Tue. Apr 28th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

एकादश विश्व हिंदी सम्मेलन–एक अद्यतन रिपोर्ट : रघुवीर शर्मा

 

विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी भाषा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन है जिसमें दुनिया भर के साहित्यकारों, पत्रकारों, भाषा वैज्ञानिकों और हिंदी सेवियों का जमावड़ा होता है, इसे हिंदी का महाकुंभ कहा जा सकता है, इसकी शुरुआत १९७५ में तब हुई जब पहले विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भारत के नागपुर में किया गया, १०-१२ जनवरी १९७५ के दौरान आयोजित इस प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की संकल्पना राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा की गई थी और यह नागपुर विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजित किया गया, इसके अगले ही वर्ष १९७६ में मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया, सात वर्ष बाद एक बार फिर से तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भारत की राजधानी दिल्ली में किया गया, पूरे दस वर्ष बाद मॉरीशस में एक बार फिर से चौथे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया, तत्पश्चात भारत सरकार ने निर्णय लिया कि विश्व हिंदी सम्मेलनों को नियमित रूप से आयोजित किया जाये और इन्हें भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित करवाया जाए, इस प्रकार १९९३ के बाद से इन सम्मेलनों का आयोजन नियमित हुआ है और अब आजकल यह सम्मेलन तीन वर्ष के अंतराल पर आयोजित किए जा रहे हैं, अभी तक आयोजित कुल ११ विश्व हिंदी सम्मेलनों और उनमें पारित किए गए प्रमुख प्रस्तावों की एक रिपोर्ट यहां प्रस्तुत है, इस रिपोर्ट में पिछले १० विश्व हिंदी सम्मेलनों की परिचयात्मक जानकारी और नवीनतम ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन की अपेक्षाकृत विस्तृत जानकारी दी गई है ।

प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन
पहला विश्व हिंदी सम्मेलन १०–१२ जनवरी १९७५ तक नागपुर में आयोजित किया गया । सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में किया गया । सम्मेलन से संबंधित राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष महामहिम उपराष्ट्रपति श्री बी डी जत्ती थे । महाराष्ट्र राज्य के तत्कालीन वित्त, नियोजन तथा अल्प बचत मंत्री श्री मधुकर राव चौधरीराष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अध्यक्ष थे ।
पहले विश्व हिंदी सम्मेलन का बोधवाक्य था, वसुधैव कुटुम्बकम । सम्मेलन में मुख्य अतिथि मॉरीशस के प्रधानमंत्री श्री शिवसागर रामगुलाम थे जिनकी अध्यक्षता में मॉरीशस से आए एक प्रतिनिधिमंडल ने सम्मेलन में भाग लिया था । सम्मेलन में भारत के कोने–कोने से आए लगभग ३००० प्रतिनिधियों तथा ३० देशों के १२२ प्रतिनिधियों ने भाग लिया । भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गा‘ँधी ने इसका उद्घाटन किया ।
सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्ताव थे ः

१. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए ।
२. वर्धा में विश्व हिंदी विद्यापीठ की स्थापना हो ।
३. विश्व हिंदी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अत्यंत विचारपूर्वक एक योजना बनाई जाए ।

द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन
दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन मॉरीशस में किया गया । राजधानी पोर्ट लुई में २८ से ३० अगस्त १९७६ तक आयोजित इस विश्व हिंदी सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष, मॉरीशस के प्रधानमंत्री डॉ. सर शिवसागर रामगुलाम थे । सम्मेलन में भारत से तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार नियोजन मंत्री डॉ. कर्ण सिंह के नेतृत्व में २३ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने भाग लिया । इसके अतिरिक्त सम्मेलन में १७ देशों के १८१ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया ।

पारित प्रस्तावः
१. मॉरीशस में एक विश्व हिंदी केंद्र की स्थापना की जाए जो सारे विश्व की हिंदी गतिविधियों का समन्वय कर सके ।
२. एक अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका का प्रकाशन किया जाए जो भाषा के माध्यम से ऐसे समुचित वातावरण का निर्माण कर सके जिसमें मानव विश्व का नागरिक बन सके ।
३. सम्मेलन में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में पारित इस प्रस्ताव का फिर से समर्थन किया गया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में एक आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान मिले और सिफारिश की गई कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाए ।

तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन
तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भारत की राजधानी दिल्ली में २८ से ३० अक्तूबर १९८३ को हुआ । सम्मेलन की राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष डॉ. बलराम जाखड़ थे । इसमें मॉरीशस से आए प्रतिनिधिमंडल ने भी हिस्सा लिया जिसके नेता श्री हरीश बुधू थे । सम्मेलन के आयोजन में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने भी प्रमुख भूमिका निभाई । सम्मेलन में कुल ६, ५६६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया जिनमें ३० देशों से आए २६० प्रतिनिधि शामिल थे ।

पारित प्रस्तावः
१. अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के विकास और उन्नयन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थायी समिति का गठन किया जाए ।
२. इस समिति में देश–विदेश के लगभग २५ सदस्य हों ।
३. हिन्दी के विश्वव्यापी स्वरूप को विकसित करने के‍ लिए विश्व हिन्दी विद्यापीठ स्थापित करने की योजना को मूर्त रूप दिया जाए ।

चतुर्थ विश्व हिंदी सम्मेलन
चौथे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन २ से ४ दिसंबर १९९३ को मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में आयोजित किया गया । मॉरीशस के कला, संस्कृति, अवकाश एवं सुधार संस्थान मंत्री माननीयश्री मुकेश्वर चुन्नीनेराष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष का दायित्व सँभाला । इसमें भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता श्री मधुकर राव चौधरी थे और भारत के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्री रामलाल राही इसके उपनेता थे । सम्मेलन में मॉरीशस के अतिरिक्त लगभग २०० अन्य विदेशी प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया ।

पारित प्रस्तावः
१. विश्व हिन्दी सचिवालय मा‘रीशस में स्थापित किया जाए ।
२. भारत में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए ।
३. विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठ खोले जाएं ।
४. भारत सरकार विदेशों से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र, पत्रिकाएं, पुस्तकें प्रकाशित करने में सक्रिय सहयोग करे ।
५. हिन्दी को विश्व मंच पर उचित स्थान दिलाने में शासन और जन–समुदाय विशेष प्रयत्न करे ।
६. विश्व के समस्त हिन्दी प्रेमी अपने निजी एवं सार्वजनिक कार्यों में हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करें और संकल्प लें कि वे कम से कम अपने हस्ताक्षरों, निमंत्रण पत्रों, निजी पत्रों और नामपट्टों में हिन्दी का प्रयोग करेंगे ।
७. सम्मेलन के सभी प्रतिनिधि अपने–अपने देशों की सरकारों से संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए समर्थन प्राप्त करने का सार्थक प्रयास करेंगे ।

यह भी पढें   सप्तरी के 'जायंट किलर' ई. रामजी यादव अब देश के 'श्रम सारथी': डॉ. सीके राउत को हराने वाले युवा नेता बने श्रम मंत्री

