुए मुर्धन्य व्यक्तित्व अर्थात् प्रधान न्यायाधीशों की एक समूह भी कहते हैं– अब तो हमारी आशा और भरोसा सर्वोच्च अदालत के ऊपर ही है ।
इसतरह सर्वोच्च अदालत के ऊपर आशा और भरोसा रखनेवाले अधिकांश व्यक्ति एवं समूह संसद् विघटन के विरुद्ध और संसद् पुर्नस्थापना के पक्षधर दिखाई देते हैं । अपनी ही पार्टी के नेता के विरुद्ध सड़क संघर्ष में उतरनेवाला नेकपा समूह हो या संसद् विघटन कर ताजा मतादेश के लिए चुनाव घोषणा करनेवाला ओली समूह के नेतागण, दोनों की एक ही बोली है– सर्वोच्च से न्याय मिलनेवाला है । सिर्फ सर्वोच्च अदालत ही नहीं, नेकपा विवाद के कारण निर्वाचन आयोग भी बहस का विषय बन रहा है । संसद् विघटन और पुनस्र्थापना संबंधी विषय में सर्वोच्च अदालत में सुनवाई जारी है, ऐसी ही अवस्था में दो समूह में विभाजित नेकपा में से कौन–सा समूह वैधानिक ‘नेकपा’ है ? इस सवाल को निर्वाचन आयोग के साथ जोड़ कर विचार–विमर्श हो रहा है । राजनीतिक दल संबंधी ऐन अनुसार आयोग भी दोनों समूह से डील कर रही है ।
परिस्थिति यह है कि तत्कालीन अर्थात् एकीकृत नेकपा (४४१ सदस्यीय) के बहुमत केन्द्रीय सदस्य प्रचण्ड–माधव समूह में हैं, लेकिन पार्टी अध्यक्ष, महासचिव और सचिव ओली समूह में हैं । ओली समूह ने दावा किया है कि पार्टी अध्यक्ष, महासचिव और सचिव संबंद्ध समूह द्वारा सम्पादित कार्य ही आधिकारिक और वैधानिक होने का कानूनी प्रावधान है । ऐसे ही दावे के साथ ओली समूह ने पार्टी सदस्यों की संख्या ११०० बना दिया है, जहां बहुमत सदस्य ओली पक्ष में हैं । ऐसी ही पृष्ठभूमि में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दल संबंधी ऐन २०७३ अनुसार दोनों समूहों को कहा कि खुद को वैधानिक साबित करने के लिए प्रमाण पेश किया जाए, लेकिन दोनों समूह ने निर्धारित समय में ऐसा नहीं किया । जिसके चलते आयोग की ओर से स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि यह मुद्दा भी अन्ततः सर्वोच्च अदालत में ही पहुँचने वाला है !
इसी बीच में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दल संबंधी नियमावली को भी संशोधन किया है, जहां सत्ता का साया दिखाई दे रहा है । क्योंकि कानूनी दृष्टिकोण से देश में चुनाव की तिथि तय हो चुकी है, ऐसी अवस्था में राजनीतिक दल संबंधी नियम परिवर्तन करना ठीक नहीं है । अर्थात् खेल शुरु होने से पहले ही खेल का नियम तय होता है, यहां तो खेल शुरु होने के बाद खेल का नियम परिवर्तन किया जा रहा है, जो सामान्यतः स्वीकार्य नहीं हो सकता ।
खैर ! आगामी वैशाख १७ और २७ गते चुनाव संभव है या नहीं ? आज के दिन यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है । महत्वपूर्ण तो यही है कि संसद् पुनस्र्थापना संबंधी मुद्दा अर्थात् राष्ट्रीय सवाल में सर्वोच्च अदालत का निर्णय । दूसरा है– नेकपा की वैधानिकता संबंधी पार्टीगत सवाल । जिसके चलते आज आम लोगों की नजर सर्वोच्च अदालत एवं निर्वाचन आयोग की ओर है । लेकिन सर्वोच्च अदालत हो या निर्वाचन आयोग, यहां से आनेवाला निर्णय आज के दिन सिर्फ अनुमान का विषय है ।