पंचम विश्व हिंदी सम्मेलन
पांचवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन त्रिनिदाद एवं टोबेगो की राजधानी पोर्ट ऑफ स्पेन में चार से आठ अप्रैल १९९६ को हुआ । आयोजक संस्था थी त्रिनिदाद एवं टोबेगो की हिंदी निधि और सम्मेलन के प्रमुख संयोजक थे हिंदी निधि के अध्यक्ष श्री चंका सीताराम । भारत की ओर से इस सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधिमंडल के नेता अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल श्री माता प्रसाद थे ।
सम्मेलन का केंद्रीय विषय था– आप्रवासी भारतीय और हिंदी । सम्मेलन में भारत से १७ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया । लगभग ३५देशों के २५७ अन्य प्रतिनिधियों ने भी इसमें भाग लिया ।
पारित मंतव्य
१. यह सम्मेलन भारतवंशी समाज एवं हिंदी के बीच जीवंत समीकरण बनाने का प्रबल समर्थन करता है और यह आशा करता है कि विश्वव्यापी भारतवंशी समाज हिंदी को अपनी संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करेगा एवं एक विश्व हिंदी मंच बनाने में सहायता करेगा ।
२. सम्मेलन चिरकाल से अभिव्यक्त अपने मंतव्य की पुनः पुष्टि करता है कि विश्व हिंदी सम्मेलन को स्थाई सचिवालय की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए । सम्मेलन के विगत मंतव्य के अनुसार यह सचिवालय मॉरीशस में स्थापित होना निर्णीत है । इसके त्वरित कार्यान्वयन के लिए एक अंतर सरकारी समिति का गठन किया जाए । इस समिति का गठन मॉरीशस एवं भारत सरकार द्वारा किया जाना चाहिए । इस समिति में सरकारी प्रतिनिधियों के अलावा पर्याप्त संख्या में हिंदी के प्रति निष्ठावान साहित्यकारों को सम्मिलित किया जाए । यह समिति अन्य बातों के साथ–साथ सचिवालयी व्यवस्था के अनेकानेक पहलुओं पर विचार करते हुए एक सर्वांगीण कार्यक्रम योजना भारत तथा मा‘रीशस की सरकारों को प्रस्तुत करेगी ।
३. यह सम्मेलन सभी देशों, विशेषकर उन देशों जहाँ भारतीय मूल के लोग तथा आप्रवासी भारतीय बसते हैं, की सरकारों से आग्रह करता है कि वे अपने देश में विभिन्न स्तरों पर हिंदी के अध्ययन–अध्यापन की व्यवस्था करें ।
४. यह सम्मेलन विश्व स्तर पर हिंदी भाषा को प्राप्त जनाधार और उसके प्रति जनभावना को देखते हुए सभी देशों, जहाँ भारतीय मूल तथाआप्रवासी भारतीय बसते हैं, वहाँ के हिंदी प्रचार–प्रसार में संलग्न स्वयं सेवी संस्थाओंर हिंदी विद्वानों से आग्रह करता है कि वे अपनी–अपनी सरकारों से आग्रह करें कि वे हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए राजनयिक योगदान तथा समर्थन दें ।
५. यह सम्मेलन भारत सरकार द्वारा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय स्थापित करने के निर्णय का स्वागत करता है और आशा करता है कि इस विश्व विद्यालय की स्थापना से हिंदी को विश्वव्यापी बल मिलेगा । (दिसंबर १९९३ में हुए चतुर्थ विश्व हिन्दी सम्मेलन के बाद विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना मॉरीशस में हुई ।

षष्ठम विश्व हिंदी सम्मेलन
छठा विश्व हिंदी सम्मेलन लंदन में १५ से १८ सितंबर १९९९ तक आयोजित किया गया । यूके हिंदी समिति, गीतांजलि बहुभाषी समुदाय और बर्मिंघम भारतीय भाषा संगम, या‘र्क द्वारा इसके लिए राष्ट्रीय आयोजन समिति का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार और संयोजक डॉ. पद्मेश गुप्त थे । सम्मेलन का केंद्रीय विषय था– ‘हिंदी और भावी पीढ़ी ।’
सम्मेलन में विदेश राज्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भाग लिया । प्रतिनिधिमंडल के उपनेता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र थे । सम्मेलन में २१ देशों के ७०० प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इनमें भारत से ३५० और ब्रिटेन से २५० प्रतिनिधि शामिल थे ।

पारित प्रस्तावः
१. विश्व भर में हिंदी के अध्ययन–अध्यापन, शोध, प्रचार–प्रसार और हिंदी सृजन में समन्वय के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय केंद्र सक्रिय भूमिका निभाए ।
२. विदेशों में हिंदी शिक्षण, पाठ्यक्रमों के निर्धारण, पाठ्य पुस्तकों के निर्माण, अध्यापकों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था भी विश्वविद्यालय करे और सुदूर शिक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाए ।
३. मॉरीशस सरकार अन्य हिंदी–प्रेमी सरकारों से परामर्श कर शीघ्र विश्व हिंदी सचिवालय स्थापित करे ।
४. हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दी जाए ।
५. हिंदी की सूचना तकनीक के विकास, मानकीकरण, विज्ञान एवं तकनीकी लेखन, प्रसारण एवं संचार की अद्यतन तकनीक के विकास के लिए भारत सरकार एक केंद्रीय एजेंसी स्थापित करे ।
६. नई पीढ़ी में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए आवश्यक पहल की जाए ।
७. भारत सरकार विदेश स्थित अपने दूतावासों को निर्देश दे कि वे भारतवंशियों की सहायता से विद्यालयों में एक भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था करवाएं ।

सप्तम विश्व हिंदी सम्मेलन
सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भारत की धरती से १५००० किलोमीटर दूर सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो मेंट से ९जून २००३ को हुआ । इक्कीसवीं सदी में आयोजित यह पहला विश्व हिंदी सम्मेलन था । सम्मेलन का केंद्रीय विषय (थीम) था– ‘विश्व हिंदी–नई शताब्दी की चुनौतियां ।’ सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश राज्य मंत्री श्री दिग्विजय सिंह ने किया । सम्मेलन में भारत से दो सौ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसमें बारह से अधिक देशों के हिंदी विद्वान और अन्य हिंदी सेवी सम्मिलित हुए ।
पारित प्रस्तावः
१. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया जाए ।
२. विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठों की स्थापना की जाए ।
३. हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार–प्रसार, हिंदी शिक्षण संस्थाओं के बीच संबंध तथा भारतीय मूल के लोगों में हिंदी के प्रयोग के प्रचार के उपाय किए जाएं ।
४. हिंदी के प्रचार हेतु वेबसाइट की स्थापना और सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग हो ।
५. हिंदी विद्वानों की एक विश्व निर्देशिका का प्रकाशन किया जाए ।
६. विश्व हिंदी दिवस का आयोजन हो ।
७. कैरेबियाई हिंदी परिषद की स्थापना की जाए ।
८. दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग की स्थापना की जाए ।
९. भारत में एम. ए. हिंदी के पाठयÞक्रम में विदेशों में रचित हिंदी लेखन को समुचित स्थान दिलाया जाए ।
१०.सूरीनाम में हिंदी शिक्षण का संवर्धन किया जाए ।

यह भी पढें   जनता समाजवादी पार्टी,  नेपाल द्वारा संविधान में संशोधन के लिए 30 सूत्रीय सुझाव

आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन
आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन १३ जुलाई २००७ से १५ जुलाई २००७ तक अमेरिका के प्रसिद्ध न्यूयार्क नगर में हुआ । इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय था, ‘विश्व मंच पर हिंदी ।’ इसका आयोजन भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा किया गया । न्यूया‘र्क में सम्मेलन के आयोजन से संबंधित व्यवस्था अमेरिका की हिंदी सेवी संस्थाओं के सहयोग से भारतीय विद्या भवन ने की ।
पारित प्रस्तावः
१. विदेशों में हिंदी शिक्षण और देवनागरी लिपि को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से दूसरी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए एक मानक पाठ्यक्रम बनाया जाए तथा हिंदी के शिक्षकों को मान्यता प्रदान करने की व्यवस्था की जाए ।
२. विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज को सक्रिय एवं उद्देश्यपरक बनाने के लिए सचिवालय को भारत तथा मा‘रीशस सरकार सभी प्रकार की प्रशासनिक एवं आर्थिक सहायता प्रदान करें और दिल्ली सहित विश्व के चार–पांच अन्य देशों में इस सचिवालय के क्षेत्रीय कार्यालय खोलने पर विचार किया जाए । सम्मेलन सचिवालय से यह आह्वान करता है कि हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने के लिए विश्व मंच पर हिंदी वेबसाइट बनायी जाए ।
३. हिंदी में ज्ञान–विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विषयों पर सरल एवं उपयोगी हिंदी पुस्तकों के सृजन को प्रोत्साहित किया जाए । हिंदी में सूचना प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने के प्रभावी उपाय किए जाएं । एक सर्वमान्य व सर्वत्र उपलब्ध यूनीकोड को विकसित व सर्वसुलभ बनाया जाए ।
४. विदेशों में जिन विश्वविद्यालयों तथा स्कूलों में हिंदी का अध्ययन–अध्यापन होता है, उनका एक डाटाबेस बनाया जाए और हिंदी अध्यापकों की एक सूची भी तैयार की जाए ।
५. विश्व के सभी हिंदी प्रेमियों और विशेष रूप से प्रवासी भारतीयों तथा विदेशों में कार्यरत भारतीय राष्ट्रिकों से भी अनुरोध है कि वे विदेशों में हिंदी भाषा, साहित्य के प्रचार–प्रसार में योगदान करें ।
६. वर्धास्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में विदेशी हिंदी विद्वानों के अनुसंधान के लिए शोधवृत्ति की व्यवस्था की जाए ।
७. केंद्रीय हिंदी संस्थान भी विदेशों में हिंदी के प्रचार–प्रसार व पाठ्यक्रमों के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दे ।
८. विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठ की स्थापना पर विचार–विमर्श किया जाए ।
९. हिंदी को साहित्य के साथ–साथ आधुनिक ज्ञान–विज्ञान और वाणिज्य की भाषा बनाया जाए ।
१०. भारत द्वारा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर आयोजित की जाने वाली संगोष्ठियों व सम्मेलनों में हिंदी को प्रोत्साहित किया जाए ।

नौवां विश्व हिंदी सम्मेलन
९वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन दक्षिण अपÞm्रीका के जोहांसबर्ग शहर में आयोजित किया गया । इस सम्मेलन ने दक्षिण अपÞm्रीका के महान नेता डॉ. नेल्सन मंडेला के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया जिन्होंने महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित शांति, अहिंसा एवं न्याय के शाश्वत सिद्धांतों को आत्मसात करके केवल अपने देश के लिए ही नहीं बल्कि विश्व मानव के कल्याण के लिए एक सम्मानित जीवन का मार्ग प्रशस्त किया ।
२२ से २४ सितंबर २०१२ को दक्षिण अपÞm्रीका में आयोजित ९वें विश्व हिंदी सम्मेलन ने, जिसमें विश्वभर के हिंदी विद्वानों, साहित्यकारों और हिंदी प्रेमियों आदि ने भाग लिया, रेखांकित किया कि ः
(क) हिंदी के बढ़ते हुए वैश्वीकरण के मूल में गांधी जी की भाषा दृष्टि का महत्वपूर्ण स्थान है ।
(ख) मारीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना की संकल्पना प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान की गई थी । यह सम्मेलन इस सचिवालय की स्थापना के लिए भारत और मारीशस की सरकारों द्वारा किए गए अथक प्रयासों एवं समर्थन की सराहना करता है ।
(ग) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित संकल्पों का ही परिणाम है । यह विश्वविद्यालय हिंदी के प्रचार–प्रसार और उपयुक्त आधुनिक शिक्षण उपकरण विकसित करने में सराहनीय कार्य कर रहा है ।
(घ) सम्मेलन केंद्रीय हिंदी संस्थान की भी सराहना करता है कि वह उपयुक्त पाठ्यक्रम और कक्षाओं का संचालन करके विदेशियों और देश के गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों के बीच हिंदी का प्रचार–प्रसार कर रहा है
(ङ) सम्मेलन इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रिंट मीडिया विशेषकर हिंदी मीडिया, पिÞmल्मों और थिएटर द्वारा किए जा रहे कार्य की भी प्रशंसा करता है जो हिंदी के माध्यम से घर–घर तक ज्ञान पहुँचा रहे हैं ।
(च) सम्मेलन दक्षिण अपÞm्रीका में हिंदी शिक्षा संघ तथा अन्य संस्थाओं द्वारा हिंदी शिक्षण एवं हिंदी के प्रसार के लिए किए जा रहे कार्य की प्रशंसा करता है और हिंदी को समर्थन प्रदान करने के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करता है ।
(छ) हिंदी में युवा वर्ग की रुचि निरंतर बढ़ रही है जो सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी उपकरण विकसित किए जाने के साथ–साथ हिंदी पिÞmल्मों, इलेक्ट्रानिक मीडिया तथा सोशल मीडिया की भूमिका का ही एक भाग है और हिंदी भाषा को व्यापार, वाणिज्य और बाजÞार से जोड़ने का परिणाम है ।
(ज) विदेशी नागरिक हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति में अपनी रुचि के अलावा व्यावसायिक कारणों से भी हिंदी सीख रहे हैं जो वैश्विक संदर्भ में हिंदी की प्रासंगिकता और इसके महत्व को प्रतिपादित करते हैं ।
(झ) हिंदी के विकास में विदेश में रह रहे प्रवासी लेखकों की महत्वपूर्ण भूमिका सराहनीय है ।
(ञ) सम्मेलन में स्मारिका वगगनांचल पत्रिका के विशेषांक प्रकाशित किए गए । इनके सुचारु रूप से किए गए प्रकाशन के लिए सम्मेलन इनके संपादक मंडलों और लेखकों की सराहना करता है ।
(ट) हिंदी भाषा, साहित्य, सूचना प्रौद्योगिकी एवं विशेष तौर पर महात्मा गांधी के जीवन एवं साहित्य पर लगाई गई समेकित प्रदर्शनी सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण आकर्षण रही है और इसमें सभी प्रतिभागियों ने गहरी रुचि दिखाई है । सम्मेलन प्रदर्शनी के आयोजकों के प्रयास की सराहना करता है ।
(ठ) इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद तथा दक्षिण अपÞm्रीका के स्थानीय कलाकारों द्वारा की गई सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी सभी उपस्थित प्रतिभागियों को प्रभावित किया । सम्मेलन इन कार्यक्रमों के आयोजकों की सराहना करता है ।
(ड) सम्मेलन की दैनिक गतिविधियों पर प्रतिदिन एक समाचार पत्रिका निकाली गई । इसके लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए प्रयत्न एवं परिश्रम की सम्मेलन सराहना करता है ।
(ढ) इस अवसर पर दक्षिण अपÞm्रीका की सरकार द्वारा दिए गए समर्थन, सहयोग, सहायता एवं भागीदारी के लिए सम्मेलन ने दक्षिण अपÞm्रीका की सरकार के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया जिसके कारण इस सम्मेलन का आयोजन सुचारु रूप से संपन्न हो सका ।

यह भी पढें   हर्क ने प्रधानमंत्री बालेन से किया आग्रह... जनता को दुख नहीं दें

 

दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन
दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन १०–१२ सितंबर, २०१५ के दौरान भारत के भोपाल शहर में आयोजित किया गया जिसे मध्य प्रदेश सरकार के सहयोग से विदेश मंत्रालय, भारत सरकार ने आयोजित किया, १० सितंबर की प्रातः विश्व के घढ देशों से आए लगभग पाँच हजार प्रतिभागियों और अतिथियों की उपस्थिति में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा स्वागत और विदेश मंत्री माननीय श्रीमती सुषमा स्वराज द्वारा सम्मेलन की प्रस्तावना के बाद भारत के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा इस सम्मेलन का उद्घाटन किया गया ्रएक लंबे अंतराल के बाद भारत में हुए इस सम्मेलन में अनेक राज्यों के राज्यपाल, केंद्रीय मंत्रियों, राज्य मंत्रियों के साथ–साथ मारीशस की शिक्षा व मानव संसाधन, तृतीयक शिक्षा व वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्री माननीया श्रीमती लीला देवी दुकन–लछुमन के नेतृत्व में १७ सदस्यों वाले एक प्रतिनिधि मंडल ने भी सक्रिय भागीदारी की । इसके पूर्व के सभी सम्मेलन साहित्य पर केंद्रित थे ्र पहली बार इसे भाषा पर केंद्रित किया गया, दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य विषय था, ‘हिंदी जगत ः विस्तार एवं संभावनाएं ।’
सम्मेलन स्थल पर आयोजित प्रदर्शनी में पहली बार गूगल, एप्पल, माइक्रोसाफ्ट द्वारा विशेष प्रदर्शनियां लगाई गईं जिनमें इन कंपनियों ने हिंदी से संबंधित अपने उत्पाद प्रदर्शित किए ।
सम्मेलन के समापन समारोह में भारत के केंद्रीय गृह मंत्री माननीय श्री राजनाथ सिंह उपस्थित हुए जिन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, ‘यदि हम योग को १७७ देशों के समर्थन से संयुक्तराष्ट्र में स्थान दिला सकते हैं तो मात्र १२७ देशों के समर्थन से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में शामिल करने की क्षमता भी रखते हैं ।’

ग्यारहवां विश्व हिंदी सम्मेलन
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा मॉरीशस सरकार के सहयोग से १८–२० अगस्त २०१८ को मॉरीशस के विवेकानंद इंटरनेशनल कनवेंशन सेंटर, पायी में ११वें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन संपन्न हुआ । १८ अगस्त को एक भव्य समारोह में मारीशस के माननीय प्रधानमंत्री श्री प्रवीण जगन्नाथ द्वारा सम्मेलन का उद्घाटन किया गया । भारत की माननीया विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की । इस अवसर पर भारत के विदेश राज्य मंत्री श्री वी के सिंह, गृह राज्य मंत्री श्री किरेन रिजिजू, मानव संसाधन राज्य मंत्री श्री एस पी सिंह, विदेश राज्य मंत्री श्री एम जे अकबर, गोवा की माननीया राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा, पश्चिमी बंगाल के माननीय राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी तथा मा‘रीशस गणराज्य के प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, पूर्व राष्ट्रपति एवं पूर्व प्रधानमंत्री इत्यादि भी उपस्थित थे । सर्वप्रथम दोनों देशों का राष्ट्र गान हुआ । तत्पश्चात दीप प्रज्वलन और उसके समानांतर केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारत के अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों द्वारा वेद मंत्र पाठ हुआ । इस अवसर पर महात्मा गांधी संस्थान, मा‘रीशस द्वारा हिंदी गान की प्रस्तुति की गयी । तत्पश्चात सम्मेलन लोगो (भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर तथा मारीशस का राष्ट्रीय पक्षी डोडो) पर एनिमेशन फिल्म की रोचक प्रस्तुति की गयी ।
इसके बाद मारीशस की शिक्षा व मानव संसाधन, तृतीयक शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्री माननीया श्रीमती लीला देवी दुकन लछुमन ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि आज जहाँ हम विश्व के सबसे बड़े सम्मेलन की शुरुआत कर रहे हैं, तभी पूरी दुनिया श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की मृत्यु का शोक मना रही है । उनके जाने से भारत ने एक मार्गदर्शक और हिंदी ने एक सैनिक खो दिया । सबसे पहले आज मैं उनकी आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ और अपनी संवेदना प्रकट करती हूँ । उन्होंने कहा कि अगर वो यहां होते तो इस सम्मेलन को देखकर बहुत खुश होते और यही चाहते कि हम जिस उत्साह के साथ इसके आयोजन में लगे थे उसी उत्साह के साथ इसको पूरा करें । इसलिए आज जितने गंभीर भाव के साथ हम श्री वाजपेयी जी को विदा कर रहे हैं, उतने ही उत्साह के साथ मैं आप सभी हिंदी प्रेमियों, विद्वानों, लेखकों, संस्थाओं का स्वागत करती हूँ ।

तत्पश्चात भारत की माननीया विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने सम्मेलन प्रस्तावना देते हुए अपने वक्तव्य में कहा – इस मंच पर खडे खडे मेरे मन में दो भाव एक साथ उभर रहे हैं । पहला भाव शोक का है क्योंकि इस सम्मेलन पर अटल जी के निधन की छाया है । और, दूसरा भाव उस संतोष का भी है कि इस सम्मेलन के बहाने आज समूचे विश्व के प्रतिनिधि अटल जी को श्रद्धांजलि देने के लिए सभागार में उपस्थित हैं । ११वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का समापन २० अगस्त २०१८ को अभिमन्यु अनत सभागार में हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में मारीशस गणराज्य के माननीय कार्यवाहक राष्ट्रपति महामहिम श्री परमसिवम पिल्लै वायापुरी उपस्थित थे । उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी की वैश्विक लोकप्रियता के आधार पर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने की मांग की । इस प्रकार कुल मिलाकर यह सम्मेलन विचार मंथन से परिपूर्ण और बहुत ही सार्थक रहा ।

raghubir75@gmail.com 

रघुवीर शर्मा

सहायक निदेशक,

राजभाषा विभाग, दिल्ली

 

 

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *